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शिव का संदेश था कि केदारनाथ में मंदिर के सिवा कुछ और नहीं: पत्रकार मंजीत नेगी

जनता जनार्दन संवाददाता , Jan 11, 2019, 11:05 am IST
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शिव का संदेश था कि केदारनाथ में मंदिर के सिवा कुछ और नहीं: पत्रकार मंजीत नेगी केदारनाथ हिंदुओं के चार धाम में एक धाम है. वहां की यात्रा बहुत दुर्गम है. साल 2013 में वहां एक ऐसी आपदा घटी, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया. आजतक के पत्रकार मंजीत नेगी ने केदारनाथ हादसे की आंखोंदेखी रिपोर्टिंग की और पुनर्निर्माण के दौरान भी वह लगातार केदारनाथ जाते रहे. फिर अपने अनुभवों पर उन्होंने एक किताब लिखी, नाम रखा 'केदारनाथ से साक्षात्कार.'

यह किताब केदारनाथ की पौराणिक महत्ता से अधिक उस हादसे से जुड़ी है और इसके महत्त्व को ऐसे समझ सकते हैं कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी तारीफ करते हुए लिखा, 'केदार त्रासदी की दारुण गाथा, जीवट पत्रकारिता का पठनीय संकलन'. प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेले के लेखक मंच पर 'साहित्य आजतक' ने मंजीत नेगी और इस पुस्तक के प्रकाशक हाफक्रो के नितिन सोनी बातचीत की.

'साहित्य आजतक'  के अन्य सत्रों की तरह इस सत्र के संचालन का जिम्मा भी आजतक के एंकर सईद अंसारी ने उठाया.

मंजीत नेगी ने किताब पर बात करने से पहले दर्शकों को उसी दिन शाम 5 बजे की खिंची हुई तस्वीर दिखायी. उन्होंने जून 2013 की उस घटना को याद करते हुए उसे प्रलय करार दिया और कहा कि सरकारी आंकड़ों में पांच हजार लोग मारे गए, पर गैरसरकारी आंकड़ों और वहां मेरे एक माह के प्रवास के अनुभवों से मैं यह कह सकता हूं कि उस त्रासदी में करीब दस हजार लोग शिकार हुए थे. मेरे सत्रह साल के पत्रकारिता के करियर में यह रिपोर्टिंग का अलग अनुभव था.

मंजीत ने बताया कि इस हादसे के बाद जब मैं वहां पहुंचा तो शाम का समय था. मंदिर को छोड़ मानवनिर्मित सबकुछ तबाह हो चुका था. मंदिर के बाहर नंदी जी के पास बीसपच्चीस शव बिखरे हुए थे. हिम्मत जुटाकर मंदिर के अंदर गया और तलाशने की कोशिश की. अंदर शव नहीं थे. मैं पहली बार केदारनाथ गया था तो अंधेरे में हाथ से टटोलकर मंदिर में शिवलिंग ढूंढने की कोशिश की, तो बड़ी शिला नजर आई. मंदिर के अंदर बाहर की तबाही का कोई असर नहीं था. उसके बाद मैं बाबा केदारनाथ की कृपा से कई बार वहां गया और अपने अनुभवों पर यह किताब लिखी.

हाफक्रो के प्रकाशक नितिन सोनी का कहना था कि हमारे पास जब भी किताबें प्रकाशन के लिए आती हैं, तो उन्हें पढ़ने के बाद हम संपादकीय टीम को भेजते हैं और वह फैसले लेती है. पर जब 'केदारनाथ से साक्षात्कार' किताब मेरे पास आई तो आधा पढ़ने के बाद मेरी आंखों में आंसू थे. मैंने इस हादसे को टीवी पर देखा था. पर यह किताब कुछ अलग ही थी. इस किताब की सबसे अच्छी बात यह है कि यह विध्वंस से निर्माण की ओर बढ़ती है. इसमें एक पत्रकार और सेना के साहस और मेहनत की बानगी दिखती है. इसके साथ ही आस्था के महत्त्व का भी पता चलता है. किताब तो अच्छा कर ही रही, अब इसपर फिल्म भी बन चुकी थी.

केदारनाथ हादसे के पीछे मानवनिर्मित निर्माण को जिम्मेदार ठहराते हुए संचालक सईद अंसारी ने लेखक मंजीत नेगी का मत पूछा तो उनका जवाब था, इस आपदा के पीछे एक संदेश था. जब आप केदारनाथ की तस्वीर देखेंगे तो गूगल पर 1962 की एक फोटो दिखती है, जिसमें मंदिर के अलावा पूरी केदार घाटी में एकाध झोपड़ियों के अलावा कुछ नहीं दिखता. 2013 तक आते-आते वहां इतने निर्माण हो चुके थे कि केदारनाथ और हरिद्वार एक जैसा लगने लगे थे. जबकि केदारनाथ निर्वाण का धाम था.

मंजीत नेगी ने साफ शब्दों में कहा कि यह त्रासदी शायद शिव की तरफ से एक संदेश था कि मंदिर के अलावा वह वहां कुछ भी नहीं चाहते थे. उन्होंने अपनी बात को विस्तार देते हुए दर्शकों से कहा कि हादसे के दौरान आप सबने एक दिव्य शिला के बारे में सुना होगा. त्रासदी के दिन जब वहां मंदाकिनी और सरस्वती में बाढ़ आई, जिसकी वजह से पूरी केदारनाथ घाटी तबाह हो गई थी, तब उस धारा के साथ एक शिला भी आई थी, जो  मंदिर के पीछे रुक गई. उस शिला के चलते नदी की धाराएं दो भागों में विभाजित हो गईं और उन्होंने मंदिर को छोड़ वहां जो कुछ भी था, उसे ध्वंश कर दिया. अब जब वहां पुनर्निर्माण का काम हो रहा है तो इस बात का ध्यान रखा जा रहा है.

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने इस किताब में अपने सारे अनुभव समेटे हैं. मंजीत का जवाब था कि बहुत सारी बातें छूट गई हैं. एक घटना जो उन्हें याद आ रही कि जब हम दोबारा पुराने रास्ते से ट्रैकिंग करते हुए जा रहे थे, तो जिस रामबाड़ा में लोग केदारनाथ जाते हुए ठहरते थे, उसका नामोनिशान तक न था. जबकि हादसे की रात वहां तकरीबन पांच हजार लोग थे. हमें रास्ते भर परिवारों के शव मिलते रहे. आलम यह है कि आज भी रामबाड़ा से केदारनाथ तक लोगों के शव मिलते हैं.

मंजीत के मुताबिक राज्य सरकार को शायद यह आभास ही नहीं हुआ था कि वहां इतनी बड़ी प्रलय हुई है. राज्य सरकार ने शुरुआती तीन दिनों में कदम उठाए होते कुछ जाने और बचाई जा सकती थी. कम से कम उन लोगों की जो ठंड या भूख से मरे थे. सेना की हिम्मत और प्रतिबद्धता की तारीफ करते हुए मंजीत नेगी ने नितिन सोनी के आग्रह पर एक किस्सा भी सुनाया. बताया कि उस प्रलयंकारी बाढ़ में एक हफ्ते से एक घोड़ा एक टापू में फंसा था. सात-आठ दिनों से उसे खाने के लिए कुछ मिला नहीं था. सेना ने उसे बचाने का फैसला किया.

किसी तरह से एक पैच पर हेलीकॉप्टर रोका गया. एनडीआरएफ के लोग किसी तरह रस्सी के सहारे पहुंचे. घोड़े को लाकर हेलीकॉप्टर के दोनों तरफ के दरवाजे खोलकर अंदर रखा गया. हमें कहा गया कि दोनों तरफ मैं और मेरे कैमरामैन खड़े रहें. हमें डर था कि घोड़ा जरा भी हिला तो हम सीधे नीचे. पर भूख-प्यास से बेदम उस घोड़े ने हरकत नहीं की. फिर भी रास्ते भर हम हनुमान चालीसा पढ़ते रहे और हम उसे लेकर राहत केंद्र तक पहुंचाने में सफल रहे.  

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