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जब बाबा कीनाराम का आशीष और क्रोध बरसा था मुगल बादशाह शाहजहां पर

जब बाबा कीनाराम का आशीष और क्रोध बरसा था मुगल बादशाह शाहजहां पर
वाराणसी: यूं ही नहीं कहा गया है ‘ जो न दे राम वह दें कीनाराम’।अघोरेश्वर बाबा कीनाराम ने सुशुप्त अवस्था में पड़े अघोर परंपरा को न केवल जागृत किया बल्कि उसे सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फैलाया। श्रद्धान्वित होकर दरबार में आने वाले भक्तों को बाबा ने खूब आशीर्वाद दिया। लेकिन जिससे भृकुटि टेढ़ी हुई वह उनके श्रापों से वंचित न रहा। उनके दिए हुए श्राप को 21वीं सदी तक राजघरानों ने झेला है।

बाबा कीनाराम ने शाहजहां को आशीर्वाद तो दिया लेकिन उसकी उद्दंडता ने बाबा को क्रोधित कर दिया। बाबा ने क्रोध में आकर शाहजहां को जो श्राप दिया उसका दंश उसे जीवन पर्यन्त भुगतना पड़ा।

बात सन 1638 की है जब बाबा कीनाराम कंधार पहुंचे जहां शाहजहां अपने सैनिकों के साथ मौजूद था। कंधार उस वक्त अन्य देशों में निर्यात के लिए काफी महत्व रखता था। बाबा के कंधार में होने की सूचना मिली तो उसने बाबा को बुलावा भेजा। क्योंकि शाहजहां सन्तों का भक्त था। 
 
जब बाबा शाहजहां के यहां पहुंचे तो उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि कंधार की विजय होगी। बाबा के आशीर्वाद से मुगल बादशाह शाहजहां का बिना किसी कठिनाई के कंधार के किले में दखल हो गया। जिसके बाद शाहजहां ने बाबा को पुनः बुलाया और उनका आदर सत्कार किया। 
 
इसके बाद शाहजहां ने आदेश जारी किया कि काशी के मणिकर्णिका,हरिश्चन्द्र के श्मशानों से हर मुर्दा 5 लकड़ी और 5 पैसे और बनारस जनपद के हर गाँव से एक-एक रुपये की वसूली का अख्तियार बाबा कीनाराम के क्रीं-कुंड को रहेगा। इसके बाद बाबा की मुलाकात शाहजहां से उत्तर-भारत में हुई थी। उस समय शाहजहां प्रजा के धन को अपने निजी ऐशो-आराम के लिए खर्च करता था। 
 
जिसके लिए बाबा ने शाहजहां की बहुत निंदा की। जिसके बाद बादशाहत के जोश में शाहजहां ने बाबा के प्रति उद्दंडता दिखाई। जिससे क्रोधित होकर बाबा ने शाहजहां को श्राप दे दिया। जिसके बाद बाबा के श्राप का फल शाहजहां को जल्द ही मिला। शाहजहां के पुत्र औरंगजेब ने उसे गद्दी से उतारकर कैदखाने में डाल दिया। जहां वह नाना प्रकार के दुःख भोगता रहा और बाबा के श्राप को झेलने के लिए खुदा से दुआ मांगता रहा।
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