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ऐसे दौर में अरुण कुमार जैसे पुलिस अफसर के किसी सुरक्षा बल का मुखिया होने के मायने

ऐसे दौर में अरुण कुमार जैसे पुलिस अफसर के किसी सुरक्षा बल का मुखिया होने के मायने यह कोई 1986-87 की बात है. उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा से महज कुछ किलोमीटर पर बसे सैयदराजा कस्बे से गुजरने वाली जीटी रोड से औसतन हर मिनट 15-20 ट्रकें गुजरती थीं. वे जाड़े के दिन थे. लेकिन दिन चाहे जिस भी मौसम के हों सड़क के बाशिंदों की नींद हर सुबह ट्रकों की घरघराहट वाले शोर से ही खुलती. पर एक दिन सुबह अचानक वह शोर गायब था. अजीब से सन्नाटे के बीच नजर खुली, तो खिड़की से बाहर झांकने पर रुके हुए ट्रकों की अंतहीन लाइन दिखी. तीन-तीन, चार-चार लाइनों में खड़े ट्रक और परेशान ड्राईवर. पत्रकारिता के वे शुरुआती दिन थे, सो जिज्ञासु मन से अधिक खबर का लालच सड़क पर ले गया. पता चला शेरशाह सुरी के जमाने में पेशावर से कोलकाता तक बनी इस सड़क की उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा पर स्थित नौबतपुर बिक्री कर चेकपोस्ट पर तैनात कर्मचारियों ने हड़ताल कर रखी है. कामकाज न केवल वहीं ठप है, बल्कि पूरे प्रदेश के तमाम बिक्री कर कार्यालयों में काम ठप हो चुका है, और विभाग के अधिकारी-कर्मचारी राज्यव्यापी हड़ताल पर जाने की धमकी दे रहे हैं.

तफसील में जाने पर पता चला इलाके के सहायक पुलिस अधीक्षक ने देर रात एक ट्रक को रोका. खलासी के रूप में सवार हुए. चेक-पोस्ट पर पहुंच सभी वाजिब कागजों के साथ ट्रक पास कराने की कोशिश की, पर 'एंट्री फीस' यानी एक तरह की घूस की वह फिक्स रकम, जो हर ट्रक के लिए निर्धारित थी, को लेकर बात फंस गई. उस क्लीनर ने पहले मना किया, और फिर पैसे तो बढ़ाए, पर निर्धारित पैसों से कम. झिकझिक शुरू हो गई. पहले बिक्री कर कर्मचारी उलझे, और बात नहीं बनी तो मजबूरन ड्युटी पर तैनात बिक्री कर अधिकारी को सामने आना पड़ा. ड्युटी पर तैनात दो बिक्री कर अधिकारियों ने खलासी को धमकाना शुरू किया कि उन्हें पकड़ लिया गया. उन्हें पकड़ने वाला और कोई नहीं, वही खलासी वेशधारी भारतीय पुलिस सेवा के युवा अफसर थे. नाम था अरुण कुमार.

प्रदेश में ऐसा पहली बार हुआ था कि ट्रकों की इंट्री फीस जैसे मामले में बिक्री कर अधिकारियों को पकड़ा गया था. इंट्री फीस की रकम भले ही छोटी थी, पर हर दिन उस जमाने में भी लाख रुपए से अधिक की वसूली थी, जिनमें नीचे से ऊपर तक हिस्सा था. जाहिर है बिक्रीकर की उस हड़ताल को काफी ऊपर से समर्थन मिला. हड़तालियों की मांग थी, उनके साथियों को छोड़ा जाए, नौबतपुर चेकपोस्ट पर सुरक्षा मुहैया कराई जाए, और अरुण कुमार का स्थानांतरण हो. सरकार शुरू की दोनों मांगों पर तैयार हो गई, पर आखिरी मांग पर उसे हिचक थी. वह टेलीविजन न्यूज का जमाना नहीं था, पर अखबार ताकतवर थे. सरकार यह संदेश नहीं देना चाहती थी कि वह घुसखोर-चोरों के साथ है. सो अरुण कुमार को हटाया न जा सका, पर उन चौतरफा दबाव डलवाया जाने लगा. इलाके के लोग, सीनियर अफसर, नेता और न जाने किस-किस ओर से. मीडिया में खबरें छपवाई जाने लगीं कि इस छापे के पीछे बिहार के कोयला माफियाओं का हाथ है. कुमार बिहार के रहने वाले हैं. उनकी जाति तलाशी जाने लगी.....

यह अरुण कुमार की भारतीय पुलिस सेवा का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद पहली नियुक्ति थी. केवल उस एक नियुक्ति में उन्होंने पुलिस वालों की अवैध वसूली रुकवाई, तहबजारी की वसूली रुकवाई, ठेका प्रथा पर प्रहार किया, डग्गामार बसों को रोका, गौ-तस्करों के संगठित गिरोह की कमर तोड़ दी. तीन दशक बाद भी चंदौली के लोग उन्हें याद करते हैं. उस दौर में भी उन्होंने नक्सली समस्या रोकने के लिए कर्मनाशा कॉरीडोर की बात की थी, ताकि बिहार से अपराध कर यूपी में घुसने वाले संगठित, असंगठित अपराधियों को रोका जा सके. कहते हैं उसी कार्यकाल में उन्होंने दीवाली के दौरान एक प्रभावशाली सिंडिकेट के संरक्षण में चल रही बस को पकड़ लिया, और उसे छोड़ने के लिए जब प्रदेश के सर्वाधिक प्रभावशाली काबिना मंत्री का फोन आया तो कुमार का जवाब था, 'सर, मुझे होली-दीवाली नहीं पढ़ाया गया. कानून की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है. आप सरकार हैं, हमसे क्यों कह रहे. आप कानून बदलवा दीजिए, हम तो मानेंगे ही.'

इस पहली नियुक्ति में ही एक कड़क, ईमानदार, प्रचार और पुरस्कार से दूर रहकर भी लोकप्रिय होने का जो सफर उन्होंने शुरू किया वह तमाम दबावों व झंझावातों के बीच आज तक कायम है. पुलिस अधीक्षक के रूप में उनकी अगली नियुक्ति माफियाओं के गढ़ गोरखपुर में थी. एक शुभेच्छु पत्रकार ने चिंता जाहिर करते हुए उनसे नरमी बरतने की बात कही, तो कुमार का जवाब था, 'हाथों में चूड़ियां पहनने के लिए पुलिस सेवा ज्वाइन नहीं की. चाहता तो आईएएस बनता, पर आईपीएस मेरी च्वाइस है. चिंता न करें कुछ न होगा.' कुमार आईआईटी रुड़की से कंप्युटर साइंस से एमटेक हैं. उनके साथ के लोगों की सालाना तन्ख्वाह ही करोड़ों में है. जाहिर है, कुमार ने पुलिस सेवा पैसे और आराम के लिए नहीं चुना था. उनके कार्यकाल में गोरखपुर शांत रहा. कानपुर की अपनी नियुक्ति में कानून-व्यवस्था पर उनकी पकड़ का आलम यह था कि बाबरी विवाद में जब समूचे देश के अधिकांश शहर कर्फ्यु की चपेट में थे, कानपुर उन आखिरी शहरों में था, जहां कर्फ्यु लगाया गया, वह भी तब जब कुमार के काफिले पर बमों से हमला किया गया और वरिष्ठ अधिकारी अड़ गए.

गाजीपुर जिले के पुलिस प्रमुख के रूप में अफीम की तस्करी रुकवाने से लेकर इलाके को माफिया और हथियारों के प्रदर्शन पर रोक लगाकर पुलिस की धमक बरकरार रहने की उनकी कोशिशें आज भी याद की जाती हैं. आलम यह था कि जिस माफिया की तरफ पुलिस आंख उठाकर नहीं देखती थी, उसने न केवल दरबदर किया बल्कि उसके यहां कुर्की की ऐतिहासिक काररवाई भी हुई. चाहे गाजियाबाद हो या लखनऊ, मेरठ या कानपुर, एसटीएफ रहा हो या लॉ एंड ऑर्डर, अरुण कुमार ने हर नियुक्ति में अपना बेस्ट दिया.  वह चाहे जिस पद पर रहे निर्दोषों के हक में, अपराधियों के विरुद्ध और संविधान के पक्ष में खड़े रहे. नतीजतन स्थानांतरण, सियासती विरोध और मीडिया ट्रॉयल से उनका नाता अनवरत बना ही रहा. वह जब गाजीपुर के पुलिस कप्तान थे, तो उनकी हनक का आलम यह था कि मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद मुलायम सिंह यादव ने जो पहला ट्रांसफर किया वह अरुण कुमार का था. कानपुर में अपनी नियुक्ति के दौरान राज्यपाल शासन में वह लॉटरी माफियाओं के निशाने पर आए, और राज्यपाल रोमेश भंडारी ने यह कहते हुए उन्हें हटाया कि अगर वह नरमी बरत सकते हैं तो ठीक अन्यथा प्रधानमंत्री चाहते हैं कि आपको हटा दिया जाए.  

मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो दिल्ली में यूपी का दमदार व ईमानदार चेहरा दिखे यह सोच कर उन्हें गाजियाबाद भेजा. नोएडा तब गाजियाबाद का हिस्सा था. पर वह इनकी हनक व प्रशासन को सौ दिन भी बर्दाश्त नहीं कर सकीं. शराब माफियाओं के दबाव में पहले स्थानांतरण और फिर सस्पेंशन तक झेलना पड़ा. यही वह समय था जब बतौर रक्षामंत्री मुलायम सिंह ने सार्वजनिक रूप से कुमार को भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की श्रेणी का देशभक्त बताते हुए यह स्वीकारा था कि मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्हें पहचानने में उनसे भूल हुई. कल्याण सिंह ने उन्हें लखनऊ का जिम्मा दिया, पर जातिगत माफिया और संगठित गिरोहों के खूनखराबे के चलते जल्द ही उन्हें जिले से हटाकर नए-नए बने स्पेशल टास्क फोर्स की जिम्मेदारी सौंपी गई. इस नियुक्ति में सिरचढ़े माफिया श्रीप्रकाश शुक्ला का एनकाउंटर उनकी उन उपलब्धियों में है, जिसे देश की हर पत्रिका व अखबार ने छापा. बाद में मायावती ने भी अपनी भूल स्वीकारी और अपने अगले कार्यकाल में उन्हें बुलाकर लखनऊ का पुलिस उपमहानिरीक्षक बनाया, पर कुछ ही महीनों में उन्हें हकीकत का भान हो गया और कुमार केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर चले आए. जिलों और प्रदेश में उनकी कामयाबी को ऐसे समझा जा सकता है कि चाहे जिस भी स्तर का माफिया रहा हो, वह मुन्ना बजरंगी हो, ब्रजेश सिंह, मुख्तार अंसारी या डीपी यादव, या तो उन्होंने अरुण कुमार की नियुक्ति के दौरान अपराध और दबंगई से तौबा की या यूपी छोड़ा. अखिलेश यादव के शासन में जब मुजफ्फरनगर के दंगे हुए तो अरुण कुमार उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था थे. इस दौरान दंगों को रोकने के लिए वह स्वयं कई दिनों तक सड़क पर रहे. उनकी जांच की सुई जब तब के ताकतवर लोगों की तरफ बढ़ी, तो दबाव पड़ने लगा, और लंबी छुट्टी पर चले आए. बाद में एक बार फिर उन्होंने केंद्र की प्रतिनियुक्ति को चुना.

केंद्र में वह अलग-अलग समय में सीबीआई, सीआरपीएफ, बीएसएफ में कई बड़े पदों पर रहे. सीबीआई की नियुक्ति में जब वह तेलगी केस में तथ्य के काफी करीब थे, दूसरे केस थमा दिए गए. रक्षा सौदों की जांच और यूपी के कई रसूखदारों की आमदनी से अधिक संपत्ति के केस से उन्हें हटाया गया. आर्थिक अपराध से विशेष अपराध के जांचकर्ता के तौर पर आरुषि तलवार और निठारी कांड जैसे चर्चित कांड की जांच उन्हें मिली. इन केसों को भी उन्होंने मीडिया ट्रायल, कानूनी मॉनिटरिंग, सियासी और प्रशासनिक दबावों के बीच पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सिर्फ सत्य, न्याय और तथ्यों के पक्ष में खड़े होकर निबटाया. खुद के लिए आलोचनाएं मोल लीं पर एक तथ्य हमेशा ऊपर रखा, किसी निर्दोष को सजा न हो. सीआरपीएफ की नियुक्ति के दौरान नक्सली हिंसा पर नकेल और बीएसएफ की नियुक्ति के दौरान सीमा सुरक्षा उनके मुख्य एजेंडे में रहा. प्रशासन, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी की संरक्षा के लिए वह किसी भी हद तक जाते रहे हैं, चाहे राह में कोई भी हो. उन्होंने कभी किसी से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया, अपनी नियुक्ति और तरक्की की कीमत पर भी नहीं. संभवतः इसीलिए उनके काम के कुछ हिस्सों पर उनके किरदार को लेकर दो फिल्में भी बनीं. फिल्म 'सेहर' और 'तलवार'. सेहर में अरुण कुमार की भूमिका अरशद वारसी ने निभाई और तलवार में इरफान खान ने.

खास बात यह कि आईपीएस का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद मुगलसराय की सर्किल ऑफिसर की पहली नियुक्ति से शुरू हुए 1985 बैच के इस आईपीएस का तेवर किसी भी दौर में थमा नहीं. दबंग, भ्रष्ट, देश के दुश्मनों और कामचोरों पर उनके चाबुक की धमक जहां भी रहें सुनाई पड़ ही जाती है. संतोष की बात यह कि यह सफर अभी जारी रहना है. इसी तीस सितंबर को उन्होंने रेलवे सुरक्षा बल के महानिदेशक का पद संभाला है. देश की आजादी के महज आठ साल बाद भारतीय संसद की अनुमति से गठित यह बल देश भर के रेलवे नेटवर्क, रेल संपत्ति और यात्रियों की सुरक्षा का जिम्मेदार है. सुरक्षा बल के जवानों की गिनती तकरीबन 73,000 है. कुमार की पहली प्राथमिकता सुरक्षा है. अभी उनके कार्यकाल का एक लंबा समय शेष है. जाहिर है देश उनकी उम्दा सेवाओं से लाभान्वित होता रहेगा. शुभकामनाएं!
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