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किसान क्रांति पदयात्रा: अहिंसा दिवस पर किसानों पर मोदी सरकार की हिंसा, विपक्ष हुआ नाराज

किसान क्रांति पदयात्रा: अहिंसा दिवस पर किसानों पर मोदी सरकार की हिंसा, विपक्ष हुआ नाराज नई दिल्लीः वह देश के अन्नदाता हैं, और आज अहिंसा दिवस है.कर्ज माफी, गन्ना की कीमतों समेत कई अन्य मांगों को लेकर दिल्ली मार्च करने जा रहे हजारों किसानों की दिल्ली बॉर्डर पर पुलिस ने जमकर पानी की बौछारें फेंकी, जिससे किसान घायल हो रहे हैं. विपक्ष ने इसकी निंदा की है.

पुलिस की चेतावनी के बावजूद किसानों ने आगे बढ़ने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस और किसानों में झड़प शुरू हो गई। किसानों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल कर रही है। दिल्ली सीमा पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है। किसानों को दिल्ली में घुसने से रोकने के लिए पुलिस लगातार बल प्रयोग कर रही है।  

किसानों को राजधानी में प्रवेश करने से रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इसके लिए पूरे यमुनापार में धारा-144 लगा दी गई है और यूपी से दिल्ली में प्रवेश करने के सभी रास्तों को बंद कर दिया गया है। गाजियाबाद बॉर्डर पर किसानों को रोक दिया गया है। दिल्ली में दाखिल होने वाले हर रास्ते को सील कर दिया गया है। दिल्ली से कौशांबी जाने वाले रूट में भी बदलाव किया गया है।

बीबीसी ने इस अंदाज में रिपोर्ट की हैः 2 अक्टूबर. जब पूरा देश अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी और 'जय जवान, जय किसान' का नारा देने वाले लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन मना रहा है, तब दिल्ली से सटे यूपी बॉर्डर पर अपनी मांगों के साथ आए हज़ारों किसानों पर पुलिस रबर की गोलियां, आंसू गैस के गोले चला रही थी.

कई बार सूखा झेल चुके इन किसानों पर पानी की तेज़ बौछार का इस्तेमाल किया गया ताकि ये लोग दिल्ली में न घुस सकें.

अपने साथियों के पैरों और हाथों से बहते खून को दिखाते ये किसान कहते हैं, ''चुनाव के वक़्त कर्ज़माफ़ी का वादा करते हैं, लेकिन बाद में भूल जाते हैं. किसानों के साथ मज़ाक बना रखा है. साढ़े चार साल हो गए. किसानों पर क़र्ज़ सरकार की ग़लत नीतियों की वजह से है. झूठ बोल के वोट हासिल किए. अगले चुनाव में कतई स्वीकार नहीं करेंगे. ये हम पर गोलियां चला रहे हैं.''

भारतीय किसान यूनियन के झंडे तले ये किसान अलग-अलग राज्यों से जुटे. यूपी बॉर्डर पर दिल्ली में घुसने का इंतज़ार करते ट्रैक्टरों में बैठी महिलाएं अपनी-अपनी भाषा में लगभग एक ही बात कहती हैं- क़र्ज़माफ़ी, बिजली का बिल, गन्ने का भुगतान और किए वादों को पूरा करो.

किसान यूनियन के राकेश टिकैत कहते हैं, ''लाठी, पानी और आंसू गैस के गोले आंदोलन के प्रसाद हैं. किसी-किसी को नसीब होए है ये.''

जब ये हज़़ारों किसान दिल्ली के बॉर्डर पर रुके हुए थे, तब किसान यूनियन का एक प्रतिनिधि मंडल गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिल रहा था. ख़बर है कि सरकार और किसानों के बीच अहम मांगों को लेकर सहमति बन गई है. लेकिन एयरकंडीशन कमरों में हुई इन बैठकों की ख़बर सड़क पर बैठे हज़ारों किसानों को नहीं है. वो पत्रकारों से उम्मीद भरी नज़रों से सवाल पूछते हैं- दिल्ली में कोई बात बनी कि नहीं?

मेरठ के एडीजी (ज़ोन) प्रशांत कुमार बताते हैं, ''यूपी पुलिस की ओर से कोई फायरिंग नहीं हुई है. दिल्ली पुलिस ने कुछ आंसू गैस के गोले छोड़े हैं, रबड़ बुलेट फायर किए गए हैं. कुछ किसानों का कहना है कि फायरिंग की गई है, जांच के बाद चीज़ें बेहतर तरीके से पता चलेंगी. किसानों के आरोपों की जांच की जाएगी.''

जिन किसानों के पैरों में चोट आई है, वो अपने ज़ख़्मों के साथ उस फ्लाईओवर के नीचे लेटे हुए हैं, जो यूपी और दिल्ली को बांटती है. पुलिस की ओर से इलाज के लिए उठने की बात कहने पर किसान पुलिस पर गरजते नज़र आते हैं.

हालांकि ज़मीन पर अन्न उगाने वाले किसानों की इस लड़ाई में बुनियादी फर्क पुलिस बैरिकेट्स के दोनों तरफ़ देखा जा सकता है. जहां एक तरफ़ सुबह से ड्यूटी कर रहे पुलिसवाले खाने की लाइन में लगे नज़र आते हैं और दूसरी तरफ़ टुकड़ियों में बैठे किसान अपने-अपने बस्ते से रोटी आचार निकालकर खा रहे थे.

केंद्र और यूपी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए वो कहते हैं, ''हमने क़र्ज़माफ़ी की. मोदी जी के नेतृत्व में काफी काम हुआ है. यूरिया की कालाबाज़ारी रुकी है. किसानों के लिए सरकार काफी गंभीर है. सालों से उपेक्षित पड़े किसानों को हमने राहत देने की कोशिश की है. किसानों को भारी राहत मिली है.''

कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट किया, ''लाठी गोली की है भरमार. किसानों से बर्बरता पूर्ण व्यवहार, बदलेंगी ऐसी मोदी सरकार!''

राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ''अब किसान देश की राजधानी आकर अपना दर्द भी नहीं सुना सकते.''

इस रैली में आप किसी भी राज्य से आए किसान से उनकी मांगों के बारे में पूछें तो स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों का ज़िक्र ज़रूर करते हैं. अब से 14 बरस पहले 2004 में स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 'नेशनल कमिशन ऑन फ़ॉरमर्स' बना था.

इस आयोग ने किसानों की बेहतरी के लिए कुछ सिफारिशें की थीं, जिनका ज़िक्र संभवत: सिर्फ़ चुनावी मंचों पर हुआ. फ़सल उगाने वाले किसान के लिए ज़मीन पर हालात नहीं बदले.

ये हैं स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशें...

    कम दाम में अच्छी क्वालिटी के बीज
    किसानों के लिए ज्ञान चौपाल
    महिला किसानों को क्रेडिट कार्ड
    प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए कृषि जोखिम फंड
    फ़सल उत्पादन मूल्य से 50 फ़ीसदी ज़्यादा दाम
    बेकार पड़ी ज़मीन को भूमिहीन किसानों में बांटना
    वनभूमि को कृषि से इतर कामों के लिए कॉरपोरेट को न दें
    सबको मिले फसल बीमा की सुविधा
    एग्रिकल्चर रिस्क फंड बनाया जाए
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