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माटी के लाल शास्त्री जी का ऐसा हाल, तस्वीरें बहुत कुछ बोल रही साहेब!

माटी के लाल शास्त्री जी का ऐसा हाल, तस्वीरें बहुत कुछ बोल रही साहेब! देश के लाल की ऐसी दुर्दशा देख निकल पड़ेंगे आंसू....जी हां हम बात कर रहे है भारत के द्वितीय प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी जिन्हें अब सिर्फ जयंती और पुण्यतिथि के दिन ही याद किया जाने लगा है। दरअसल यूपी के मुगलसराय में जन्मे लाल बहादुर शास्त्री भले ही किताबो में  देश के महान विभूतियों का  दर्जा पा रहे हो लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है।चंद लोग शास्त्री जी के जयंती के दिन पुष्प अर्पित करने जन्मस्थली पर पहुचते है।जय जवान जय किसान का नारा देने वाले भारत के पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादूर शास्त्री के जयंती के दिन जैसे जैसे करीब आती है प्रशासनिक अमला जोर शोर से शास्त्री जी के गुणगान करने में जुट जाता है शायद यही वजह है कि आजादी के कई दशक बीत जाने के बाद भी शास्त्री जी के मुगलसराय स्थित जन्म स्थली आज भी बदहाल है.

ये नजारा है देश के उस लाल के जन्मस्थली का जिसने अपनी पराक्रम का परिचय देकर पड़ोसी मुल्कों को भी हिला दिया था।कई दशको से एक अदद प्रतिमा को तरस रही जन्मस्थली पर कुछ अनुयायियों  ने  चोरी- छिपे एक प्रतिमा तो लगा दी लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के कारण आज भी उनकी प्रतिमा मुक्ताकाश के नीचे धूल फाक्ने को विवश है वही टूटी फूटी चहारदीवारी के बीच जन्मस्थली जुआरियो व् नशेड़ियों का अड्डा बन चुका है..कई दशक से जन्मस्थली के जीर्णोद्धार के लिए संघर्ष कर रहे कृष्णा गुप्ता बताते है कि डीएम से लेकर सीएम,पीएम व राज्यपाल तक गुहार लगा चुके लेकिन उन्हें हर बार कोरा आश्वासन ही मिला।

ये नजारा मुग़लसराय के उस विद्यालय का है जहा शास्त्री जी की प्रारंभिक शिक्षा शुरू हुई थी।वैसे तो विद्यालय के अभिलेख के अनुसार शास्त्री जी की जन्मतिथि 8 जुलाई दर्ज है लेकिन किन परिस्थितियों में 2 अक्टूबर को मनाते है ये समझ से परे है।विद्यालय के अभिलेख में कुछ चौका देने वाली बातें भी दर्ज है जिनमे लिखा है फीस न दे पाने की दशा में एक बार शास्त्री जी का नाम भी काटा जा चुका है।इस विद्यालग मे सादगी की प्रतिमूर्ति लाल बहादुर शास्त्री की प्रतिमा से छात्र छात्राएं भी सीख लेते है और उनके आदर्शों पर चलने की प्रेरणा लेते है।


लाल बहादुर शास्त्री के बारे में कहा जाता है कि इनका परिवार मुग़लसराय से रामनगर शिफ्ट हो गया था जो वाराणसी जिले में पड़ता है।शास्त्री जी इतने निर्धन परिवार से तालुकात रखते थे कि गंगा नदी पार करने के लिए पैसे नही होते थे तब वे अपने सहपाठी को बस्ता थमाकर खुद तैर कर नदी पार करके कालेज जाया करते थे।उनकी सादगी की न जाने कितनी अनगिनत कहानियां उनकी यादों से जुड़ी हैं जिन्हें याद करके आज भी उनके मोहल्ले के लोग खुद को गौरवान्वित महसूस करते है।

आजादी से अब तक न जाने कितनी सरकारे आई और उनके साथ ही शास्त्री जी के पैत्रिक आवास व् जन्म स्थान के जीर्णोद्धार के लिए न जाने कितनी दिव्य योजनाए इस धरती पर अवतरित हुई मगर आश्वासन के पुलों को पार नहीं कर पायी | आलम यह है कि शास्त्री जी अब सिर्फ जयंती के दिन ही याद किये जाने लगे हैं क्या यही एक महापुरूष को सच्ची श्रद्धांजलि है यह यक्ष प्रश्न अक्सर देश वाशियों के दिलो में कौंधता रहता है।



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