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असहमति प्रजातंत्र का सेफ्टीवॉल्व है, अगर आपने रोका तो फटेगा, सर्वोच्च न्यायालय ने वामपंथी विचारकों को जेल भेजने से रोका

असहमति प्रजातंत्र का सेफ्टीवॉल्व है, अगर आपने रोका तो फटेगा, सर्वोच्च न्यायालय ने वामपंथी विचारकों को जेल भेजने से रोका नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने आज वामपंथी विचारकों की गिरफ्तारी पर सरकार को जमकर लताड़ लगाते हुए कहा है कि मंगलवार को गिरफ़्तार किए गए पाँच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को फ़िलहाल रिमांड पर नहीं भेजा जाएगा. कोर्ट ने कहा है कि अगली सुनवाई होने तक इन सभी लोगों को घर में नज़रबंद रखा जाए. देश की सबसे बड़ी अदालत ने इन गिरफ्तारियों पर कड़ी टिप्पणी भी की है और कहा है कि असहमति प्रजातंत्र की जान है, अगर आपने इससे लोगों को रोका जाएगा तो अराजकता फैलेगी.

पुलिस की काररवाई में फंसे वामपंथी हैं विचारक और कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस.

इतिहासकार रोमिला थापर, प्रभात पटनायक, सतीश देशपांडे, देवकी जैन और माया दारुवाला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है. इस मामले की अगली सुनवाई छह सितंबर को होगी.

इन लोगों की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "जस्टिस वाईएस चंद्रचूड़ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ये बहुत दुर्भाग्य की बात है. ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है. जो दूसरों के अधिकार की बचाने की कोशिश कर रहे हैं, उनका मुँह बंद करना चाहते हैं. ये लोकतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक है."

वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर के मुताबिक़ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि विरोध की आवाज़ लोकतंत्र के लिए सेफ़्टी वॉल्व है और अगर आप सेफ्टी वाल्व को अनुमति नहीं देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएगा.

पुणे पुलिस ने मंगलवार को पाँच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया था. जबकि अदालत के आदेश की वजह से इनमें से एक को घर में नज़रबंद कर दिया गया.

पुलिस अधिकारी गिरफ़्तार लोगों को 'माओवादी हिंसा का दिमाग़' बता रहे हैं. पुलिस का ये भी कहना है कि भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा के लिए भी इन लोगों की भूमिका की जाँच की जा रही है. ये कार्रवाई आतंक निरोधी यूएपीए कानून और भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 505 (1)(बी), 117, 120 (बी) और 34 के तहत की गई.

इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ अदालत में याचिका दायर की गई और दिल्ली में भी विरोध-प्रदर्शन हुआ. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में मीडिया रिपोर्ट्स पर स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा है कि आयोग को ऐसा लगता है कि इस मामले में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है. इस कारण ये मानवाधिकार उल्लंघन का मामला हो सकता है.

एनएचआरसी ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी करके चार सप्ताह के अंदर रिपोर्ट देने को कहा है.

दिल्ली में महाराष्ट्र सदन के बाहर इन गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन होना था, लेकिन उससे पहले ही पुलिस ने सदन के बाहर बैरिकेड खड़े कर दिए थे.

पास खड़ी बसों में सुरक्षाबल के जवान बैठे थे जिन्होंने पत्रकारों तक को महाराष्ट्र सदन से दूर रखा. जिस तरह की पुलिस की तैयारियां थीं उस तादाद में प्रदर्शनकारी वहां नहीं पहुंचे.

जितने भी प्रदर्शनकारी सदन के बाहर तक पहुंचे, उन्होंने पुणे पुलिस की कार्रवाई के विरोध में नारे लगाए. कुछ प्रदर्शनकारी जहां वाम संगठन से जुड़े थे, सदन के बाहर आम लोग भी पहुंचे.

कुछ प्रदर्शनकारी नरेंद्र मोदी को ट्रंप कहकर बुला रहे थे. उनके हाथ में कई तरह के बैनर थे. एक पर लिखा था "ये लोगों को परेशान करने जैसा है." एक अन्य बैनर पर लिखा था - "ये आपातकाल है".

प्रदर्शन मे पहुंची अपर्णा ने कहा, ये सरकार अपनी सोच पूरे देश पर थोपना चाहती है ताकि सांप्रदायिक ताकतों का बचाव किया जा सके. हम चाहते हैं कि ऐसी नीतियों का सामना लोकतंत्र से किया जाए और गिरफ़्तार लोगों को तुरंत रिहा किया जाए.

रिटायर्ड वैज्ञानिक गौहर रज़ा ने कहा, "मैं इन झूठे मामलों का विरोध करता हूं. ये प्रदर्शन है आवाज़ दबाने के खिलाफ़. ये प्रदर्शन है उन लोगों के लिए जो आम जनता के लिए, दलितों के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं. ये दमन 2019 तक चलता रहेगा."

रज़ा ने कहा, "जिन लोगों ने इमरजेंसी देखी है या स्वतंत्रता संग्राम के बारे में पढ़ा है वो जानते हैं कि डर क्या होता है. और कैसे सत्ता में बैठे लोग कोशिश करते हैं कि डर से लोगों को दबा दिया जाए, उस आवाज़ को जो उनसे सवाल पूछ सकती है, या उनके वायदे उन्हें याद दिला सकती है."
क्या और कहां हुआ?

पिछले साल 31 दिसंबर को यलगार परिषद का आयोजन किया गया था. इस परिषद में माओवादियों की कथित भूमिका की जांच में लगी पुलिस ने कई राज्यों में सात कार्यकर्ताओं के घरों पर छापेमारी की और पांच कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया.

इस परिषद का आयोजन पुणे में 31 दिसंबर 2017 को किया गया था और अगले दिन 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव में दलितों को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी. महाराष्ट्र में पुणे के क़रीब भीमा कोरेगांव गांव में दलित और अगड़ी जाति के मराठाओं के बीच टकराव हुआ था.

भीमा कोरेगांव में दलितों पर हुए कथित हमले के बाद महाराष्ट्र के कई इलाकों में विरोध-प्रदर्शन किए गए. दलित समुदाय भीमा कोरेगांव में हर साल बड़ी संख्या में जुटकर उन दलितों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने 1817 में पेशवा की सेना के ख़िलाफ़ लड़ते हुए अपने प्राण गंवाए थे. ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश सेना में शामिल दलितों (महार) ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों (पेशवा) को हराया था. बाबा साहेब आंबेडकर खुद 1927 में इन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने वहां गए थे.

किनके ख़िलाफ़ की गई थी कार्रवाई?

मंगलवार सबेरे छापेमारी के बाद जो लोग गिरफ़्तार किए गए, उनमें हैदराबाद से वरवर राव, मुंबई में वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरुण फ़रेरा, फ़रीदाबाद में सुधा भारद्वाज और नई दिल्ली में गौतम नवलखा शामिल हैं. रांची में स्टैन स्वामी और गोवा में आनंद तेलतम्बदे के घर पर भी छापा मारा गया.

सुधा भारद्वाज

सुधा भारद्वाज एक वकील और ऐक्टिविस्ट हैं. वो दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में गेस्ट फ़ैकल्टी के तौर पर पढ़ाती हैं. सुधा ट्रेड यूनियन में भी शामिल हैं और मज़दूरों के मुद्दों पर काम करती हैं. उन्होंने आदिवासी अधिकार और भूमि अधिग्रहण पर एक सेमिनार में हिस्सा लिया था. वो दिल्ली न्यायिक अकादमी का भी एक हिस्सा हैं.

वरवर राव

वरवर पेंड्याला राव वामपंथ की तरफ़ झुकाव रखने वाले कवि और लेखक हैं. वो 'रेवोल्यूशनरी राइटर्स असोसिएशन' के संस्थापक भी हैं. वरवर वारंगल ज़िले के चिन्ना पेंड्याला गांव से ताल्लुक रखते हैं. उन्हें आपातकाल के दौरान भी साज़िश के कई आरोपों में गिरफ़्तार किया गया था, बाद में उन्हें आरोपमुक्त करके रिहा कर दिया था.

वरवर की रामनगर और सिकंदराबाद षड्यंत्र जैसे 20 से ज़्यादा मामलों में जांच की गई थी. उन्होंनें राज्य में माओवादी हिंसा ख़त्म करने के लिए चंद्रबाबू सरकार और माओवादी नेता गुम्माडी विट्ठल राव ने मिलकर मध्यस्थता की थी. जब वाईएस राजशेखर रेड्डी सरकार ने माओवादियों ने बातचीत की, तब भी उन्होंने मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई.

गौतम नवलखा

गौतम नवलखा एक मशहूर ऐक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने नागरिक अधिकार, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार के मुद्दों पर काम किया है. वे अंग्रेज़ी पत्रिका इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) में सलाहकार संपादक के तौर पर भी काम करते हैं.

नवलखा लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था पीपल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) से जुड़े हैं. नवलखा ने पीयूडीआर के सचिव के तौर पर भी काम किया है और इंटरनेशनल पीपल्स ट्राइब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स ऐंड जस्टिस इन कश्मीर के संयोजक के तौर पर भी काम किया है.

अरुण फ़रेरा

मुंबई के बांद्रा में जन्मे अरुण फ़रेरा मुंबई सेशंस कोर्ट और मुंबई हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं. वो अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट और देशद्रोह के अभियोग में चार साल जेल में रह चुके हैं.

अरुण फ़रेरा इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपल्स लॉयर्स के कोषाध्यक्ष भी हैं.

फ़रेरा भीमा-कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में गिरफ़्तार हुए दलित कार्यकर्ता सुधीर धावले के पक्ष में भी अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं. मुंबई के गोरेगांव और जोगेश्वरी में 1993 में हुए दंगों के पीड़ितों के बीच काम करने के बाद, अरुण फ़रेरा का रुझान मार्क्सवाद की ओर बढ़ा था. इन दंगों के बाद उन्होंने देशभक्ति युवा मंच नाम की संस्था के साथ काम करना शुरू कर दिया. इस संस्था को सरकार माओवादियों का फ़्रंट बताती थी.

वरनॉन गोंज़ाल्विस

मुंबई में रहने वाले वरनॉन गोंज़ाल्विस लेखक-कार्यकर्ता हैं. वो मुंबई विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट हैं और मुंबई के कई कॉलेजों में कॉमर्स पढ़ाते रहे हैं. उन्हें 2007 में अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया था. वो छह साल तक जेल में रहे थे.

गोंज़ाल्विस को नागपुर के ज़िला और सत्र न्यायालय ने यूएपीए की अलग-अलग धाराओं के तहत दोषी पाया था. वरनॉन की पत्नी सुज़न अब्राहम भी मानवाधिकार मामलों की एक वकील हैं. वरनन गोंज़ाल्विस के बेटे सागर अब्राहम गोंज़ांलविस ने बताया कि सब लैपटाप वगैरह के साथ बहुत सारे साहित्य साथ ले गये.

वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस के ख़िलाफ़ युएपीए या अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट के तहत कार्रवाई की गई.

1967 में ये कानून पेश किया गया था जिसका मक़सद 'भारत की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा है.' इसके तहत पुलिस 'आतंकी गतिविधियों या गैरकानूनी हरकतों का साथ देने वालों' को बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है या उनके यहां छापेमारी कर सकती है.

छापे के दौरान कोई भी अधिकारी कोई भी सामान ज़ब्त कर सकता है. जिस पर आरोप लगा है, वो ज़मानत के लिए आवेदन नहीं कर सकता और पुलिस के पास चार्जशीट दाख़िल कराने के लिए 90 के बजाय 180 दिनों का वक़्त होता है.

गिरफ़्तार व्यक्ति के अधिकार?

संविधान के आर्टिकल 22 में हिरासत में लिए गए या गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति के अधिकारों का ज़िक्र है. पहला, जैसे ही किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाता है, उसे इसका कारण बताया जाता है.

हिरासत में लिए जाने या गिरफ़्तारी के 24 घंटों के भीतर अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है. साथ ही पैरवी करने के लिए वक़ील की सेवाएं लेने का अधिकार भी दिया जाता है.
अर्बन नक्सल क्या बला है?

लोग सोशल मीडिया पर इन गिरफ़्तारियों के पक्ष और विपक्ष में दलीलें दे रहे हैं. इस कार्रवाई का समर्थन करने वाले गिरफ़्तार लोगों को अर्बन नक्सल का नाम दे रहे हैं. लेकिन क्या टर्म है, कहां से आई और इसके क्या मायने हैं.

माना जाता है कि सरकार के ख़िलाफ़ हथियार उठाने वाले नक्सली ग्रामीण इलाकों और जंगली क्षेत्र में रहते हैं. लेकिन अर्बन नक्सल से यहां मायने शहरों में बसे उन लोगों से है, जो इन नक्सलियों से सहानुभूति रखते हैं.
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