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ठंडाई और भांग के बीच अटल और बनारस, एक अलहदा नाता

ठंडाई और भांग के बीच अटल और बनारस, एक अलहदा नाता वाराणसीः भारतीय राजनीति के पार्श्व स्वरूप से लेकर वर्तमान स्वरूप तक अगर कुछ समवेत रहा तो उसे अटल बिहारी बाजपेयी के नाम से ही जाना जाएगा. तमाम राजनीतिक विरोधाभास और गतिरोध के बावजूद एक अल्हड़ व्यक्तित्व के स्वामी अटल ने देश की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाले शहर बनारस और पौराणिक काशी के साम्य के साथ शायद इस शहर के अघोर रहस्य को भी जिया होगा.

कभी पान कभी ठंडाई और कभी भांग के बीच अटल और बनारस ने एक दूसरे को बखूबी समझा होगा. शायद यही वजह रही होगी कि अटल ने इस शहर के साथ अपने रिश्ते को लंबे समय तक बरकरार रखा.

बनारस और अटल बिहारी बाजपेयी के बीच का रिश्ता भी एक दिन इस शहर की गलियों में दफन हो जाएगा. ऐसा सोचकर उनके किसी भी चाहने वाले को रंज ही होगा. बहरहाल, अटल की काशी और काशी के अटल के बीच के तार को अगर जोड़ें तो साफ है कि अटल ने वाराणसी से गैर सांप्रदायिक और वैश्विक स्वरूप को समझ बूझ कर ही शायद अपनी राजनीति की दशा और दिशा तय की होगी.

काशी के अटल या बनारस के अटल में अगर समानताएं हैं तो भिन्नता भी उतनी ही हैं. काशी के अटल बीजेपी और संघ के अटल हैं. हिंदुत्व और कट्टरवाद के अटल हैं. लेकिन बनारस के अटल ठंडाई और पान के अटल हैं. वे जमीन पर बैठ कर पंगत में खाने वाले, रिक्शे पर बैठ कर रात में शहर को नापने वाले और इस शहर की समाजवादी और गैर राजनीतिक छवि को अपने भीतर घोलने के बाद खुल कर ठठा कर हंसकर जीने वाले अटल हैं. दस्तावेजों में अटल और वाराणसी का रिश्ता 1942 से लेकर 2005 तक लगातार बना दिखता है. लेकिन बाद में यहां न आ पाने के क्रम में भी उनके ह्रदय में एक छोटा सा बनारस जरूर बसता रहा होगा.

वाराणसी और अटल के आधिकारिक रिश्तों को खोजने के क्रम में इतिहास के पन्नों को पलटने पर साल 1942 का ज़िक्र सबसे पहले आता है. तब अटल बिहारी बाजपेयी ने चेतगंज के हबीबपुरा के एक मोहल्ले से निकलने वाले अखबार ‘समाचार’ में लिखना शुरू किया था. तब के आधा पैसा कीमत वाले इस प्रात:कालीन अखबार के संपादक मोहनलाल गुप्त ‘भैयाजी बनारसी’ थे.

भैयाजी बनारसी का स्थान वाराणसी के विशिष्ट लोगों में रहा है. भैयाजी ने समाचार और अन्य आलेखों के अलाव अटल की कई आरंभिक कविताओं को भी अपने समाचार पत्र में स्थान दिया. इससे वाजपेयी को बनारस के अलहदा उत्सव धर्मी समाज को समझने का एक बड़ा मौका मिला. इसके अलावा इसी अखबार के माध्यम से उन्होंने नाना जी देशमुख और बाला साहब देवरस से भी संपर्क स्थापित किया. इसके बाद उन्होंने उस दौर में बनारस के एकमात्र सांध्यकालीन समाचार पत्र 'स्वदेश' के लिए काम करते हुए वाराणसी के कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों में समाचार संकलन भी किया था.

महात्मा गांधी की हत्या के बाद पुलिस से बचने के क्रम में भी अटल को इस शहर की घुमावदार गलियों में ही सुरक्षित स्थान मिला. उन्होंने दुग्ध विनायक मोहल्ले में संघ से जुड़े डा राजाराम द्रविड़ के मकान में आश्रय लिया. इसके बाद वे वहां कई महीनों तक रहे. पुरबिया भाषा में ऐसे काम को फरारी काटना कहा जाता है. ऐसे में अगर बनारस के चिर परिचित अंदाज में कहें तो उस मोहल्ले और उसके आसपास के मोहल्ले वाले भी बड़े गर्व से कहते नहीं थकते थे कि 'इंहा अटल जी फरारी कटले हउअन.'

इतना ही नहीं बल्कि इसके अलावा एक प्रसंग की चर्चा भी खूब होती है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध के दौर में कांग्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ नेता वीरेश्वर अय्यर ने उन्हें पुलिस से बचाया था. राजनीतिक विचारधारा में असमानताएं होने के बावजूद भी इस प्रकार के प्रेम का प्रदर्शन सिर्फ बनारस में संभव था जिसका लाभ अटल को मौके बेमौके मिलता रहा.

उनके साथ लंबा समय काटने वाले बनारस के सैकड़ों नाम अटल जी से पहले चले गए. लेकिन उनसे जुड़े लोगों के लिए हमेशा अटल की स्मृतियां किस्सों के मानिंद बाहर आती रही हैं. अटल जी के ख़ास हरिश्चंद्र श्रीवास्तव 'हरीश जी' आज नहीं हैं. पूर्व सांसद शंकर प्रसाद जायसवाल भी नहीं हैं लेकिन जो हैं उन्हें कुछ भूला भी नहीं है.

अटल जी को पत्रकारिता में पहला मौका देने वाले भैय्याजी बनारसी के परिवार की तीसरी पीढ़ी से आने वाले उनके पौत्र और वरिष्ठ पत्रकार राजेश गुप्ता बताते हैं, 'अटल जी के बारे में बचपन से ही जितना सुना और समझा उसके बाद सिर्फ इतना ही लगता था कि शायद वे हमारे घर के ही सदस्य हैं. बाद में पत्रकारिता जीवन में जितनी बार भी उनके भाषण सुने या उनके समाचार का संकलन किया तो लगा कि जितना भी सुनता था वो सब शत प्रतिशत सच ही था.'

राजेश एक और वाकया बताते हैं जब एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में काम करने के दौरान उन्हें अटल जी को करीब से देखने का मौका मिला था. 'उन दिनों वे प्रधानमंत्री थे और वे एक पंचसितारा होटल में रुके थे. सुरक्षा कारणों से पत्रकारों का अंदर जाना मना था लेकिन मैं किसे तरह पहले से अंदर पहुंच गया था. बाद में मैंने खबर लिखी कि अटल जी ने नहाने के लिए लोटा और बाल्टी की मांग की थी. इसके अलावा रात में सुश्री किशोरी अमोनकर के गायन की सीडी मंगवा कर अपने सुइट में रात भर बजवाना और आधी रात को पान मंगवाने की बात या तो मैं जानता हूं या तब के सुरक्षाकर्मी और तत्कालीन होटल स्टाफ. खैर यह सब अब इतिहास है. आखिरी बार 2005 दिसंबर में न्याय यात्रा के दौरान देखने पर भी वे वैसे ही दिखे जैसा उन्हें पहली बार देखा था.'

ठीक इसी तरह 1996 में कशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी बीएचयू छात्रसंघ का उद्घाटन करने पहुंचे थे. उस दृश्य को याद करते हुए पूर्व छात्र नेता भूपेंद्र प्रताप सिंह 'रिंटू' बताते हैं, 'उस बार अटल के लिए एंपीथियेटर से लेकर लंका गेट और आगे पीछे के सभी रास्तों पर सिर्फ युवाओं की भीड़ थी. मैंने उस बार यह नारा दिया 'अबकी बारी अटल बिहारी' जो बाद में राष्ट्रीय नारा बन गया. वे हम सब के लिए अभिभावक थे और हमारे लिए युवा थे. हमारी जिंदगी का एक हिस्सा आज अटल जी के साथ चला गया है. इस नुकसान को हम शायद ही कभी भर पाएं.'

अटल और बनारस के रिश्ते में कई दशक हैं. उनका जाना काशी के एक पुरनिया (बुजुर्ग) के जाने जैसा है. जिसके जाने के बाद हर खास-ओ-आम को तकलीफ है. उनके चाहने वाले आनंद कृष्ण कहते हैं, 'जनतंत्र तक अटल का नाम रहेगा और काशी के मूल स्वरूप के रहने तक अटल और काशी का रिश्ता अटूट रहेगा की युक्ति को मान लेने के सिवा और कोई तर्क नहीं है.'

बनारस के चौराहे और गलियां अटल की यादों को सजोकर अनंतकाल तक ले जाएंगी या नहीं लेकिन बनारस अटल के जाने के बाद शायद एक कोने में अधूरा हो गया है. अघोर की नगरी के मूल चरित्र को समझने-बूझने और इसे कभी न बदलने वाला अटल रूपी साधक अपने प्रयाण के बाद शायद इस महाश्मशान के अघोर स्वरूप में कहीं घुला रह जाएगा.
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