विकृत समाज: भारत में मानव समाज का अस्तित्व

डॉ० रवि प्रकाश श्रीवास्तव , Jul 26, 2018, 16:56 pm IST
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विकृत समाज: भारत में मानव समाज का अस्तित्व
विकृत समाज भारत में मानव समाज का अस्तित्व हजारों वर्ष पूर्व से सिद्ध है परन्तु जातीय व्यवस्था के निर्माण के किसी निश्चित काल का अनुमान नहीं मिलता। 2600 ईसापूर्व से 1900 ईसापूर्व की सिन्धु घाटी के निवासियों की जातियता का प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।
सामाजिक व्यवस्था के विकास में वेदों की भूमिका महत्वपूर्ण है। वर्ण का परिचय ऋग्वेद के 10 वें मंडल से प्रारम्भ होता है, जिसमें यह उदघोषित किया गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैष्य और शूद्र सृष्टि के समय परम पुरुष ब्रह्मा के क्रमषः मुख, भुजाओं, जंघा तथा चरणों से प्रकट हुए। विधिवेत्ताओं की दृष्टि में प्रत्येक वर्ण के लिये उत्तरदायित्वों के पृथक-पृथक समूह बनाये तदनुसार ब्राह्मण का कार्य अध्ययन, अध्यापन और सलाह देना था, क्षत्रिय व सामन्तों का कार्य राज एवं रक्षा करना था, वैष्य का कार्य उत्पादन एवं व्यवसाय करना था तथा शूद्र का कार्य सेवा करना था।

वास्तव में जाति व्यवस्था अस्तित्व में कब आयी इसकी कोई समय निश्चित नहीं है। मनुस्मृति के अनुसार, भारत में जाति प्रथा के अन्तर्गत लोगों के लिये उनके व्यवसाय के आधार पर कोड वर्णित किये जाते थे, इस प्रकार ये उनके व्यवसाय पर आधारित होती थी परन्तु लोगों के व्यवसाय विरासत बन गये और जाति व्यवस्था भी व्यवसाय से जन्म में विरासत के रूप में बदल गयी। कालांतर में एक व्यक्ति की जाति उसके जन्म के आधार पर निर्धारित होती गयी।

हालांकि इस व्यवस्था की शुरुआत में, शूद्रों एवं अछूतों से उच्च जाति के लोगों द्वारा दासों की तरह वर्ताव किया जाता था। परन्तु, बहुत से समाज सुधारक अपना सारा जीवन शूद्र जनों के उद्धार के लिये लगा दिया और जाति प्रथा के उन्मूलन के लिये बहुत से सुधार आन्दोलन चलाये।

भारत ने आजादी के बाद संविधान का निर्माण किया। संविधान निर्माताओं का विचार था कि संविधान मे इस तरह के प्रावधान जोडे जायें जो जति प्रथा की बुराइयों को कम कर सके और सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय; विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समानता स्थापित की जा सके।

स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी राजनीतिज्ञों द्वारा अपने निहित स्वार्थ के लिए ऊंच-नीच, धनी-निर्धन, खान-पान का स्तर, शिक्षा-दीक्षा का स्तर का मापक जाति को ही बनाये रखने को तत्पर हैं और तो और न्यायपालिका भी सामाजिक स्तर का पैमाना जति को ही मानकर चल रही है जिससे समाज जाति प्रथा को कयाम रखने के लिए मजबूर है।

एक दलित का पुत्र डॉक्टर बन जाए, इतने से समस्या हल नहीं हो जाती जब तक दलित डॉक्टर को  सवर्ण डॉक्टर के समान प्रेम व आदर नहीं मिलेगा तब तक परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं होगा। नोकरी और शिक्षा ही काफी नहीं है। इससे आगे जाना है और यही बात डॉ० बाबा साहब ने कही है।

उन्होंने यह भी कहा है, " सौ-डेढ़ सौ करोड़ रुपये तुम सब को धंधा-रोजगार दिला देंगे। इतने ही रुपये शायद तुम्हारे मकान बनाने के लिए मिल जायें परन्तु हमारे समाज में जति भेद का जो रोग फैल गया है, इसमें चाहे मकान बनगया हो, धंधा बहुत ही अच्छा चलता हो, कपड़े भी साफ- सफेद पहनें हों और अंग्रेजी भी फर्राटेदार बोलते हों। तो भी समाज की मानसिकता नहीं बदल जायेगी।

आज जाति में एक वंशानुगत समूह होता है जो अपने सामाजिक स्थिति को परिभाषित करते हैं। आजादी के इतने सालों बाद भी जाति पर आधारित सीमांकन आज भी होता है। हालांकि समय के अनुसार कार्य क्षेत्रों एवं विवाह व्यवस्था आदि में बदलाव आ रहा है। शिक्षित एवं शहरी इलाकों में ज्यादा बदलाव हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न जातियों में अंतर स्पस्ट हो जाता है।

कभी-कभी जाति-आधारित अंतर एक हिंसक मोड़ ले लेता है और जातियों के आधार पर अलग-अलग समूहों के बीच हिंसा का कारण भी बनता है। जिसका मूल कारण राजनयिकों एवं बिरोधी सामाजिक तत्व अपने निहित स्वार्थ को बढ़ावा देने के लिए जति व्यवस्था का उपयोग करते हैं।

समाज में व्याप्त जातिगत विसंगतियों को दूर करने की दृढ़ इक्षा शक्ति के साथ यदि राजनितिज्ञों एवं न्यायाधीशों के द्वारा संवैधानिक प्रावधानों को परिवर्तित कर के समाज के अति पिछड़े, दलितों एवं उपेक्षित लोगों को उनके जाति के आधार को अस्वीकार कर के उनके पास उपलब्ध भूमि, भवन, व्यवसाय, नोकरी एवं आय के साधन के आधार पर आर्थिक मूल्यांकन किया जाए तो समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव अपने आप समाप्त हो जायेगा। तभी भारत का समग्र विकास एवं सामाजिक समरसता सम्भव है।
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