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भाजपा के करीबी धार्मिक नेता भय्यूजी महाराज ने खुद को गोली मारी, अस्पताल में मौत

भाजपा के करीबी धार्मिक नेता भय्यूजी महाराज ने खुद को गोली मारी, अस्पताल में मौत इंदौरः भारतीय जनता पार्टी से करीबी संबंध रखने वाले धार्मिक नेता और अपने समर्थकों के बीच कथित आध्यात्मिक और सियासी रसूख रखने वाले भय्यूजी महाराज ने खुद को गोली मारकर खुदकुशी कर ली है. उन्होंने अपने सिर में गोली मारी थी. जिसके बाद उन्हें तुरंत इंदौर के बॉम्बे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. अभी तक उनकी खुदकुशी के कारण का पता नहीं चल सका है. भय्यूजी ने पहली पत्नी की मौत के बाद पिछले साल ही दूसरी शादी की थी.

जानकारी के अनुसार, भय्यू महाराज ने मंगलवार दोपहर को सिल्वर स्प्रिंग स्थित अपने बंगले की दूसरी मंजिल पर खुद को गोली मार ली. बताया जा रहा है कि पिछले तीन दिनों से पारिवारिक विवाद की वजह से वह काफी परेशान थे. इस वजह से डिप्रेशन के चलते उन्होंने खुद को गोली मार ली.

बता दें कि भय्यूजी राजनीति में गहरी पैठ रखते थे. हाल ही में शिवराज सरकार ने उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया था. हालांकि उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार के इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था. उन्होंने कहा था कि संतों के लिए पद का महत्व नहीं होता. उन्होंने कहा था कि हमारे लिए लोगों की सेवा का महत्व है. पर सेवा भी वह वही चुनते थे, जिसमें मेवा की उम्मीद न भी हो तो उनका वजन बढ़ाए.

भय्यूजी महाराज का पूरा नाम उदय सिंह देशमुख था. उनके शिष्य उन्हें गृहस्थ संत कहते थे, पर भौतिक चीजों से उनका लगाव कुछ और ही हकीकत बयान करता था. धार्मिक गुरु का चोला पहनने से पहले 21 साल की उम्र में उन्होंने कुछ वक्त के लिए मॉडलिंग भी की थी.

भय्यूजी मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में लोगों के बीच जाने-जाते थे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान बनी 2011 दिसंबर में, जब उन्होंने अन्ना और सरकार के बीच बातचीत की भूमिका निभाई और अन्ना का अनशन खत्म कराया. तब महाराष्ट्र के नेता और केंद्रीय मंत्री रहे विलासराव देशमुख के कहने पर भय्यूजी मध्यस्थ बने थे.

मध्यप्रदेश सरकार ने साधु-संतों को लुभाने के लिए पांच संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिया था, इसमें भय्यू महाराज भी शामिल थे. हालांकि भय्यू महाराज ने कहा था कि वो राज्य मंत्री दर्जे का कोई सरकारी लाभ नहीं लेंगे. भय्यू महाराज ने कहा था, 'प्रदेश सरकार ने मुझे नर्मदा नदी की रक्षा के लिये बनाई गई विशेष समिति में शामिल कर मुझ पर जो भरोसा जताया है. उस पर मैं एक आम नागरिक की तरह खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा. लेकिन मैं राज्य मंत्री के दर्जे का किसी तरह का सरकारी लाभ नहीं लूंगा..

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में रहने वाले भय्यूजी महाराज का राजनीति से जुड़ने का महाराष्ट्र कनेक्शन है. उनका पैतृक गांव महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में आता है. ऐसे में उनका अपने गांव में आना-जाना रहता था. राजनीतिक नेताओं से संपर्क कांग्रेस नेता अनिल देशमुख के जरिए हुआ. साल 1995 में वो महाराष्ट्र के नेता अनिल देशमुख के जरिए महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख से जुड़े. मराठा होने के नाते भी भय्यूजी का प्रभाव महाराष्ट्र की राजनीति में रहा है.

कहा जाता है कि पूर्व सीएम विलासराव देशमुख से नजदीकी की वजह से भय्यूजी की महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में तेजी से पैठ बढ़ी. 2000 में जब विलासराव मुख्यमंत्री थे, तब भय्यूजी का अधिकतर समय महाराष्ट्र में ही गुजरता था. उस वक्त उन्हें महाराष्ट्र में राजकीय अतिथि का दर्जा भी दिया गया था.

कांग्रेस के नेता तो भय्यूजी से प्रभावित थे ही, एनसीपी और बीजेपी के नेता भी उन्हें सम्मान देते रहे हैं. बीजेपी नेता गोपीनाथ मुंडे और नितिन गडकरी से भी उनकी नजदीकियां रही हैं.

साल 2008 से भय्यूजी शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के काफी करीबी हो गए. बाला साहब ठाकरे और उद्धव, दोनों नियमित तौर पर भय्यूजी से अपने घर मातोश्री में मिला करते थे. बाला साहब के निधन के वक्त भी भय्यूजी के मार्गदर्शन में ही बाला साहब का अंतिम संस्कार किया गया और वो पूरे वक्त उद्धव ठाकरे परिवार के साथ मौजूद रहे.

भय्यूजी का इस्तेमाल नेता संकटमोचक के तौर पर भी किया करते थे. साल 2011 में अन्ना हजारे का आंदोलन खत्म कराने में मध्यस्थता की. एमएनएस अध्यक्ष राज ठाकरे भी भय्यूजी के भक्तों में जाना जाते हैं. हालांकि राज ठाकरे की नजदीकी कुछ साल पहले से भी बढ़ी है.

फिलहाल  आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और भय्यूजी के सम्बन्ध बेहद घनिष्ठ बताये जाते थे. करीब-करीब सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से उनके संपर्क थे. यही वजह है कि किसी भी पार्टी के नेता भय्यूजी की आलोचना करने से बचते रहे हैं.

भय्यूजी के बारे में मशहूर है कि वो महंगी लग्जरी कारों और स्विस घड़ियों के शौकीन थे. कुछ साल पहले उनकी पहली पत्नी का देहांत होने के बाद उन्होंने दूसरी शादी की. वो अक्सर कहते हैं, सबकी पहली जिम्मेदारी परिवार है, उसके बाद समाज. इसमें धर्म कब कहां और कैसे घुस गया पता नहीम

पीएम बनने के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी सद्भावना उपवास पर बैठे थे। तब उपवास खुलवाने के लिए उन्होंने देश भर के शीर्ष संत, महात्मा और धर्मगुरुओं को आमंत्रित किया था। उसमें भय्यू महाराज भी शामिल थे.
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