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मीडिया आजादी से पहले और बादः पत्रकारिता और पैसे के प्रलोभन का व्यभिचार वेश्यावृत्ति जितना आदिकालीन

मीडिया आजादी से पहले और बादः पत्रकारिता और पैसे के प्रलोभन का व्यभिचार वेश्यावृत्ति जितना आदिकालीन "कभी भारत में पत्रकारिता का पेशा एक व्यवसाय था। अब वह व्यापार बन गया है। वह तो साबुन बनाने जैसा हो गया है। उससे अधिक कुछ भी नहीं। उसमें कोई नैतिक दायित्व नहीं रह गया है। वह स्वयं को जनता का जिम्मेदार सलाहकार नहीं मानता। भारत की पत्रकारिता इस बात को अपना सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि कर्तव्य नहीं मानती कि वह तटस्थ भाव से निष्पक्ष समाचार दे। वह सार्वजनिक नीति के उस पक्ष को प्रस्तुत करे, जिसे वह समाज के लिए हितकारी समझे। चाहे कोई कितने भी ऊंचे पद पर हो, उसकी परवाह किए बिना और निर्भीक होकर उन सभी को सीधा करे और बिना किसी भय के लताड़े, जिन्होंने ग़लत अथवा उजाड़ पंथ का अनुसरण किया है।

‘‘उसका तो प्रमुख कर्तव्य हो गया है कि वह नायकत्व को स्वीकार करे और उसकी पूजा करे। उसकी छत्रछाया में समाचार पत्रों का स्थान सनसनी ने और विवेकसम्मत मत का विवेकहीन भावावेश ने ले लिया है। लार्ड सेलिसबरी ने नार्थक्लिप पत्रकारिता के बारे में कहा है कि वह तो कार्यालय-कर्मचारियों का लेखन है। भारतीय पत्रकारिता तो उससे भी दो कदम आगे निकल गई है। वह तो ऐसा लेखन है, जैसे ढिंढोरचियों ने अपने नायकों का ढिंढोरा पीटा हो। नायक पूजा के प्रचार-प्रसार के लिए कभी भी इतनी नामसझी से देशहित की बलि नहीं चढ़ाई गई है। नायकों के प्रति ऐसी अंधभक्ति तो कभी देखने में नहीं आई, जैसी कि आज चल रही है। कुछ अपवाद भी हैं, लेकिन वे ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। उनकी बातों को सदा ही अनसुना कर दिया जाता है।

ऐसा लगता है ये पंक्तियां हमारी आज की पत्रकारिता के बारे में किसी क्षुब्ध व्यक्ति ने कही हैं। लेकिन सच ये है कि ये पंक्तियां उस भाषण से ली गई हैं, जो डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 18 जनवरी 1943 को पूना के गोखले मेमोरियल हॉल में महादेव गोविंद रानाडे के 101वें जयंती समारोह में दिया था। इस भाषण में अंबेडकर ने आज़ादी से पहले के यानी अपने समय के मीडिया और राजनीति की दुर्भिसंधियों और पतनोन्मुख संस्कृति का खुलकर जिक्र किया है। आज भले कोबरा पोस्ट के स्टिंग, टू-जी स्पैक्ट्रम घोटाले से लेकर पेड न्यूज जैसे विभिन्न प्रकरणों तक मीडिया के भीतर छद्म प्रतिष्ठा अर्जित कर सेलिब्रिटी बने चेहरों पर दाग-धब्बे साफ़ नज़र आ रहे हों, लेकिन इसके बीज तो आजादी से पहले ही पड़ गए थे।

मैं जब कभी किसी का राजनीति या पत्रकारिता पर भाषण सुनता हूं, कुछ लिखा पढ़ता हूं या किसी से संवाद करता हूं तो सबसे पहले कहा जाता है कि आज़ादी से पहले मीडिया एक मिशन था, लेकिन आज वह व्यापार हो गया है। आज जगह-जगह कहा जाता है कि मीडिया और राजनेताओं की मिलीभगत के कारण अब चुनाव जैसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक पर्व के दौरान जनता से जुड़े मुद्दों, राजनीतिक समझ और लोकतांत्रिक विचारों की हत्या हो रही है। प्रभुत्ववादी लोगों की बात सुनी जाती है और प्रभुत्वहीन जनता की बातें अनुसनी कर दी जाती हैं। लेकिन मैं जब डॉ. भीमराव अंबेडकर, डॉ. राममनोहर लोहिया या किसी अन्य निर्भीक सत्यवादी आंदोलनकारी को पढ़ता हूं तो साफ़ लगता है कि आज जैसी ही बुराइयां हमारे मीडिया और हमारे राजनैतिक समाज में आज़ादी से पहले ही बहुत व्यापक रूप से चिंताजनक ढंग से आ गई थीं। लेकिन अतीत का गौरव ऐसा है कि हम कभी भी अतीत के बुरे पक्ष को नहीं देखते। अपने गौरवगान में व्यस्त हो जाते हैं। लेकिन मैं जब उस समय के राजनेताओं के पत्र, संस्मरण और ख़बरें पढ़ता हूं तो लगता है कि आज जैसी ही कमीनगी पहले भी थी। और कुछ मामलों में तो हमारे पुरखे हमारे वर्तमान राजनेताओं को भी मात करते थे।

मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरी बात बहुत से मेरे वरिष्ठ लोगों को बहुत नागवार लगेंगी, क्योंकि हमें अपने नायकों को प्रभु और स्वयं भक्त रूप में ही प्रस्तुत करने की आदत है।

हालांकि मेरे कहने का यह तात्पर्य कतई नहीं कि मैं वर्तमान पत्रकारिता या राजनीति में आ चुकी बुराइयों का समर्थन करूं या कहूं कि कल की बुराइयों को याद करके आज की बुराइयों से मुंह फेरा जा सकता है। लेकिन मेरा विनम्र निवेदन इतना है कि किसी भी संस्कृति का वर्तमान अपने अतीत की आधारशिला पर ही खड़ा होता है और वह वहीं से ऊर्जा ग्रहण करता है। भले राजनीति हो या पत्रकारिता, भले शिक्षा हो या संस्कृति, हर मामले में हमें यथार्थवादी होकर अपने वर्तमान को सुधारने के लिए नए कानूनों और नई परंपराओं को आत्मसात करना होगा।

सच बात तो यह है कि हमारे अतीत के नायक हमारे वर्तमान का कोई भला नहीं कर सकते। अगर वही कुछ करते तो आज इतना पतन नहीं होता। और तो और, हमारे महानायकों ने भी पत्रकारिता की इस संस्कृति का कम पोषण नहीं किया।

सचमुच लोकतंत्र और संस्कृति के लिहाज से यह बहुत दुर्भाग्य से भरा और डर में डूब समय है, क्योंकि राजनीति, मीडिया और समाज के पतन के लेकर चारों तरफ चिंताएं व्याप्त हैं। लेकिन सच तो यह है कि ये सब बोया हुआ काटने का ही नतीजा है। इससे अलग कुछ नहीं। अगर आजादी वाले दौर में मीडिया और राजनीति के रिश्तों की पड़ताल करें तो सारे निर्मम सच उजागर हो जाते हैं। हालांकि पुराने दौर को बहुत आदर्शपूर्ण बताया जाता है, लेकिन तथ्यों को देखें तो यह सोचना मिथ्या अभिमान से ज्यादा कुछ नहीं। आज ज्यादातर लोग इसी विश्वास में गर्क हैं कि अतीत के सामाजिक लोग, राजनेता और पत्रकार बहुत महान थे। और वे सब होते तो सीना तानकर चलने वाले अपराधियों को संरक्षण देने का तो सवाल ही नहीं था, रुपए-पैसे का भी आज जैसा बोलबाला नहीं रहता।

लेकिन भारतीय राजनीति के तेजस्वी लोकनेता राम मनोहर लोहिया के लोकसभा में दिए गए भाषणों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि आजादी के शुरुआती दशकों में हमारी पत्रकारिता किस पतनावस्था में जी रही थी। प्रेस बिल पर दिए गए उनके भाषणों में साफ़ कहा गया है कि जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक असरदार ब्यूरोक्रैट, सत्ताधारी राजनेता और चालाक धनपति मीडिया को किस तरह अपने हित में इस्तेमाल कर रहे हैं। लोहिया ने पंडित नेहरू की उपस्थिति में लोकसभा में कहा, मैं जहां भी जाता हूं, कलेक्टर पत्रकारों से कहकर मेरी ख़बरें नहीं छपने देते। यह सब आपकी पार्टी करती है।

आख़िर मीडिया और राजनीति के रिश्तों के बीच लोकतांत्रिक दायित्वों के पतन और उत्थान, द्वंद्व और अंतर्द्वंद्व तथा हर्ष और विषाद से जुड़े इस यथार्थ की पड़ताल ऐसी है कि आपको अपने महानायकों पर शर्म आएगी। आप एक किस्सा सुनिए। हैरान रह जाएंगे। प्रमुख विचारक और आंदोलनकारी डॉ. भीमराव अंबेडकर को पूना के गोखले मेमोरियल हॉल में 18 जनवरी 1943 को महादेव गोविंद रानाडे के 101वें जयंती समारोह में मुख्य वक्ता के तौर पर बुलाया गया। अंबेडकर ने इस भाषण में जो कुछ कहा, वह भारतीय राजनीति और पत्रकारिता के रिश्तों की ऐसी तस्वीर दिखाता है कि अतीत से आत्मीयता रखने वाले बहुत से लोगों के चेहरे तकलीफ से विकृत हो जाएंगे। लेकिन यह भी सच है कि इस यथार्थ को जाने बिना आज की राजनीति, पत्रकारिता और हमारे अतीत के महान नेताओं का असली चेहरा सामने आ ही नहीं सकता।

अंबेडकर ने आज से 75 साल पहले आजादी के मरजीवड़ों वाले और मिशनरी मीडिया के उस दौर की असलियत बखान करते हुए कहा महात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना को मीडिया और राजनीति की दुर्भिसंधि के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

डॉ. अंबेडकर ने कहा: ‘‘समाचार पत्रों की वाहवाही का कवच धारण करके इन दोनों महानुभावों (महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना) ने प्रभुत्व जमाने की भावना से भारतीय राजनीति को भ्रष्ट बना दिया है। इन दोनों ने अपने प्रभुत्व से अपने आधे अनुयायियों को मूर्ख तथा शेष आधों को पाखंडी बना दिया है। अपनी सर्वोच्चता के दुर्ग को सुदृढ़ करने में उन्होंने बड़े व्यापारिक घरानों तथा धनकुबेरों की सहायता ली है। हमारे देश में पहली बार पैसा संगठित शक्ति के रूप में मैदान में उतरा है।

संभवत: बहुत से लोगों को डॉ. अंबेडकर की यह टिप्पणी नागवार गुजरेगी, क्योंकि उनकी नज़रों में आजादी के दौर का हमारा गौरवशाली अतीत वर्तमान की तुलना में बहुत महान था। लेकिन क्या अंबेडकर के कहे इन शब्दों से उस दौर के मीडिया, समाज और राजनीति की जो तस्वीर उभरती है, वह आज से जरा भी अलग है?

आज की राजनीति और पत्रकारिता के स्तर और कार्य-व्यवहार को लेकर कई तरह की टिप्पणियां सुनने को मिलती हैं। कहने वाले कहते हैं कि न कहीं आंदोलन की आहट है और न रोशनी की कोई फांक दिखाई देती है। लोगों को लगता है कि चारों तरफ अवसाद के अंधेरे के अलावा कुछ नहीं है।

लेकिन 1943 के सामाजिक यथार्थ के बारे में अगर अंबेडकर के इन विचारों को पढ़ेंगे तो शायद हम मीडिया और राजनीति में छाए भ्रष्टाचार की एक झलक पा सकें। अंबेडकर ने उस भाषण में कहा : "हमारे देश में पहली बार पैसा संगठित शक्ति के रूप में मैदान में उतरा है।" यह कथन गांधीवादी कार्यशैली और आजादी से पहले की पत्रकारिता का ऐसा चेहरा सामने लाता है, जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते।

अगर अंबेडकर ने यह बात 1943 में नहीं कही होती तो हममें से शायद ही कोई भरोसा करता कि पत्रकारिता और पैसे के प्रलोभन का यह व्यभिचार वेश्यावृत्ति जैसा ही आदिकालीन है। और यह व्यभिचारिता करने वाले लोग न पहले कम थे और न आज। इनके कद बड़े या छोटे हो सकते हैं।

अंबेडकर ने अपने इसी भाषण में कहा था: ‘‘शासन कौन करेगा? पैसा या इनसान? कौन नेतृत्व देगा? पैसा या प्रतिभा? सार्वजनिक पदों पर आसीन कौन होगा? शिक्षित, स्वतंत्र, देशभक्त या पूंजीवान गुटों के सामंती दास? भारतीय राजनीति का हिन्दूवंश अध्यात्म की ओर से उन्मुख होने के बजाय नख से शिख तक अर्थ प्रधान और धन लोलुप हो गया है। यहां तक कि वह भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया है। अनेक सुसंस्कृत व्यक्ति इस मलकुंड से कतरा रहे हैं। राजनीति तो असहनीय गंदगी और मल वाले गंदे नाले जैसी हो गई है। राजनीति में भाग लेने और गंदी नाली साफ करने में कोई भेद नहीं रह गया है। (‘रानाडे, गांधी और जिन्ना : बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वाड्.मय’, पेज : 274)

फिर से देखिए कि अंबेडकर क्या कह रहे हैं? वे कह रहे हैं, हिन्दूवंश नख से शिख तक भ्रष्ट और धनलोलुप है। राजनीति असहनीय गंदगी वाला मलकुुंड हो गई है। कब? जबकि गांधी से लेकर सावरकर तक सब पर अंबेडकर की सजग निगाहें थीं। वे बता रहे थे कि भारतीय राजनेता पूंजीवादी गुटों के दास हैं और पैसे ने इनसानियत को अपदस्थ कर दिया है।

इससे यह वास्तविकता सामने आ जाती है कि औद्योगिक घरानों के वर्चस्व वाले भारतीय मीडिया ने सरकारों और उस दौर के सबसे शक्तिशाली और प्रमुख नेताओं की मूल नीतियों और उनके गौरवान्वयन का काम 1947 से बहुत पहले शुरू हो चुका था। दरअसल भारतीय समाज और संस्कृति के बाजारीकरण का दौर तभी शुरू हो गया था।

डॉ. अंबेडकर ने महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली राजनीति को लेकर जो कुछ कहा, वह बहुत चौंकाने वाला और आकर्षक है: ‘‘इन दो महापुरुषों के हाथों में राजनीति बेतुके कामों की होड़ बनकर रह गई है। यदि गांधी जी को महात्मा गांधी कहा जाता है तो जिन्ना को कायदे-आजम कहा ही जाना चाहिए। यदि गांधी की कांग्रेस है तो जिन्ना की मुस्लिम लीग होनी ही चाहिए। . . .कब उनके बीच कोई समझौता होगा। निकट भविष्य में तो कोई आशा नहीं है। वे केवल अनर्गल शर्तों को लेकर ही भेंट करेंगे। जिन्ना का आग्रह है कि गांधी स्वीकार करें कि वह हिन्दू हैं और गांधी का आग्रह है कि जिन्ना स्वीकार करें कि वह भी एक मुस्लिम नेता हैं। कूटनीतिज्ञता का ऐसा खोखला और दयनीय दीवालियापन तो कभी देखने में नहीं आया, जैसा कि आज भारत के इन दोनों नेताओं के आचरण में दीख रहा है। ये दोनों ही वकील हैं और वकीलों का तो काम ही है कि वह बात-बात पर बहस करें, कुछ भी स्वीकार न करें, और समय का रुख देखकर बात करें। गतिरोध को समाप्त करने के लिए दोनों में से किसी को भी सुझाव दें तो सदा यही उत्तर मिलेगा- ‘नहीं’। उनमें से कोई भी उस समाधान पर पर विचार नहीं करेगा, जो सनातन नहीं है। प्रसिद्ध वाणिज्यिक उक्ति के अनुसार इन दोनों के चक्कर में फंसकर राजनीति का दीवाला पिट गया है और कोई भी राजनीतिक लेन-देन नहीं हो सकता।

हम सुनते हैं कि आज़ादी से पहले का मीडिया किस कदर मूल्यवान था और वह कितना महान भी। लेकिन अंबेडकर ने उस दौर के मीडिया की इस बात के लिए भी आलोचना की कि वह गांधी और जिन्ना की राजनीतिक गतिविधियों की सही रिपोर्टिंग नहीं कर रहा है।

गांधी और जिन्ना के बारे में अंबेडकर की विवेचना बड़ी रोचक है। वे कहते हैं : ‘‘आज भारत के क्षितिज पर दो महापुरुष हैं और वे इतने महान हैं कि उन्हें बिना नाम लिए भी पहचाना जा सकता है। ये हैं गांधी और जिन्ना। वे कैसे इतिहास की रचना करेंगे, इसे तो भावी पीढ़ी ही बताएगी। हमारे लिए तो इतना काफी है कि निर्विवाद रूप से वे अखबारों की सुर्खियों पर छाए हुए हैं। उनके हाथों में देश की बागडोर है। एक हिन्दुओं का नेता है, दूसरा मुसलमानों का। . . .सबसे पहले यह बात कौंधती है कि जहां पर उनके विराट अहं भाव का संबंध है, उन जैसे अन्य दो व्यक्तियों को खोज पाना कठिन है। उनके लिए व्यक्तिगत प्रभुत्व ही सब कुछ है और देशहित तो शतरंज की गोट है। उन्होंने भारतीय राजनीति को निजी मलयुद्ध का अखाड़ा बना रखा है। परिणामों की उन्हें कोई परवाह नहीं है। वास्तव में तो उन्हें परिणामों की सुध तभी आती है जब वे घटित हो जाते हैं। या तो वे उनके कारणों को भुला देते हैं या यदि वे उन्हें याद भी रखते हैं तो वे उसकी उपेक्षा कर देते हैं। वे आत्मतुष्टि की ओढ़नी ओढ़ लेते हैं और वह उनके सभी पश्चातापों को हर लेती है। वे विलक्षण एकाकीपन के ऊंचे मंच पर खड़े हो जाते हैं। वे अपने बराबरी वालों से ओट खड़ी कर लेते हैं। वे अपने से घटिया लोगों से मेलजोल पसंद करते हैं। . . . .और सच तो यह है कि चापलूसों, घटिया लोगों और धंधेबाजों को आगे बढ़ाने की आज की चमचागीरी वाली यह बुराई हमारे आज के बुरे लोगों ने देश के सबसे अच्छे लोगों से ही ग्रहण की है।

अंबेडकर ने गांधीजी और जिन्ना साहब को लेकर जो कहा है, वह आज के राजनेताओं के संदर्भ में देखें तो क्या ही कमाल बात है: ‘‘आलोचना से वे बड़े क्षुब्ध और व्यग्र हो जाते हैं। पर चाटुकारों की चाटुकारिता की चाट वे बड़े प्रेम से खाते हैं। दोनों ने एक अदभुत रंगमंच तैयार किया है और वे चीजों को इस ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि जहां भी वे जाते हैं, वहां सदा उनकी जय-जयकार होती है। निश्चय ही दोनों सर्वोच्च होने का दावा करते हैं। यदि सर्वोच्चता ही उनका दावा होती तो यह अधिक अचरज की बात नहीं होती। सर्वोच्चता के अलावा दोनों इस बात का दावा करते हैं कि उनसे तो कभी भूल और चूक हो ही नहीं सकती। धर्मपरायण नौवें पोप के शासनकाल में जब अचूकत्व का अहं उफन रहा था तो उन्होंने कहा था कि पोप बनने से पहले मैं पोपीय अचूकत्व में विश्वास रखता था। अब मैं उसे अनुभव करता हूं। यह ठीक ही रवैया इन दो नेताओं का है, जिन्हें विधाता ने अपनी असावधानी के क्षणों में हमारे नेतृत्व के लिए नियुक्त किया है। सर्वोच्चता और अचूकत्व की इस भावना को भारतीय समाचार पत्रों ने हवा दी है, यह तो कहना ही पड़ेगा।

अंबेडकर ने अतीत को लेकर हमारे दिलों में उतर चुके सूने अंधियारे को कार्लाइल की इस उक्ति से दूर किया, ‘‘अगर समाचार पत्र हाथ में हों तो महापुरुषों का उत्पादन बाएं हाथ का खेल है। . . .महापुरुष करंसी नोट की तरह होते हैं। करंसी नोटों की तरह वे स्वर्ण के प्रतीक हैं। उनका एक मूल्य होता है। हमें देखना यह है कि वे जाली नोट तो नहीं हैं? कार्लाइल का कहना था कि इतिहास में ऐसे ढेर सारे महापुरुष हुए हैं, जो झूठे और स्वार्थी थे। लेकिन हम सब जानते हैं कि डॉ. अंबेडकर एक ऐसे जाली नोट नहीं थे, जिसे किसी समाचार पत्र या मीडिया ने निर्मित किया हो। वे खरे सिक्के थे और खरी-खरी बातें कहते थे। अंबेडकर उन गिने-चुने लोगों में थे, जिन्होंने गांधी तक को सावधान करने का काम किया। लेकिन क्या हमें समाचार पत्रों या मीडिया से जुड़े लोगों की भी तुलना करंसी नोट से नहीं करनी चाहिए? क्या यह नहीं देखना चाहिए कि कहीं यह जाली नोट तो नहीं है?

मीडिया और राजनीति की दुर्भिसंधि की इस त्रासद फंतासी ने देश की लोकतांत्रिक यात्रा के सिर्फ इसी दौर में गुल नहीं खिलाए हैं, वह अतीत में भी ऐसा करती रही है। सच तो ये है कि हम वही काट रहे हैं, जो आजादी के आंदोलन के दौरान और संविधान निर्माण तथा लोकतंत्र के विकास की यात्रा के समय हमने या हमारे पुरखों ने जो बोया। लेकिन अतीत हो या वर्तमान, गलतियां तभी सुधरती हैं, जब लोगों के दिलोदिमाग में इन चीजों का पूरी उद्विग्नता के साथ एहसास हो। लोगों के जिस्म में कोई आंदोलन हो या न हो, कम से कम हमारी आत्माओं में जुंबिश होती रहे। हमारे दिलों का गुस्सा आत्मघाती हिंसा या दयनीय कुंठा के बजाय परिवर्तनकामी आंदोलन की राह बने। हमारा लोकतंत्र तभी समृद्ध और स्वप्निल बनेगा, जब मीडिया और राजनीति के बीच कोई अस्वस्थ दुर्भिसंधि नहीं होगी और दोनों जनता के सच्चे सरोकारों से जुड़े रहेंगे।

आज अगर चारों तरह हिंसा और भ्रष्टाचार का वातावरण है तो इसीलिए कि लोगों के दिलों में असंतोष है और अंसतोष की वजहें ये हैं कि हम उन्हें अनसुना करते रहते हैं। मीडिया को भी इन अनसुनी आवाजों को सुनना होगा। आचरण की भ्रष्टता न तो आज की समस्या है और न ही कल की। यह पूरी मानव जाति और हर युग की समस्या रही है। इस सहस्राब्दी के महानतम विचारक और क्रांतिकारी रूसो ने अपनी आत्मकथा दॅ कन्फेशन में एक जगह 1761 में चिंता जताई, आचरण की भ्रष्टता तो आज हर जगह है। सद्चरित्रता और नैतिकता का आज कोई अस्तित्व नहीं रह गया है। लेकिन अगर कोई ऐसी जगह है जहां इन गुणों के लिए आज भी एक तड़प बाकी है तो वह जगह पेरिस ही है। . . .यह जगह दरअसल पेरिस नहीं, हर वह जगह है, जहां हम इनसान रहते हैं। उस जगह का नाम पेरिस भी है, दिल्ली भी, इस्लामाबाद भी, कोलंबो और ढाका भी। वह जगह वॉशिंगटन या लंदन भी हो सकती है। मीडिया को इस तड़प को सुनना होगा। सबसे पहले अपने भीतर और फिर बाहर।

क्या ऐसे में यह ज़रूरी नहीं कि हम सभी अतीत से सबक लेकर अपने वर्तमान मीडिया को जिम्मेदार, जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की कोशिश करें। लेकिन क्या यह सिर्फ़ अकेला मीडिया कर सकता है? आप 700 रुपए किलो वाला देसी घी तो कभी भी 100 रुपए किलो में नहीं खरीदना चाहेंगे, लेकिन 25 रुपए में तैयार होने वाला अख़बार आपको हर रोज़ महज 5 रुपए में चाहिए। यानी हर अख़बार के साथ आपके घर 20 रुपए का एक नोट हर सुबह डलता है तो क्या आप इस काले धंधे के कम दोषी हैं? ऐसी ही चीज़ें किसी वेबसाइट या किसी टीवी चैनल के साथ होती हैं। हालिया स्टिंग के दायरे में आई एक साप्ताहिक पत्रिका को तो आप 30 रुपए ही देना चाहते हैं, लेकिन इकोनॉमिस्ट जैसी निर्भीक और शानदार पत्रिका आप 350 रुपए में ही ख़रीद पाते हैं। आप इस अर्थशास्त्र को नहीं समझेंगे तो आपको मीडिया के भीतर का मैला और गंदा धंधा कभी ठीक होता दिखाई नहीं देगा। अंबेडकर के माध्यम से हम अतीत के जिन सत्यों का सामना कर रहे हैं, उनके मुकाबले आज का दौर कहीं बड़ी बुराइयों का सामना कर रहा है, लेकिन अगर पाठक, श्रोता, दर्शक या वेब सर्फिंग करने वाला नहीं जागा तो सदाशयता और सच्चरित्रता सचमुच सो जाएगी।

# वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक लेखक त्रिभुवन अपने स्तंभो और विचारों के साथ-साथ फेसबुक पर भी खासे चर्चित हैं. वहां उनकी टिप्पणियां खूब प्रतिक्रिया बटोरती हैं. पत्रकारिता दिवस पर लिखी गई यह टिप्पणी भी उनकी फेसबुक वॉल से उठा ली गई है.
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