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कल्पाक्कम! जहां प्रकृति के साथ हंसता है 'परम अणु' भी

कल्पाक्कम! जहां प्रकृति के साथ हंसता है 'परम अणु' भी संभवतः वह मार्च की ग्यारह तारीख थी, जब दिल्ली पत्रकार संघ के अध्यक्ष और समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के हिन्दी उपक्रम 'भाषा' में काम कर रहे वरिष्ठ साथी मनोहर सिंह का फोन आया. वह जानना चाहते थे कि क्या मैं भारत सरकार के परमाणु उर्जा विभाग और राष्ट्रीय पत्रकार संघ (भारत) के स्कूल ऑफ जर्नलिज्म द्वारा तमिलनाडु के कल्पाक्कम में संयुक्त रूप से संचालित हो रही तीन दिवसीय कार्यशाला में शामिल होने के लिए समय निकाल पाऊंगा? गरमी का समय, दक्षिण भारत, परमाणु रिएक्टर, चार-पांच दिन का समय और उस पर सुबह से शाम तक वैज्ञानिकों का 'परमाणु' जैसे गूढ़ विषय पर दुरूह व्याख्यान....एक पल तो मन में आया कि मना कर दूं, पर दूसरे ही पल प्रकृति, विशाल समुद्र, पोखरण का परमाणु विस्फोट, दुनिया भर की पाबंदी के बीच अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करता हमारा परमाणु कार्यक्रम, अखबार-टेलीविजन पर बहुतेरी बार देखी कल्पाक्कम की सफेद-पीले गोल गुंबद वाली बिल्डिंग और हमारे देश का दुनिया से किया गया यह वादा कि 'भारत अपने परमाणु कार्यक्रमों का उपयोग विश्व शांति और मानवता की सेवा' में करेगा, दिमाग में कौंध गया, और मैंने हामी भर दी. सोचा चल कर देखते हैं, आखिर अपने परमाणु वैज्ञानिक करते क्या हैं? बताते क्या हैं, दिखाते क्या हैं? कैसा होता है परमाणु रिएक्टर? फिर लोगों में इतनी गलतफहमी क्यों है? बतौर पत्रकार- संपादक, एक मौका मिला है, कार्यशाला है, तो कुछ न कुछ जानने को तो मिलेगा ही. ज्ञान भला कभी व्यर्थ जाता है क्या?

पर यह तात्कालिक स्थिति थी. टिकट कटा लेने के बावजूद 25 मार्च को सुबह दिल्ली से चेन्नई के लिए उड़ान भरने तक मन न जाने कितने सवालों, कितने तरह के ऊहापोह, जिज्ञासा और द्वंद्व से जूझता रहा. उस दौरान इंटरनेट से भी कुछ समझने की कोशिश की. पर वहां जो उपलब्ध था, जो कुछ पढ़ा, उसने समझाने की बजाय और भी उलझाया ही. पहले जहां मैं परमाणु को केवल 'परमाणु बम' की ईजाद, उसके खतरे और हिरोशिमा, नागासाकी से जोड़कर देखता था, वहीं उसमें अब कुछ नए शब्द भी शामिल हो गए, जैसे रेडिएशन, संक्रमण, रेडियोधर्मी, रेडियो एक्टिविटी, विकिरण, परमाणु कचरा, चेर्नोबिल, फुकोशिमा और भी न जाने क्या-क्या? कितनी तरह के, कैसे-कैसे लेख और कितने डरावने, भयावह शब्द...नतीजा यह हुआ कि अनिल कपूर का दवाओं के रेडिएशन पर बना एक्शन और जासूसी सीरियल '24' पार्ट-टू के भयावह दृश्य और नसरूद्दीन की 'इरादा' जैसी फिल्मों के वह सारे नजारे, जिनसे इनसान का वजूद तक खतरे में पड़ गया था, घूम गए. इसने कौतूहल को और बढ़ा दिया, और जब 'कल्पाक्कम' पहुंचा, तो उन तीन दिनों की कार्यशाला के दौरान, जो कुछ देखा, सुना, समझा, उसने सारे पूर्वाग्रहों को, गलफहमियों को धो डाला. अल्पज्ञान वाकई कितना खतरनाक होता है और उन पर अफवाहों और नकारात्मक अधकचरा सूचनाओं का वाकई कितना तेज असर होता है?


कल्पाक्कम तमिलनाडु का एक छोटा सा कस्बा है जो चेन्नई से लगभग 70 किलोमीटर दूर दक्षिण में समुद्र के किनारे स्थित है. यह भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के मद्रास परमाणु ऊर्जा संयंत्र, कामिनी परमाणु संयंत्र, भाविनी तथा इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केन्द्र के लिए प्रसिद्ध है. इसके अलावा इसके आसपास पुरातात्विक महत्त्व के ढेरों स्थल, इमारतें और मंदिर हैं. महानगरों की अपेक्षा वहां काफी खुलापन है और परमाणु उर्जा संयंत्रों के बावजूद प्रदूषण के नाम पर 'शून्यता' है. वैज्ञानिकों ने अपनी अथक मेहनत से इस इलाके को इस कदर सजा दिया है कि हरियाली न केवल मानवमन और प्रकृति प्रेमियों को लुभाती है, सुदूर प्रवासी पक्षियों का भी यहां लगभग स्थायी निवास है. सुरक्षा के लिहाज से भी यह जगह काफी महफूज है. कल्पाक्कम के चप्पे-चप्पे पर नवनिर्मित-आजाद हुए भारत को परमाणु क्षेत्र में अपने पैरों पर खड़ा करने की जिद किए महान स्वप्नदर्शी राष्ट्रनिर्माताओं, पंडित जवाहर लाल नेहरू और डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा की छाप दिखती है. आश्चर्य तो यह कि पंडित नेहरू से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक और डॉ भाभा से डॉ शेखर बसु तक भारत को स्वावलंबी और मजबूत बनाने में परमाणु उर्जा के महत्तर योगदान का यह स्वप्न हर दिन हकीकत के धरातल पर एक कदम जरूर बढ़ाता है.


इस रूप में यह दौरा अद्भुत था. कल्पाक्कम में लगता है समुद्र और धरती ने जैसे आपस में तालमेल कर यह जगह वैज्ञानिकों को सौंपी है. प्रकृति और विज्ञान यहां सहोदर हैं. दोनों एक साथ जगते, अंगड़ाइयां लेते और खिलखिलाकर हंसते हैं, अपनी उर्जा से भरपूर. प्रकृति जहां यह नैसर्गिक रूप में करती है, वहीं विज्ञान हमारे कर्मठ वैज्ञानिकों के ज्ञान और शोध से जगता है. परमाणु उर्जा विभाग की उस तीन दिवसीय कार्यशाला का विषय था, 'परमाणु उर्जा, जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि'. यहां हम अलग-अलग सत्रों में परमाणु उर्जा के क्षेत्र के उन तमाम बड़े वैज्ञानिकों से मिले, जिन्होंने देश को जीवन के तमाम क्षेत्रों में सबल बनाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी होम कर दी है. कुछ की तो दूसरी और तीसरी पीढ़ी भी इसी क्षेत्र में काम कर रही है. यहां हम शीर्ष वैज्ञानिकों से लेकर हर पदक्रम यहां तक कि कनिष्ठ और प्रशिक्षु वैज्ञानिकों से भी मिले. इनमें कार्यशाला की सफलता को लेकर कुछ नाम दिमाग पर चस्पां हो गए, जिनमें खास तौर से इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ अरुण कुमार भादुड़ी, डॉ बी. वेंकटरमण, डॉ आर सत्यनारायण, डॉ यू कमची मुदाली, डॉ कल्लोल राय, डॉ के वी कृष्णमूर्ती, रवि शंकर राममूर्ति, डॉ वेलुमुरगन, डॉ टी. एस. लक्ष्मी नरसिंहम, ए.के नारंग, डॉ योजना सिंह, डॉ अमर बनर्जी, एस रवि शंकर, विनीत सिन्हा, नीरज कुमार, असीम सिंह रावत, शैलजा, जालजा मदन मोहन, पार्थिपन, रामू शामिल हैं, तो संपादक- पत्रकारों में सर्वश्री राजेंद्र प्रभु, अशोक मलिक, पल्लव बागला, विजय क्रांति, विचित्रा शर्मा, रवि मीनाक्षी सुंदरम, अमरनाथ वशिष्ठ, सिल्वेरी श्रीसैलम के नाम उल्लेखनीय हैं.

अपने देश भारत में परमाणु विभाग हमेशा से प्रधानमंत्री के अधीन रहा है. इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र कल्पाक्कम के प्रांगण में आयोजित इस कार्यशाला के महत्त्व का अंदाज इसलिए भी लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से संबद्ध राज्यमंत्री डॉ जितेंद्र सिंह, जो अपनी वैज्ञानिक-अकादमिक गतिविधियों को लेकर हमेशा चर्चित रहे हैं, ने संदेश भेज कर इस बात पर खुशी जताई कि वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र प्रभु के प्रयासों से आयोजित होने वाली इस तरह की कार्यशाला के माध्यम से विज्ञान अपनी बात मीडिया तक पहुंचा रहा है. हमारे लोगों, विशेषकर युवाओं में विज्ञान के प्रति प्यार जगाने में मीडिया महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. यह जरूरी है कि हम वैज्ञानिक सूचनाओं को लोगों तक पहुंचाएं. भाषा को इस दिशा में बाधक नहीं, बल्कि वाहक बनना चाहिए. पिछले 6 से भी अधिक दशकों से बहुमुखी संगठनों के साथ परमाणु उर्जा विभाग ने समाज के उत्थान के लिए तमाम तरह की प्रौद्योगिकी ईजाद की....हम विश्वस्तरीय बने. इसके बाद परमाणु उर्जा विभाग और इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए उन्होंने पत्रकारों-वैज्ञानिकों को लाभप्रद सत्र की शुभकामनाएं दीं.


....और वाकई इस कार्यशाला में भाग लेकर ही हमने जाना कि वाकई मानव जीवन के विकास और समृद्धि का शायद ही कोई ऐसा पहलू है, जिस पर हमारे परमाणु उर्जा विभाग से जुड़े वैज्ञानिक काम न करते हों. चूंकि उनका कार्यक्षेत्र ही ऐसा है, 'सूक्ष्म' पर 'विराट उर्जा' से भरपूर, इसलिए उनके हर काम में पूर्णता परिलक्षित होती है. 26 से 29 मार्च तक मैं अपने देश के परमाणु कार्यक्रमों के बारे में इतना कुछ जाना, जितना अपने तीन दशकों के पत्रकारीय जीवन में बहुत कुछ पढ़कर भी नहीं जान पाया था. परमाणु विखंडन से वे जीवन के हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रहे. यह छाप प्रोटॉन, न्यूट्रान, इलेक्ट्रान से आगे नाभकीय विखंडन, समस्थानिक यानी आइसोटोप, नाभकीय संलयन, रेडियोसक्रियता, उर्जा निर्माण, नाभकीय ईंधन चक्र, भारी पानी संयंत्र, उच्चस्तरीय अपशिष्ट प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण प्रयोगशाला, नाभकीय रिएक्टर संरक्षा, गामा रेडियो सक्रियता की निगरानी के लिए आयरमॉन, रेडियोआइसोटोप, स्वास्थ्य रक्षा के लिए विकिरण प्रौद्योगिकी, जिससे न जाने कितनी बीमारियों की पहचान के साथ ही ब्रेस्ट कैंसर तक का इलाज, कृषि और फसलों के सुधार हेतु विकिरण के प्रयोग और खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र के अलावा औद्योगिक विकास, नाभकीय निर्लवणीकरण, कचरा सफाई और कमाई, खगोल विज्ञान, प्रगत प्रौद्योगिकी में योगदान करने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान में भी अपनी महत भूमिका निभा रही है. इनमें से हर विषय अपने आप में संपूर्ण अध्याय है, जिसे अपने पाठकों के लिए क्रम से यहां इस स्तंभ में रखने की कोशिश करूंगा. कितना सफल होऊंगा पता नहीं, पर उससे पहले इस आयोजन से जुड़े ऊपर से लेकर नीचे तक के सभी महानुभावों का आभार...आखिर अणु ही तो परिवर्तित होता है 'परम अणु' में 'परमाणु' में.
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