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पड़ताल- वाराणसी पुल हादसाः अफसर जिम्मेदार तो ठेकेदार-नेताओं का काकस क्यों नहीं?

पड़ताल- वाराणसी पुल हादसाः अफसर जिम्मेदार तो ठेकेदार-नेताओं का काकस क्यों नहीं? बनारस: एक नहीं, दो स्लैब गिरे हैं। वजन हजारों टन में है। बनारस में आज हर चेहरा धुंआ-धुंआ है, हर आँख नम है। मौत अभी- अभी तांडव करके गुजरी है। झूठ बोल रहा है शासन, प्रशासन और मीडिया कि मौतें दस या बीस हुई हैं। मौतों का आंकड़ा सैकड़ों से पार का है। चूल्हे आज बनारस के किसी घर में नहीं जले अबतक। लोगों में गुस्सा है, लोग व्यथित हैं, लोग अवाक हैं।

जो भी है सब दुखद है, लेकिन देश को जानना चाहिए कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में आज फ्लाई ओवर के इस विशाल स्लैब के रूप में ये जो अजाब गिरा है, जिसके नीचे जो दर्जनों कारें, दर्जनों ऑटोज, एक मिनी बस, एक रोडवेज बस और अंदाजन बीसियों लोग दबे पड़े हैं, वो हादसे के लगभग पांच छः घंटे बीत जाने के बाद अभी भी वैसे ही दबे पड़े क्यों हैं?

ये डिजिटली और टेकनिकली एडवांस्ड इन्डिया की एक झलक है। न तो मौके पर जुटायी गयी दर्जनों क्रेनें वह स्लैब उठाने में समर्थ हो पा रही हैं, न उसको काटने के लिए अब तक कटर का ही इन्तजाम हो सका है। अभी तो आसपास छिटकी पड़ी लाशें ही गिनी जा रही हैं. अब तक आसपास पड़े घायलों को ही अस्पताल पहुंचाया जा सका है। आप कल्पना कीजिए कि अब तक अगर ये स्लैब हटाया जा सका होता तो वाहनों में पिसे पड़े लोगों में से कुछ की जान तो बचायी जा सकती थी।

कैन्ट इलाके का यह स्थान बनारस के अधिकतम ट्रैफिक वाले स्थानों में से एक है। फ्लाई ओवर का निर्माण दो साल से ज्यादा समय से चल रहा है। एक तरफ रेलवे स्टेशन, दूसरी तरफ रोडवेज बस स्टेशन, तीसरी तरफ घना बाजार, होटल्स, पेट्रोल पम्प, दो-दो इण्टर कालेज, धर्मशाला, मंदिर, लंका लहरतारा लहुराबीर और राजघाट से आने वाली सड़कों का चौराहा, इन सबके बीच में पिसती हुई तमाम तरह के अतिक्रमणों से सिकुड़ी पड़ी जीटी रोड। इसी सड़क को दो हिस्सों में चीरते हुए बीचोंबीच लगभग एक किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ निर्माण कार्य।

सीमेंट की बोरियों के पहाड़, लोहे की सरियों के ढेर, बालू के टीले, खोदे हुए बड़े- बड़े दर्जनों गड्ढे, खड़े हुए छोटे-बड़े निर्माणाधीन पिलर्स, लोहे की बड़ी और मोटी चादरें, काम कर रहे हजारों मजदूर और इन सबके बीच व अगल बगल से गुजरती हुई हजारों कारें, हजारों ऑटोज, रिक्शे, बाइक्स, स्कूलों के वाहन, रोडवेज की बसें और चीखता- चिल्लाता रेंगता हुआ ट्रैफिक, रोज शाम का जाम और इन्हीं सब के बीच से उछलते- कूदते, गिरते- पड़ते, ढहते-फिसलते रेलों के यात्री, बाहर से आने वाले लोग, रोजमर्रा के पर्यटक, ग्राहक और बनारस की भीड़।

यह ट्रैफिक डाइवर्ट किया जा सकता था, किया ही जाना चाहिए था, कानूनी निर्देश हैं इसके। पर नेताओं, नौकरशाहों और ठेकेदारों के काकस से सवाल कौन पूछे ? उन्हें कानून कौन समझाये, सब जीना चाहते हैं न। जीना तो वे भी चाहते थे, अभी जो काल के उस स्लैब के नीचे पिचककर मर गये हैं, या हो सकता है कि उनमें से कुछ जीवट वाले अभी भी जिन्दा हों और अपनी अंतिम सांसों की साखी भर रहे हों। लेकिन मौत का कहर न जाने कब उनके जिन्दा या मुर्दा सिरों से उठाया जा सके।

निर्माण का काम रात में होना चाहिए था पर डंके की चोट पर कानून को जेब में रखकर दिन की भीड़ में लबे ट्रैफिक चल रहा था और आज हम सबकी आशंकाओं का अजाब हमें इस तरह तोड़कर गुजर गया है।

खैर, सुना है सरकार ने खबर सुन ली है, मंत्रीगण का दौरा होगा अब। सैकड़ो लाशों को दस बीस में बदलकर पांच- पांच लाख रूपये बांटे जायेंगे। जांच होगी। रिपोर्ट आयेगी। अड़तालीस घंटे के अंदर। फिर अफसर बर्खास्त होंगे। नेता बर्खास्त नही होंगे। कुछ दिन बाद अफसर बहाल हो जायेंगे।

महामहिम राष्ट्रपति जी ने भी ट्वीट कर दिया है। हादसा भी तो बड़ा है, इसलिए प्रधानमंत्री को भी ट्वीट करना पड़ा है लेकिन फिर वो कर्नाटक में बहुमत के जुगाड़ में लग गये हैं। कांग्रेस को भी तो देखना है। हम कैन्ट से लौटकर ये पोस्ट लिख रहे हैं। भूख नहीं लगी है। बच्चे यात्रा में हैं। माँ, पत्नी और बेटी टीवी पर न्यूज देख रही हैं। माँ पूछ रही है कि विश्वनाथ गली में विघ्न विनायक के मंदिर क्यों तोड़े सरकार ने? नहीं तोड़ना था न। भगवान का कोप है। ऐसा हृदयविदारक हादसा तो ज़िन्दगी में कभी नहीं देखा था।

# हादसे के चार-पांच घंटे बाद लिखी गई यह पोस्ट वाराणसी के प्रमुख समाजसेवी और लेखक प्रेम प्रकाश की फेसबुक वॉल से ली गई है.
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