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आईटी सुपरपॉवर की भारत की पहचान अब खतरे में: बैंगलुरु में डॉ मनमोहन सिंह

आईटी सुपरपॉवर की भारत की पहचान अब खतरे में: बैंगलुरु में डॉ मनमोहन सिंह बैंगलुरुः देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह आज बैंगलुरु में थे. वहां उन्होंने पत्रकारवार्ता और बयान जारी कर न केवल कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जनता से कांग्रेस के लिए वोट मांगा बल्कि वह तथ्य भी रखे, जो यह बताने के लिए पर्याप्त थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक के शासनकाल में विकास के नाम पर किस तरह से देश में अराजकता फैलाई जा रही है.

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बैंगलुरु में निम्नलिखित बयान जारी किया:-

दोस्तों, हमारा देश आज मुश्किल दौर से गुजर रहा है। देश के किसानों पर संकट छाया है, हमारे महत्वाकांक्षी युवाओं के पास अवसर नहीं हैं और अर्थव्यवस्था अपनी सामर्थ्य से कम गति से बढ़ रही है। दुखद सच्चाई यह है कि ये संकट टाले जा सकते थे।

मुझे यह देखकर दुख होता है कि जब भी सरकार की किसी कमी की ओर इशारा किया जाता है, तो उन समस्याओं का समाधान करने की बजाए सरकार का प्रयास उस असहमति को दबाने का होता है। इनोवेशन के लिए सहयोग एवं ऐसे माहौल की आवश्यकता होती है, जिसमें खुलकर विचार-विमर्श और बहस हो सके।

हमें याद रहना चाहिए कि आर्थिक नीतियों का लोगों के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि जिन लोगों के हाथों में नीति-निर्धारण हो, वो इन नीतियों एवं कार्यक्रमों को गहन विचार विमर्श के बाद ही बनाएं और केवल अपनी सनक या मन की तरंग को पूरा करने के लिए कोई भी कार्य न करें। भारत एक विविध और विशाल संरचना वाला देश है और कोई भी एक व्यक्ति सारी बुद्धिमत्ता का कोश नहीं हो सकता। हमने जब जब वर्तमान भाजपा सरकार की जिस किसी भी विनाशपूर्ण नीति पर जवाब मांगा है, तब हमें यही सुनने को मिलता है कि उनके इरादे नेक हैं।

मोदी सरकार के इरादे, भले ही उनके द्वारा कितने ही नेक होने के दावे किए जाएं, लेकिन देश को उनका बड़ी गंभीर परिणाम भुगतना पड़ा है। उनके इरादों में तर्कशीलता एवं मननशीलता के अभाव का ख़ामियाज़ा भारत और हमारे सामूहिक भविष्य को उठाना पड़ रहा है। विश्व में छाई गंभीर मंदी के बावजूद कांग्रेस की यूपीए सरकार के दौरान देश ने 7.8 प्रतिशत की औसत वृद्धि दर दर्ज की थी। दूसरी तरफ एनडीए सरकार के दौरान अनुकूल वैश्विक वातावरण और कच्चे तेल की कम कीमतों के बावजूद वृद्धि दर कम हो गई है। सच्चाई यह है कि आर्थिक वृद्धि मापने की परिवर्तित विधि के बावजूद आर्थिक वृद्धि कम हो गई है, जबकि यह भी तथ्य है नई परिवर्तित आर्थिक वृद्धि दर सच्चाई के धरातल से कहीं अधिक खुशनुमा तस्वीर दिखाती है।

नोटबंदी और आनन फानन में जीएसटी लागू किया जाना मोदी सरकार की दो बड़ी भूल साबित हुईं। इन भारी भूलों का परिणाम देश की अर्थव्यवस्था तथा माईक्रो, स्मॉल एवं मध्यम इंटरप्राईज़ सेक्टर को भुगतना पड़ा है और हजारों नौकरियों का नुकसान हुआ है। इसके साथ ही जीडीपी में निर्यात का हिस्सा 14 सालों में सबसे कम हो गया। यह हालत तब है जब विश्व की अर्थव्यवस्था में तेजी आ रही है तथा वियतनाम जैसे अन्य एशियाई देश काफी तेजी से बढ़ रहे हैं।

जब हम भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियों के आम जनता पर प्रभाव की बात करते हैं, तो दूसरा सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला क्षेत्र पेट्रोलियम सेक्टर है। अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत सबसे कम होने के बाद भी पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें सबसे ज्यादा ऊँचे ऐतिहासिक स्तर को छू रही हैं, क्योंकि मोदी सरकार आम जनता की जेब से अत्यधिक एक्साईज़ शुल्क की वसूली कर रही है। कच्चे तेल की कीमतों में कमी का फायदा आम जनता को दिए जाने की बजाए मोदी सरकार ऊँचा एक्साईज़ शुल्क वसूलकर उन पर अत्याचार कर रही है।

हमारे कार्यकाल के दौरान कच्चे तेल की आसमान छूती अंतर्राष्ट्रीय कीमतों के बावजूद, उसका दुष्प्रभाव हमने आम जनता पर नहीं पड़ने दिया था। वर्तमान सरकार ने जब से सत्ता सम्हाली है, अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 67 प्रतिशत हो चुकी हैं। लेकिन इसके बावजूद पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़कर 110 प्रतिशत पहुंच चुकी हैं। टैक्सों में निरंतर बढ़ोत्तरी करके आम जनता की जेब काटकर भाजपा सरकार ने 10 लाख करोड़ रु. से अधिक अपने खजाने में भर लिए। भारत की जनता सरकार से जवाब जानना चाहती है कि इस अतिरिक्त पैसे का क्या उपयोग किया गया?

एक सेहतमंद अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है - सुदृढ़ बैंकिंग प्रणाली। जबकि दूसरी ओर आज न तो बैंक कर्ज दे रहे हैं और न ही नए निवेश के लिए प्राईवेट सेक्टर कर्ज ले पा रहा है। अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन रुक गया है और यह मोदी सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन का सबसे ज्वलंत प्रमाण है।

कुल नॉन परफॉर्मिंग एस्सेट्स (एनपीए) का अनुपात वर्तमान भाजपा सरकार के सत्ता सम्हालने के बाद तीन गुना हो गया है। बैंकिंग सेक्टर में होने वाले घोटाले और धोखाधड़ी सितंबर, 2013 में 28,416 करोड़ रु. से चार गुना बढ़कर सितंबर, 2017 में 1.11 लाख करोड़ रु. हो चुके हैं। बैंकों से धोखाधड़ी करने वाले सरकार और कानून को धता बताकर देश से बाहर भाग गए।

मैं पूरी सावधानी एवं जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं कि मोदी सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन से आम जनता का बैंकिंग सेक्टर में विश्वास धीरे धीरे खत्म होता जा रहा है। कई राज्यों में हाल ही में आई नकदी की कमी की घटनाओं को टाला जा सकता था। लेकिन सरकार अपना काम ठीक से नहीं कर रही है। इस बारे में उचित कदम उठाने की बजाए सरकार बहाने बनाने एवं षडयंत्र की झूठी कहानियां गढ़ने में व्यस्त रही।

एक तरफ जहां कॉर्पोरेट हाउसेज़ के कर्ज माफ करने के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है, वहीं गांवों में छाए संकट के कारण किसानों द्वारा अदा न किए जा सकने वाले कर्ज माफ नहीं किए जा रहे। पिछले तीन सालों में पब्लिक सेक्टर बैंकों द्वारा कुछ बड़े कॉर्पोरेट हाउसेज़ के 2.41 लाख करोड़ रु. से ज्यादा के लोन माफ कर दिए गए।

लेकिन स्मॉल एवं मीडियम इंटरप्राईज़ेस के विकास के लिए पूंजी कहां है?

भारत की अर्थव्यवस्था को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में सालों की कड़ी मेहनत लगी थी, जिसे बेसिरपैर के निर्णयों द्वारा नष्ट कर दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने केवल चार सालों में ही यूपीए की आर्थिक उपलब्धियों को देश की असफलता में बदल दिया है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान किसानों को हुआ है। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का सरकार का दावा अब एक कोरी कल्पना बनकर रह गया है।

यूपीए-2 सरकार के तहत किसानों को दी जाने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि दर 19.3 प्रतिशत थी, जो एनडीए सरकार के दौरान गिरकर 3.6 प्रतिशत रह गई है। एनडीए सरकार के तहत कृषि-जीडीपी वृद्धि दर यूपीए सरकार के दौरान हासिल हुई वृद्धि दर की आधी ही है। यूपीए सरकार के दौरान 500 प्रतिशत वृद्धि दर्ज करने वाले कृषि निर्यात वर्तमान सरकार में 21 प्रतिशत गिर गए हैं। दूसरी ओर कृषि आयात 60 प्रतिशत से अधिक बढ़ गए हैं। ऐसे हालात में प्रधानमंत्री मोदी को बताना चाहिए कि वो किसानों की आय दोगुनी कैसे करेंगे, जबकि उनकी सरकार तो यूपीए सरकार के दौरान दर्ज की गई वृद्धि दर भी हासिल नहीं कर पाई है।

जब मोदी सरकार से पिछले चार सालों में आर्थिक समस्याओं के कारणों के बारे में पूछा जाता है, तो प्रधानमंत्री मोदी जी सारा दोष कांग्रेस के 70 सालों के शासन को दे देते हैं। लेकिन वो यह भूल जाते हैं कि कांग्रेस सरकार द्वारा लाई गई हरित क्रांति ने किस प्रकार भारतीय कृषि के स्वरूप को बदल दिया था और देश अनाज के आयातक की जगह अनाज का एक प्रमुख निर्यातक बन गया। वे 1991 से 1996 के बीच की आर्थिक उदारीकरण नीतियां भी भूल जाते हैं, जिनने पिछले 25 सालों में औद्योगिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदल दिया। वो यूपीए-1 एवं यूपीए-2 की सामाजिक व आर्थिक कानून बनाने की निम्नलिखित उपलब्धियों को भी भूल जाते हैं:

1. सूचना का अधिकार कानून
2. शिक्षा का अधिकार कानून
3. खाद्य सुरक्षा कानून
4. मनरेगा कानून
5. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, पुर्नस्थापना में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार कानून
6. आदिवासी एवं वनों के अन्य निवासियों के लिए वन अधिकार कानून
7. हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र के पिछड़े जिलों को विशेष दर्जा देने के लिए 371 जे।

वो यह बताना भी भूल जाते हैं कि यूपीए-1 और यूपीए-2 की नीतियों के चलते 14 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर आ पाए।

आज हम बैंगलुरु में हैं, जो दुनिया का सबसे अधिक गतिशील शहर माना जाता है, जो विज्ञान, आईटी और इनोवेशन का केंद्र है। पूरे देश में युवा ग्रेजुएट होकर बैंगलुरु की ओर बढ़ते हैं क्योंकि यह भारत की स्टार्टअप कैपिटल भी है।

बैंगलुरु शहरी विकास के लिए यूपीए सरकार के दूरदृष्टियुक्त केंद्रण के लिए प्रेरणा भी था। जिन विचारों के चलते जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) का निर्माण हुआ, वो विचार बैंगलुरु के सामाजिक उद्यमियों ने ही दिए थे। हमारे शहरों का विकास हर सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए सतत प्रयासों, धन और इनोवेशन की जरूरत होती है। लेकिन मोदी सरकार इन बातों को समझने की बजाए अम्रुत और स्मार्ट सिटीज़ जैसे आकर्षक टैग्स बनाने पर ज्यादा ध्यान दिया, जो कि बहुत खराब प्रदर्शन कर रहे हैं। इस प्रकार भाजपा सरकार के कार्यकाल में हम महत्वपूर्ण साल बेकार करते चले जा रहे हैं, जिनमें बुद्धिमत्तापूर्ण योजनागत ढंग और निवेश के माध्यम से शहरों को विकास का इंजन बनाए रखे जाने की जरूरत थी।

इसके विपरीत कर्नाटक में श्री सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए काम को देखिए। इसके टेंडर श्योर प्रोजेक्ट ने शहरों में बुनियादी ढांचे के निर्माण का तरीका बदल दिया, जिसमें पैदल चलने वालों सहित हर नागरिक की सुविधा का ध्यान रखा गया। मेट्रो रेल की कनेक्टिविटी में गुणात्मक सुधार हुआ है। प्रदेश सरकार द्वारा कुल खर्च का 80 प्रतिशत स्वयं वहन किए जाने से सब-अर्बन रेल प्रोजेक्ट ने तेजी पकड़ी। जनसंख्या और वाहनों में भारी वृद्धि के बावजूद कर्नाटक सरकार बैंगलुरु के नागरिकों के जीवन में काफी सकारात्मक सुधार लाने में सफल हुई है।

युवा बैंगलुरु में यहां के जीवंत एवं खुले माहौल के कारण आते हैं, जहां उद्यमशीलता फल-फूल रही है। सिद्धारमैया सरकार की एलिवेट जैसी इनोवेटिव नीतियों के चलते बैंगलुरु भारत की स्टार्टअप कैपिटल बन गया है। उद्योग के लिए सिद्धारमैया सरकार के सहयोग के चलते कर्नाटक निवेश के इरादों को वास्तविक निवेश कराने के क्षेत्र में सबसे ऊपर आ गया है, जहां गुजरात या देश के किसी अन्य राज्य के मुकाबले ज्यादा निवेश हुआ है। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार हमारे युवाओं के लिए नौकरियों का निर्माण कर रही है और इसके परिणाम भी स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

नौकरियों के निर्माण में कर्नाटक का ट्रैक रिकॉर्ड पूरे भारत के रिकॉर्ड से बिल्कुल अलग है। भाजपा सरकार की गलत नीतियों का सबसे बड़ा नुकसान नौकरियों को हुआ है। देश के लोगों से हर साल 2 करोड़ नई नौकरियां देने का वायदा करके सरकार बनाने वाले प्रधानमंत्री, श्री मोदी के कार्यकाल में तो मौजूदा नौकरियां भी खत्म होती जा रही हैं। 15 से 24 साल की आयुवर्ग में पिछले चार सालों में 72 लाख नौकरियां खत्म हो गईं। यदि देश में बाहरी वातावरण अनुकूल न हो, तो अक्सर अर्थव्यवस्था में नौकरियां कम हो जाती हैं। लेकिन भारत में नौकरियों का नुकसान प्रधानमंत्री मोदी जी और उनकी टीम के कुप्रबंधन के कारण हो रहा है। एक अच्छा नेतृत्व अवसरों का निर्माण करता है, उन्हें खत्म नहीं करता। यदि हम इन समस्याओं का समाधान तत्काल नहीं करेंगे, तो हमारी जनसंख्या, जो अभी तक हमारी ताकत है, वो हमारी सबसे बड़ी मुसीबत बन जाएगी।

बैंगलुरु इस बात का उदाहरण है कि हम परिवर्तन कैसे ला सकते हैं। बैंगलुरु की इंटरप्रेन्योरियल भावना ने इस शहर को इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी का केंद्र बना दिया है। पिछले दो सालों में बैंगलुरु 12 वें स्थान से पहले स्थान पर पहुंचते हुए विश्व का सर्वाधिक गतिशील शहर बनकर उभरा है।

युवाओं को गुणवत्तायुक्त शिक्षा एवं सहयोग की आवश्यकता है। कर्नाटक एक अलग स्टार्टअप नीति घोषित करने वाला देश का पहला राज्य था। यहां पर लगातार बदलती मांग को पूरा करने के लिए बायोटेक नीति के तीसरे पड़ाव की घोषणा की गई। गतिशील वातावरण के माहौल में इस प्रकार की प्रतिक्रियाओं से ही बैंगलुरु देश के निर्यात में 50 बिलियन यूएस डॉलर का योगदान करने में सफल रहा। इस सफलता का श्रेय यहां पर प्रतिदिन इनोवेट करने वाले लोगों और इस परिवर्तन में सहयोग करने वाली कांग्रेस सरकार को जाता है।

दूसरी ओर इसी अवधि में सॉफ्टवेयर सेवाओं का निर्यात पूरे देश में गिरा और 2015-17 में यह रिकॉर्ड स्तर पर गिरकर केवल 7.3 प्रतिशत रह गया। आईटी सुपरपॉवर की भारत की पहचान अब खतरे में है। यह स्थिति और भी ज्यादा गंभीर हो जाएगी अगर मोदी सरकार हमारे प्रोफेशनल्स के लिए एच1, एच4 और एल1 वीज़ाओं को सुरक्षित करने के अपने दायित्व में असफल रहती है, जिन पर फिलहाल खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। मैं प्रधानमंत्री जी से अनुरोध करता हूं कि वे इस दिशा में अपने हर संभव प्रयास करें, ताकि अमेरिका में काम करने वाले प्रोफेशनल्स काम करते रहें, जिनसे भारत और अमेरिका, दोनों को लाभ मिल रहा है।

बैंगलुरु भारतीय विज्ञान की पहली राजधानी है। यह भी स्मरण करने योग्य है कि दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसने समाज में वैज्ञानिक अभिरुचि बढ़ाने के सिद्धांत को अपने संविधान में स्थान दिया है। घटते बजट, प्रशासन पर कब्जा करने की कोशिशें, छात्र-छात्राओं और अलग विचार रखने वाले व्यक्तियों का उत्पीड़न करना हमारे संवैधानिक मापदंडों के विरुद्ध है। प्रधानमंत्री, श्री मोदी के कैबिनेट के मंत्रियों या भाजपा के मुख्यमंत्रियों द्वारा लगातार तर्कहीनता को बढ़ावा देने वाले बयान सही नहीं हैं। तो फिर इसमें क्या आश्चर्य है कि सरकार द्वारा लोगों को नुकसान पहुंचाने वाली तर्कहीन नीतियां लागू की जा रही हैं।

अंत में हम सबको यह याद रखना आवश्यक है कि देश तभी विकास करता है, जब सतत विकास हो, जब लोगों के पास नौकरियां और सार्थक आजीविका हों, जब वो बेहतर भविष्य की आशा के साथ अपनी इच्छाएं पूरी कर सकें। बैंगलुरु और कर्नाटक ने भारत का मार्गदर्शन किया है। मैं केवल यही कामना करता हूं कि प्रधानमंत्री जी इससे सीख लेकर अपने कार्यकाल के बचे हुए समय में इसे लागू करेंगे।

जय हिंद!
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