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भारत और इजराइल संबंधः मोदी- नेतन्याहू के चलते अपने शिखर पर

भारत और इजराइल संबंधः मोदी- नेतन्याहू के चलते अपने शिखर पर भारत और इजराइल के संबंध इन दिनों बेहद अच्छे हैं. अंग्रेजी में कहें तो 'आल टाइम हाई'. मोदी सरकार की विदेश नीति में यह एक ऐसा बदलाव है, जो साफ दिख रहा. यह पिछले सत्तर से भी अधिक सालों से फिलीस्तीन के प्रति सहानुभूति रखने वाले रवैए से अलग है. दरअसल इजराइल और फिलीस्तीनी क्षेत्र का विवाद भारत की आज़ादी से भी पुराना है और भारत हमेशा से अरब देशों का हिमायती रहा है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक इसराइल और फिलीस्तीन के झगड़े पर कई बार कह चुके थे कि उनकी सहानुभूति यहूदियों के साथ है, लेकिन फिलीस्तीनी क्षेत्र तो अरब लोगों का ही है, और इस विवाद का कोई सैन्य हल नहीं होना चाहिए.

1947 में भारत की आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने इजराइल के प्रति महात्मा गांधी के रुख़ को कायम रखा. यही वजह रही कि अल्बर्ट आइंस्टीन के अनुरोध के बावजूद भारत ने इजराइल के गठन के प्रस्ताव का विरोध किया था. 29 मई, 1947 को भारत ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की बैठक में फिलीस्तीन के विभाजन का विरोध किया था. भारत के विरोध के बाद भी 14 मई, 1948 को इजराइल का गठन हुआ. यह एक संयोग था कि जब धार्मिक आधार पर जब इजराइल और फिलीस्तीनी क्षेत्र का विभाजन हो रहा था, लगभग उसी दौरान मजहब के नाम पर भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था. पाकिस्तान के साथ सीमा पर तनाव बना हुआ था, आज़ादी के तुरंत बाद युद्ध भी हो गया था, लिहाजा नेहरू को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अरब देशों के सहयोग की ज़रूरत थी. हालांकि भारत ने सितंबर, 1950 में इजराइल को मान्यता दे दी थी.

इसके बाद भारत और इजराइल के बीच संबंध 1960 के दशक में रफ्तां-रफ्तां रफ्तार पकड़ने लगा. इजराइल ने न केवल भारत को 1962, 1965 और 1971 में सैन्य मदद की, बल्कि वह पहला देश था, जिसने 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद बांग्लादेश को मान्यता दी थी. अगस्त 1977 में मोरारजी देसाई के शासनकाल में इजराइली विदेश मंत्री ने भारत का एक गोपनीय दौरा किया था. जिसके बाद से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में गर्माहट आई. हालांकि फिर सत्ता में आईं इंदिरा गांधी अपने पिता की राह पर ही चलीं और उनकी विदेश नीति में फिलीस्तीन क़रीबी बना रहा. इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी 1985 में संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक आम सभा में इजराइली प्रधानमंत्री से मिले थे. किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की इजराइली प्रधानमंत्री से यह पहली मुलाक़ात थी. कहा जाता है कि उस वक़्त भारत पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से चिंतित था और इसलिए इजराइल के साथ जाने में संकोच को पीछे छोड़ना ठीक समझा.

भारत में 1991 में आर्थिक उदारीकरण को अंजाम दिया गया और उसी दौरान इजराइल से औपचारिक राजनयिक संबंध भी स्थापित हुआ. देश में जब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती है तो इजराइल से संबंध बढ़ाने की बात कही जाती है, लेकिन ऐसा नहीं है कि अरब देशों को नाराज़ कर सबंधों को आगे बढ़ाया जाता है. 1992 में राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद से 2000 में पहली बार लालकृष्ण आडवाणी एक वरिष्ठ मंत्री की हैसियत से इजराइल गए थे. उसी साल आतंकवाद पर एक इंडो-इजराइली ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप का गठन किया गया. 2003 में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा ने अमरीकी यहूदी कमिटी में एक भाषण दिया और उन्होंने इस्लामिक अतिवाद से लड़ने के लिए भारत, इजराइल और अमरीका के साथ आने की वकालत की. 2004 में जब कांग्रेस सत्ता में आई तो इजराइल-भारत संबंध सुर्खियों से ग़ायब रहा.

साल 2003 में तत्कालीन इजराइली प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन के भारत दौरे के बाद से ये संबंध परवान चढ़े, तो सितंबर 2014 में न्यूयॉर्क में दोनों देशों के नेताओं के बीच जो उच्चस्तरीय बैठक हुई, उसने सारे पुराने समीकरण बदल दिए. हालांकि भारत ने 1950 में इजराइल को एक देश के रूप में मान्यता दे दी थी. पर उसने इजराइल के साथ राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित किए. इसके बाद भी भारत ने इजराइल के साथ संबंधों को लेकर बहुत उत्साह नहीं दिखाया. खाड़ी देशों में भारतीयों की खासी तादाद और पूर्व की सरकारों द्वारा फिलीस्तीन मसले पर अलग रूख रखने से भारत-इजराइल के संबंधों में वह गहराई नहीं आई थी, जो आनी चाहिए थी. पर दिल्ली के तख्तोताज पर नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी ने पासा पलट दिया और इजराइल इस समय भारत के सबसे अच्छे दोस्तों में से एक है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात के बाद इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा था कि अब आसमान सीमित हो गया है. तब  नेतन्याहू के इस बयान को भारत और इजराइल के बीच चोरी छुपे प्रेम-संबंध में खुलापन आने से जोड़ा गया था. ठीक अगले साल इसका असर भी दिखा. जुलाई 2015 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इजराइल के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव की वोटिंग से ख़ुद को अलग रखा.

भारत के इस क़दम का भारत में इजराइली राजदूत डेनियल कैरमोन ने स्वागत किया था. नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तभी 2006 में इजराइल जा चुके थे और जब वह प्रधानमंत्री के रूप में इजराइली पीएम नेतन्याहू से मिले तो पहली बार में ही नेतन्याहू ने उन्हें बतौर भारतीय राष्ट्र प्रमुख इजराइल आने का न्योता दे डाला. भारत और इजराइल के संबंधों को लेकर कभी कहा जाता था कि दोनों देशों के बीच गोपनीय प्रेम संबंध हैं. पर यह बात जल्द ही पुरानी हो गई. मोदी के सत्ता में आने से पहले जो भारत हमेशा इजराइल को खुलकर गले लगाने से परहेज करता रहा, वह अब दुनिया के सामने दोस्ती की नई मिसाल बनकर खड़ा था. मोदी और नेतन्याहू ने एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम को कभी छुपाया भी नहीं. तब दोनों ही देशों के बाशिंदों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि मोदी काल में इजराइल और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी स्थापित मानदंडों से अलग होने जा रही है. ऐसा हुआ भी मोदी इजराइल गए और नेतन्याहू भारत आए. दोनों देशों में अब खुला प्रेम संबंध हैं. भारतीय प्रधानमंत्री वहां जा रहे हैं, इजराइली प्रधानमंत्री यहां आ रहे हैं. मोदी और नेतन्याहू के बीच कई मुलाक़ातें हो चुकी हैं. दोनों देशों के बीच रक्षा सौदों में बढ़ोतरी हुई है. अब इसमें क्या गोपनीयता वाले प्रेम की जगह खुले खेल ने ले ली है?

हालांकि यरूशलम के मसले पर भारत का रुख अलग था. संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यरूशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में दी गई मान्यता को ख़ारिज करने वाले प्रस्ताव पर भारत ने इजराइल के ख़िलाफ़ वोट किया. भारत के इस रुख़ से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी भारतीय जनता पार्टी के सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेताओं को तकलीफ़ भी हुई. स्वामी ने कहा कि भारत ने इजराइल के ख़िलाफ़ वोट देकर बड़ी ग़लती की है. उन्होंने कहा कि कश्मीर पर इजराइल एकमात्र ऐसा देश है जो भारत का खुलकर समर्थन करता है.पर कहते हैं मोदी की अगुआई वाले भारत ने ऐसा जानबूझकर किया. वजह इसी साल जनवरी के दूसरे हफ़्ते में इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत दौरे पर आ रहे थे. भारत और मोदी के पास उन्हे गर्मजोशी से मनाने के पर्याप्त मौके थे. भारत के एक पूर्व राजनयिक ने कहा भी, 'भारत ने इजराइल के ख़िलाफ़ वोट कर नहीं चौंकाया, बल्कि चौंकाया तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने. वह जानते थे कि अचानक यरूशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे कर भी वह इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन नहीं जुटा पाएंगे, और ऐसा ही हुआ भी. ट्रंप के इस फ़ैसले का साथ उनके सहयोगियों ने भी नहीं दिया. भारत ने बिल्कुल सोच समझकर फ़ैसला लिया और यह कोई चौंकाने वाला फैसला नहीं था. अब तो अरब के देश भी फिलीस्तीनियों और इजराइल के बीच संतुलन बैठाकर चल रहे हैं. ज़ाहिर है भारत को भी इस तरह की स्पेस चाहिए.' यों भी  संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में यरूशलम को राजधानी बनाने की अमेरिकी घोषणा को ख़ारिज करने के पक्ष में भारत समेत 128 देशों ने  वोट किया.

भारत ने भी  विश्वसमुदाय के साथ वोट कर यह ज़ाहिर किया है कि वह विश्व समुदाय के साथ ही है, और अभी भी किसी का पिछलग्गू नहीं बना है. भारत ने यह भी संकेत दिया कि वह अपनी विदेश नीति के स्थापित सिद्धांतों की बुनियाद के आधार पर ही आगे बढ़ेगा. भारत का यह क़दम काफ़ी अहम है और इसकी खास वजह है, विदेश नीति पर नेहरू की छाया, नेहरूयुगीन विदेश नीति जिसमें तीसरी दुनिया की एकता और अहिंसा के सिद्धांत अहम हैं, के आधार पर भारत फिलीस्तीनियों का खुलकर समर्थन करता रहा है. कई राजनीतिक विशेषज्ञ इस बात को मानते हैं कि भारत जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मज़बूत किरदार के रूप में उभरता गया वैसे-वैसे स्व-हित आधारित नीतियों को अपनाता गया. शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया ने नई करवट ली और भारत ख़ुद को अंतरराष्ट्रीय परिधि के मध्य में लाने में सफल रहा. मजबूत लोकतंत्र और कसी आर्थिक व्यवस्था के बीच पनपे बाजार ने इसमें काफी मजबूत भूमिका निभाई. इसके बाद भारत की हर सरकार के लिए सबसे पहले भारत था. मध्य-पूर्व और समूचे अफ्रीकी महाद्वीपीय देशों में भारत ने अपने हितों के हिसाब से ही नीतियों को अपनाया.

व्यवसाय, सुरक्षा, ऊर्जा और राजनयिक हितों के लिहाज से मध्य-पूर्व और अफ्रीकी देश भारत के लिए काफ़ी ख़ास हैं. भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार 2016-17 में अरब देशों से भारत का व्यापार 121 अरब डॉलर का रहा. यह भारत के कुल विदेशी व्यापार का 18.25 फ़ीसदी हिस्सा है. वहीं इजराइल के साथ भारत का व्यापार पांच अरब डॉलर का है जो कि कुल व्यापार का एक फ़ीसदी हिस्सा भी नहीं है. हालांकि भारत के इजराइल के साथ सुरक्षा संबंध काफ़ी गहरे हैं जबकि अरब के देश रोज़गार, विदेशी मुद्रा और ऊर्जा के लिहाज से काफ़ी अहम हैं.

मोदी काल में भारत, इजराइल संबंध अपने चरम पर हैं. भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा की इजराइल के साथ शुरू से ही सहानुभूति रही है. इससे पहले भी भारत ने गुटनिरपेक्ष देशों के बीच इजराइल विरोधी प्रस्तावों को हावी नहीं होने दिया था. 2015 में भारत यूएन में इजराइल के ख़िलाफ़ एक प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान मौजूद नहीं रहा था. मोदी के शासनकाल में ही जब फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास भारत के दौरे पर आए तो प्रधानमंत्री मोदी ने फिलीस्तीनी चिंताओं का समर्थन करते हुए शांतिपूर्ण इजराइल के साथ संप्रभु, स्वतंत्र और एकजुट फिलीस्तीन की बात कही थी. पर जब पीएम मोदी इजराइल के दौरे पर गए तो फिलीस्तीनी क्षेत्र रामल्ला नहीं गए.

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरब देशों के साथ भी राजनयिक संबंधों में गर्माहट भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. इजराइल जाने से पहले वह क़तर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का दौरा कर चुके थे. गणतंत्र दिवस पर अबु धाबी के क्राउन प्रिंस को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित भी किया था. पर यह सब मोदी के इ्जराइल जाने से पहले हुआ था. इजराइल के ख़िलाफ़ वोट देकर भारत ने यह जताने की कोशिश की थी कि सैद्धांतिक रूप से वह फिलीस्तीनियों के द्वी-राष्ट्र सिद्धांत के साथ अब भी है.

सच तो यह है कि किसी भी दौर में दोनों देशों के संबंधों में कोई खास कड़वाहट कभी नहीं आई. मुंबई में आतंकी हमले के बाद इजराइल और भारत के बीच रक्षा सौदे और गहरे हुए. लेकिन यह भी एक सच है कि कांग्रेसी राज में भारत की विदेश नीति हमेशा फिलीस्तीनी लोगों के पक्ष में रही, जो अब इजराइल उन्मुख दिख रही...
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