मिसाइल हमलों से बेखौफ बशर अल-असदः वह न तो सद्दाम हैं, न गद्दाफी और न ही सीरिया, इराक या लीबिया है

मिसाइल हमलों से बेखौफ बशर अल-असदः वह न तो सद्दाम हैं, न गद्दाफी और न ही सीरिया, इराक या लीबिया है बशर अल-असद को लेकर पश्चिमी देश भ्रम में हैं. अमेरिका का सीरिया पर हुआ हमला असद के फौलादी इरादों को छू भी नहीं सका है. यह ठीक है कि सीरिया के गृह युद्ध ने दुनिया के दो ध्रुवों अमेरिका और रूस के बीच फिर से शीत युद्ध को पिहला कर तनाव को उभार दिया है. ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका की सेनाएं सीरिया में हमले कर रही हैं और दूसरी तरफ रूस सीरिया सरकार के साथ खड़ा है. अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का मानना है कि राष्ट्रपति बशर अल-असद ने डूमा में विद्रोहियों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया, जबकि सीरिया और रूस इससे इनकार कर रहे हैं.

सीरिया पर अमेरिकी हमले से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नाराज हैं. पुतिन ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की ओर से सीरिया पर किये गये हमले को आक्रामकता वाला कृत्य करार देते दिया है. साथ ही कहा कि इससे सीरिया में मानवीय संकट को और बढ़ावा मिलेगा. क्रेमलिन की ओर से जारी बयान में रूस के नेता ने कहा कि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की ओर से किये गये हमले को लेकर मास्को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक बुला रहा है.

पुतिन ने कहा कि इस हमले का अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पूरी व्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा. उन्होंने रूस के इस नजरिये को फिर से दोहराया कि सीरिया के डाउमा शहर पर कथित रसायनिक हमला जिसके कारण यह हमला हुआ, झूठा था.

पुतिन ने कहा कि डाउमा का निरीक्षण करने वाले रूस के सैन्य विशेषज्ञों को हमले का कोई सबूत नहीं मिला है. उन्होंने हमला करने से पहले अंतरराष्ट्रीय रासायनिक हथियार निगरानी संस्था के निरीक्षकों द्वारा क्षेत्र का दौरा करने तक का इंतजार नहीं करने पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की आलोचना की.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस और अमेरिका आमने-सामने आ गए हैं. इस वैश्विक मंच पर अमेरिका के साथ फ्रांस और ब्रिटेन हैं, तो रूस के साथ चीन खड़ा नजर आ रहा है. सीरिया, रूस, ईरान और चीन ने अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन की ओर से किए गए हवाई हमले की कड़ी निंदा की है. साथ ही इस सैन्य कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन करार दिया है.

यह तो हुई दो दिग्गजों की बातें. पर इस पूरे विवाद में एक चेहरा जो बेहद अहम हो चला है, वह राष्ट्रपति बशर अल-असद का है. कौन हैं 52 वर्षीय बशर अल-असद, जिन्होंने इतने लंबे गृह युद्ध के बाद भी सीरिया में अपनी सत्ता को बचाए रखा है और जिनकी सरकार पर दुनिया में एक बड़ी जंग की आशंकाएं पैदा करने का आरोप लगाया जा रहा है.

कम लोग जानते हैं कि बशर अल-असद के भाई की सड़क हादसे में मौत न हुई होती तो शायद वह एक नेत्रविज्ञानी (ऑप्टीशियन) होते. असद उस परिवार से आते हैं जिसका सीरिया पर चार दशकों से भी ज्यादा वक्त से शासन है. असद के पिता हफीज अल-असद आधुनिक सीरिया के शिल्पी कहे जाते हैं. यह देश दशकों तक बगावत और बगावत-रोधी संघर्षों से जूझता रहा. साल 1970 में हफीज अल-असद ने अपने उस नेटवर्क की मदद से सत्ता हासिल कर ली, जो उन्होंने सीरियाई वायुसेना के कमांडरों और रक्षा मंत्री के बीच बनाया था.

हफीज ने ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा दिया जिससे राज्य का ज्यादातर नियंत्रण उन्हीं के पास रहा. हफीज के बड़े बेटे बासिल को उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था. वह राष्ट्रपति की सुरक्षा के प्रमुख थे और आधिकारिक मौकों पर सैन्य वर्दी में दिखाई पड़ते थे. लेकिन साल 1994 में एक कार हादसे में बासिल की मौत हो गई और सारा सियासी जिम्मा हफीज के छोटे बेटे बशर अल-असद के कंधों पर आ गया.

असद ने दमिश्क यूनिवर्सिटी से 1988 में नेत्र विज्ञान की पढ़ाई की थी और आगे की पढ़ाई के लिए 1992 में वह लंदन चले गए थे. जब भाई की मौत हुई तो वह लंदन में ही थे. सियासत में उनकी रुचि कम थी, लेकिन सत्ता संभालने की तैयारी के लिए पिता ने उन्हें वापस दमिश्क बुला लिया. 1994 में बशर एक टैंक बटालियन कमांडर बने, फिर 1997 में लेफ्टिनेंट कर्नल बने और 1999 में कर्नल बना दिए गए. पिता के निधन के बाद साल 2000 में बशर अल-असद राष्ट्रपति बने. उन्हें एक नियंत्रित और दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था विरासत में मिली थी, जहां शासक के करीबी लोगों में अलावी शिया समुदाय के सदस्यों का वर्चस्व था. असद परिवार भी इसी समुदाय से है. 74 फीसदी सुन्नी आबादी वाले सीरिया में अलावी शिया समुदाय की आबादी सिर्फ 5 से 10 फीसदी है.

उस वक्त आधुनिकतावादी और इंटरनेट समर्थक कहे जाने वाले बशर ने वादा किया कि वे नए सिरे से स्वतंत्रता लाएंगे और सीरियाई बाजार को खोलेंगे. उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया और मीडिया पर लगी पाबंदियों में भी ढील दी. इस दौरान राजनीतिक बहस और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में निडर होकर बातें कही गईं. लेकिन उनके ये खुलेपन वाले सुधारवादी प्रयास ज्यादा समय तक नहीं चल सके. बदलाव की गति ने सेना, उनकी अपनी बाथ पार्टी और अलावी शिया समुदाय के कान खड़े कर दिए. असुरक्षा के डर और अपना असर घटने की आशंका को देखते हुए उन्होंने असद पर दबाव बनाकर न सिर्फ इस बदलाव की गति को धीमा किया, बल्कि कई मोर्चों पर पुरानी परंपरावादी स्थितियों की हिमायत की.

विदेश नीति के मोर्चे पर बशर अल-असद ने इजराइल पर अपने पिता की तरह कठोर विदेश नीति अपनाई. उन्होंने बार बार कहा कि जब तक कब्जाई गई जमीन पूरी तरह लौटाई नहीं जाती, शांति स्थापित नहीं होगी. उन्होंने इजराइल के विरोधी चरमपंथी गुटों को समर्थन देना भी जारी रखा. 2003 में इराक में अमेरिका की अगुवाई वाले दखल की उन्होंने कड़ी आलोचना की. सीरिया की ओर से इराक के विद्रोही गुटों को समर्थन भी दिया गया, जिससे अमेरिका खासा नाराज हुआ. साल 2005 में लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी की हत्या के बाद अमेरिका और सीरिया के संबंध और खराब हो गए. इस हत्या का शक राष्ट्रपति असद, उनके करीबी शिया बहुल 'इनर सर्कल' और सीरियाई सुरक्षा सेवाओं पर जाहिर किया गया. असद सरकार को रूस, अपने पारंपरिक सहयोगी ईरान और ईरान के समर्थन वाले लेबनानी चरमपंथी गुट हिजबुल्ला से मजबूत कूटनीतिक और सैन्य सहयोग मिलता रहा.

फिर 2011 में जब मशहूर 'अरब स्प्रिंग' विरोध प्रदर्शनों ने ट्यूनीशिया और मिस्र में सत्तापलट कर दिया तो असद ने कहा कि सीरिया इस क़िस्म की बगावतों से पूरी तरह सुरक्षित है. बड़ी संख्या में लोग असद सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे, जिनमें निगरानी समूहों के मुताबिक, दो हजार से ज्यादा मौतें हुईं. असद ने प्रदर्शनकारियों की मांगें पूरी करने से इनकार कर दिया और प्रदर्शनों का हिंसक दमन किया. लेकिन सुरक्षा बलों की निर्मम कार्रवाइयां भी अरब स्प्रिंग की आवाज को दबा नहीं सकीं, बल्कि इसके बाद ये प्रदर्शन सशस्त्र संघर्ष में बदल गए. इन विद्रोहियों से असद की सरकारी सेनाएं लड़ रही हैं और एक समांतर लड़ाई इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों से भी जारी है. इस गृह युद्ध में अब तक एक करोड़ से ज्यादा लोग बेघर हो चुके हैं. तब से असद सीरिया की सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

क्षेत्रीय और विश्व शक्तियों को इस विवाद में दखल देना पड़ा है. ईरान और रूस सीरिया की सरकार को सैन्य और वित्त सहयोग दे रहे हैं, जबकि सुन्नी बहुल विपक्ष को अरब के खाड़ी देशों, तुर्की और पश्चिमी देशों का समर्थन है. दोनों पक्ष कहते हैं कि राजनीतिक हल ही इस विवाद को सुलझा सकता है. लेकिन युद्धविराम रोकने और संवाद शुरू करने की कई कोशिशें नाकाम रही हैं. इसीलिए सीरिया के गृह युद्ध के समाधान में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि असद को सत्ता में रहना चाहिए या नहीं. कई जानकार यह मानते हैं कि बशर नैसर्गिक तौर पर सुधारवादी ही थे और पूरी नेकनीयती से सीरिया में खुलापन लाना चाहते थे लेकिन उनके पिता के विश्वस्त परंपरावादी गुटों ने उन्हें विवश रखा. लंदन स्थित रिसर्च इंस्टिट्यूट चैथम हाउस के नील क्विलियम मानते हैं कि इसके बावजूद बशर ने पूरी सतर्कता से कुछ पश्चिमी पत्रकारों, अकादमिकों और नीति-निर्माताओं से संबंध रखे, ताकि वह उनकी पहुंच में दिख सकें.

अब जब सीरिया पर अमेरिकी हमला हुआ तो असद बेखौफ नजर आ रहे हैं. साफ है बशर अल-असद न तो सद्दाम हुसैन हैं, न कर्नल मुअम्मर गद्दाफी और इसी तरह सीरिया न तो इराक है, न ही लीबिया. जब तक रूस और पुतीन बसर के साथ हैं , उनका कुछ नहीं होना.
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