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बच जाएं शेयर तो गनीमत समझो

जनता जनार्दन संवाददाता , Aug 10, 2011, 10:24 am IST
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बच जाएं शेयर तो गनीमत समझो नई दिल्ली/मुम्बई/वाशिंगटन: दुनिया भर के शेयर बाजार उस आंधी का शिकार हो चुके हैं, जो अमेरिका से उठी है और समूचे विश्व की आर्थिक व्यवस्था को लीलने पर आमादा है. ऐसे में आपके शेयरों की कीमत कहां जाएगी कहना मुश्किल है. अमेरिका और यूरोप के ताजा आर्थिक संकट के कारण दुनियाभर के पूंजी बाजारों में अस्थिरता का माहौल कायम है। अमेरिकी शेयर बाजारों में सोमवार को ऐतिहासिक गिरावट और मंगलवार को यूरोप के सभी प्रमुख बाजारों में जारी गिरावट के कारण जानकार भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव के बारे में एकमत नहीं हैं।

विश्लेषक इस संकट के मद्देनजर भारतीय अर्थव्यवस्था पर मिश्रित असर होने की बात कह रहे हैं, तो वहीं केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मंगलवार को कहा कि शेयर बाजार के शुरुआती गिरावट से उबरने का मतलब है कि यहां बाजार की बुनियाद मजबूत है।

मुखर्जी ने निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स द्वारा जारी रिपोर्ट का हवाला देकर कहा, "कुछ बैंकों ने देश की साख की रेटिंग बढ़ाई है, जिसका अर्थ है कि यहां बाजार के सुधार की कोशिश सकारात्मक दिशा में है।"

अमेरिकी बाजार में सोमवार को हुई गिरावट का असर मंगलवार को एशियाई बाजारों पर पड़ा और यहां के सभी प्रमुख सूचकांकों में चार से नौ फीसदी तक की गिरावट देखी गई।

भारत के शेयर बाजारों में मंगलवार को लगातार दूसरे दिन गिरावट दर्ज की गई। बम्बई स्टॉक एक्सचेंज मंगलवार को शुरुआती कारोबार में 550 अंक की गिरावट के बाद उबरकर तेजी की स्थिति में पहुंच गया था, लेकिन बाद में यह 132.27 अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ। सेंसेक्स में 700 से अधिक अंकों का उतार-चढ़ाव देखा गया।

इस संकट की वजह से एशिया के अन्य बाजारों में मंगलवार को तेज गिरावट देखी गई। दक्षिण कोरिया, हांगकांग और जापान के शेयर बाजार सर्वाधिक प्रभावित हुए। दक्षिण कोरिया के कोप्सी में 3.6 प्रतिशत, हांगकांग के हैंगसैंग में 5.6 फीसदी और जापान के जापान के निक्केई में 1.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

एशियाई बाजार में आई इस गिरावट का असर दोपहर में खुले यूरोप के बाजारों पर देखा गया। लंदन, जर्मन और फ्रांस के बाजार औंधे मुंह गिरे। लंदन का एफटीएसआई 4.1 फीसदी, जर्मनी का डैक्स 5.7 फीसदी और फ्रांस का सीएसी 2.4 फीसदी की गिरावट के साथ कारोबार कर रहा था।

अमेरिकी शेयर बाजार में एक दिन पहले दो सालों की सर्वाधिक गिरावट के बाद मंगलवार को तीन प्रमुख शेयर सूचकांक लगभग एक फीसदी तेजी के साथ खुले।

इसके तुरंत बाद सूचकांकों में गिरावट दर्ज की गई, लेकिन यह तुरंत सम्भलकर एक फीसदी से अधिक की तेजी में आ गए। इस दौरान निवेशकों के डर का संकेत करने वाला सूचकांक ऊपरी स्तर पर बना रहा, लेकिन यह सोमवार के मुकाबले कुछ नीचे आया।

दोपहर से पहले डाऊ जोंस 2.07 फीसदी, एसएंडपी500 2.66 फीसदी और नास्डाक 3.15 फीसदी की तेजी के साथ कारोबार कर रहे थे। निवेशकों की नजर हालांकि अभी भी मंगलवार देर शाम से फेडरल रिजर्व के नीति सम्बंधी मामलों पर फैसले लेने वाले बोर्ड की बैठक पर टिकी है। सोमवार को अमेरिका के तीनों प्रमुख सूचकांकों में पांच से सात फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी।

ओबामा ने व्हाइट हाउस में संवाददाताओं से बातचीत में साख रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स द्वारा शुक्रवार को अमेरिका की साख रेटिंग कम किए जाने के संदर्भ में कहा कि यह देश की 'समाधान की जा सकने वाली' आर्थिक समस्या है और इसके लिए डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों दलों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पिछले सप्ताह कर्ज की सीमा बढ़ाने को लेकर हुई चर्चाओं के बाद उन्होंने हमारी राजनीतिक व्यवस्था की ताकत पर अविश्वास किया इसलिए रेटिंग में कमी की।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि एस एंड पी द्वारा अमेरिका की साख रेटिंग कम किए जाने से इतना असर नहीं पड़ना चाहिए, लेकिन बाजार में खरीददारी नहीं हो रही है। आईएनजी निवेश प्रबंधन के संपत्ति आवंटन के प्रमुख पॉल जेमस्की के हवाले से सीएनएन ने कहा, "रेटिंग में कमी को लेकर निवेशकों में एक ही धारणा है पहले शेयर बेचो फिर सवाल करो।"

यूरोपीय बाजार के खुलने के साथ मिले कुछ सकारात्मक संकेतों के कारण बाजार में जबरदस्त सुधार हुआ। दोपहर में 12.30 से एक बजे के बीच सूचकांकों में आए उछाल को देखकर ऐसा लगा कि मंगलवार को बाजार सकारात्मक रुख के साथ बंद होगा, लेकिन कुछ ही समय बाद इसमें फिर गिरावट आ गई।

इन सबके बीच हमारे देश भारत के आर्थिक नीति निर्माताओं का मानना है कि अमेरिकी साख की रेटिंग घटने का घरेलू अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक असर नहीं होगा, लेकिन इस विषय पर आर्थिक विश्लेषकों की राय अलग-अलग है।

कच्चे तेल का उदाहरण लें तो कुछ विश्लेषकों का मानना है कि निवेशक अमेरिका के सरकारी बांडों और प्रतिभूतियों से धन निकालकर कमोडिटी बाजार में लगाएंगे, जिससे तेल का भाव बढ़ेगा, लेकिन कुछ अन्य विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक मंदी के कारण मांग घटेगी इसलिए तेल की कीमत भी घटेगी।

अमेरिकी साख की रेटिंग घटाने वाली एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने कहा है कि उसके कदम का एशिया और प्रशांत क्षेत्र के बाजार पर तत्काल असर नहीं होगा, फिर भी उसने बाजार को सतर्क रहने की सलाह जारी की है।

उल्लेखनीय है कि भारत अमेरिका का 14वां सबसे बड़ा कर्जदाता देश है, जिसने अमेरिका को 40 अरब डॉलर का कर्ज दिया है।

एजेंसी ने कहा है कि जापान, भारत, मलेशिया, ताइवान और न्यूजीलैंड जैसे कुछ देशों की अर्थव्यवस्था में पहले ही हाल की मंदी से गिरावट चल रही थी, यदि फिर एक बार मंदी गहराएगी, तो इन देशों पर कुछ दीर्घकालिक असर हो सकता है।

प्रमुख बैंकिंग और परामर्श कम्पनी गोल्डमैन सैक्स ने हालांकि सरकार द्वारा सुधारवादी कदम अपनाने, शेयरों की कम कीमत, जैसे पहलुओं के आधार पर भारतीय शेयर बाजार पर सकारात्मक असर का अनुमान जताया है।

कम्पनी की एक रिपोर्ट में भारत को 'अंडरवेट' से ऊपर उठाकर 'न्यूट्रल' का स्थान दिया गया है।

एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने कहा है वैश्विक अर्थव्यस्था अनिश्चितता और नकारात्मक माहौल के कारण देश में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कम्पनियों पर बुरा असर हो सकता है।

फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) ने कहा, "वैश्विक अनिश्चितता के कारण देश की आर्थिक विकास दर कम रह सकती है।"

वर्ष 2010-11 में देश के सकल घरेलू उत्पाद में वस्तु एवं सेवाओं के निर्यात का योगदान लगभग एक चौथाई या 48.77 लाख करोड़ रुपये था।

विश्लेषकों ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि 2008 की मंदी का अन्य देशों की तुलना में बेहतर तरीके से मुकाबला करने के बावजूद भारत की रेटिंग 'बीबीबी' पर बरकरार है। यह रेटिंग आईसलैंड की भी है, जो दीवालिया होने के कगार पर है।

केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का हालांकि मानना है कि देश में विदेशी संस्थागत निवेशक बड़े पैमाने पर निवेश कर सकते हैं।

एक अन्य सम्भावना यह है कि यदि मंदी के कारण कच्चे तेल सहित अन्य कमोडिटी की कीमत कम होती है, तो इससे देश में बढ़ती महंगाई पर रोक लगेगी और भारतीय रिजर्व बैंक को कड़े कदम उठाने की जरूरत नहीं रहेगी।
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