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पैरों में छाले, नम आंखें और अंततः जीत, महाराष्ट्र में किसानों के धैर्य से झुकी सरकार, मांगे मानी, लौटे किसान

पैरों में छाले, नम आंखें और अंततः जीत, महाराष्ट्र में किसानों के धैर्य से झुकी सरकार, मांगे मानी, लौटे किसान मुंबईः यह कोई राजनीतिक रैली नहीं थी. देश का अन्नदाता किसान सड़क पर था. इस बार उसके पैरों में छाले, उनकी मांग को लेकर उनकी दृढ़ता के प्रतीक थे. इसीलिए सरकार को झुकना पड़ा.

अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा नासिक से मुंबई तक निकाले गए मोर्चे के बाद दबाव में आई महाराष्ट्र सरकार ने आंदोलनकारी किसानों की अधिकांश मांगें मान ली. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस व किसानों के प्रतिनिधिमंडल के बीच 3 घंटे तक बैठक चली. सरकार के लिखित आश्वासन के बाद आंदोलन समाप्त हुआ. सरकार का कहना है कि उन्होंने किसानों की 90 प्रतिशत मांगें मंजूर कर ली हैं.

पार्टियों के टंटे से दूर किसान अपना खेत छोड़कर जब दोसौ किलोमीटर पैदल चल कर देश की वाणिज्यिक राजधानी पहुंचा तो उसे उम्मीद थी कि अब, जबकि वे मुंबई आ गए हैं, तो उनके अच्छे दिन आ जाएंगे. उनके झुलसे हुए नुकीले चेहरों में उनकी आंखें धंस गई थीं, लेकिन इन आंखों में उम्मीदें साफ देखी जा सकती थीं. कुछ किसान औरतों ने बताया कि वे अपने बच्चों को पड़ोसियों के हवाले छोड़कर आंदोलन में आई हैं.

करीब 200 किलोमीटर पैदल चलकर आए किसानों के पैरों में कोई 'स्पोर्ट्स शूज' नहीं थे. जितने पैसों में वे आते हैं, उतने में तो कई किसान अपने दो महीने की गृहस्थी चला लेते हैं. सम्मानजनक जीवन पाने के इस संघर्ष की लड़ाई में कई किसान पुरुष और महिलाएं सादी चप्पलों में डामर की तपती सड़कों से होकर मुंबई के आजाद मैदान तक पहुंचे थे.  कइयों की चप्पलों की बद्दियां टूट गईं, तब भी वे 'जिंदाबाद' के नारे लगाते हुए नंगे पैर चले। कइयों के पैरों में छाले पड़ गए।

किसान स्त्रियों के पैरों के छाले दिन भर न्यूज चैनलों की टीआरपी बटोरते रहे। वहीं, कुछ राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने आग उगलते भाषण दिए और चले गए। इस बीच कुछ ऐसे लोग भी थे, पंडाल में बैठे किसानों से उनके हाल-चाल पूछ रहे थे। बिस्कुट और पानी दे रहे थे। जिनकी चप्पलें टूट गई थीं, कुछ लोग उन्हें चप्पलें दे रहे थे।

वह बार-बार अपनी चप्पल दिखा रही थी
नासिक के एक गांव से आई एक स्त्री आजाद मैदान में शहरी और कुछ पढ़े-लिखे लगने वाले हर आदमी को अपनी टूटी हुई चप्पल दिखा रही थी। उसके चेहरे पर सहज मुस्कान थी। हिंदी का एक शब्द भी उसके पल्ले नहीं पड़ रहा था। वह अपना नाम तक नहीं बता पा रही थी, लेकिन उसकी मुस्कान कह रही थी कि उसे कोई चप्पल दिला दे तो वह इस आंदोलन में अपने छालों और फटी विंवाइयों के साथ कुछ कदम और चले।

पहली बार देखा शहर
आंदोलन में शामिल होने वाले कई किसान ऐसे थे, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में पहली बार शहर देखा। मुंबई जैसा महानगर उनकी आंखों में किसी तीसरी दुनिया सा दिखा। आसमान छूती इमारतों को देखने के बाद उन्हें भरोसा था कि इस शहर के लोग उनकी समस्याओं को सुलझा देंगे। एक स्त्री ने कहा कि जो सरकार इतनी बड़ी इमारतें बना देती है, वह खेती के लिए हमें पानी क्यों नहीं दे सकती।

ऊपर वाले की खेती है
नासिक जिले के खकरा का एक छोटा सा गांव है जाबुरपाडा। 50-60 लोगों के इस गांव से आए किसान काशीनाथ रंगनाथ गावित ने बताया कि उनकी फसलों के लिए पानी का कोई इंतजाम नहीं है। इसी गांव के देवाजी जमा चौधरी ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी में कहा कि ऊपर वाले की खेती है और वही पानी देता है। उन्होंने लाल झंडा दिखाते हुए कहा कि यह हमें सरकार से पानी दिलाएगा।

तपती गर्मी और करीब 200 किलो मीटर की पैदल यात्रा के बाद सोमवार को आजाद मैदान पहुंचे कई किसानों के पैरों में फफोले पड़ गए थे। मोर्चे के साथ नासिक से मुंबई आई एक महिला के पैरों के फफोले देखकर कई लोगों के मुंह से आह निकल गई।

किसानों को तत्काल उपचार देने के लिए बीएमसी स्वास्थ्य विभाग के अलावा जेजे अस्पताल ने भी मैदान पर ऐम्बुलेंस की व्यवस्था की थी। जहां सैकड़ों किसानों को उपचार दिया गया। जेजे अस्पताल के डॉक्टरों से मिली जानकारी के अनुसार, पैदल चलने के कारण अधिकतर लोगों के पैरों में छाले और फफोलों की समस्या देखने को मिली।

इसके अलावा कुछ लोगों में डिहाइड्रेशन, बुखार, शरीर दर्द और उलटी दस्त की भी परेशानी देखी गई। हालांकि, किसी भी तरह की कोई गंभीर समस्या किसानों में नहीं दिखी। बता दें कि जेजे अस्पताल के डॉक्टरों ने 600 से अधिक किसानों को मैदान में ही ओपीडी आधारित उपचार दिया.

महाराष्ट्र सरकार किसानों की यह मांगें मानीं-

- आदिवासियों को वन जमीन अधिकार कानून के तहत जमीन के पट्टे देने का फैसला छह माह के अंदर किया जाएगा. आदिवासियों को 4 हेक्टेयर तक की जमीन का पट्टा दिया जाएगा.

- कृषि उत्पादों की लागत का डेढ़ गुना भाव देने के लिए सरकार पुख्ता कदम उठाएगी. साथ ही राज्य मूल्य आयोग की समिति में विभिन्न किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा. इसके अलावा 50 प्रतिशत अनाज नाफेड के माध्यम से खरीदा जाएगा.

- विदर्भ और मराठवाड़ा में कीड़े लगने से कपास और धान की फसलों को होने वाले नुकसान की भरपाई की राशि प्रदेश के सभी 1162 राजस्व मंडलों में वितरित की जाएगी. ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से फसलों को हुए नुकसान की भरपाई भी तत्काल की जाएगी.

 - नदी जोड़ो परियोजना के तहत नार-पार और दमन गंगा पिंजाल नदी का पानी अहमदनगर और मराठवाड़ा में भेजने की व्यवस्था की जाएगी. इसके अलावा नासिक के सुरगाणा तहसील के 31 कोल्हापुर पद्धति के बांधों को नदी जोड़ो परियोजना में शामिल किया जाएगा.

- पुराने और फट चुके राशन कार्डों को छह महीने में बदला जाएगा. सरकार का कहना है कि आदिवासी इलाकों में यह काम तीन माह में पूरा होगा. आवंटित अनाज लाभार्थी को नहीं मिलने से जुड़ी शिकायतों का निपटारा मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति करेगी.

- किसानों से खरीदे जाने वाले दूध की कीमत गन्ने की तर्ज पर 70-30 के फार्मूले के अनुसार निश्चित की जाएगी. इसके लिए राज्य सरकार की तरफ से जल्द बैठक बुलाई जाएगी. किसान चाहते हैं कि दूध का खरीद मूल्य 40 रुपए प्रति लीटर किया जाए.

- गौचर जमीन के अतिक्रमण को हटाकर जमीन आदिवासियों के नाम की जाएगी. देवस्थान इनाम की जमीन पर वर्षों से खेती करने वाले किसानों के नाम वह जमीन की जाएगी. सरकार इसके लिए खासतौर पर विधेयक भी लाएगी.
महाराष्ट्र सरकार से अपनी इन मांगों को मनवाने में सफल रहे किसान

-संजय गांधी निराधार योजना के तहत लाभार्थियों को मिलने वाली 600 रुपए की राशि को बढ़ाने के बारे में सरकार दो महक भीतर फैसला करेगी. किसान सभा ने राशि को 2000 रुपए करने की मांग की है.
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