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गरिमापूर्ण मृत्यु हर व्यक्ति का मौलिक अधिकारः इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

गरिमापूर्ण मृत्यु हर व्यक्ति का मौलिक अधिकारः इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए लिविंग विल (इच्छा मृत्यु) को कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दे दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक विधायिका की तरफ से इसपर कानून नहीं लाया जाता है, तब तक कोर्ट की गाइडलाइन ही मान्य होंगी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लेकिन सशर्त लिविंग विल से पहले मेडिकल बोर्ड और घरवालों की मंजूरी जरूरी है. ये सारी प्रक्रिया जिला मजिस्ट्रेट की देखरेख में होनी चाहिए. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली संवैधानिक पीठ ने 12 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति काफी बीमार है और वो बीमारी लाइलाज है, तो उसे ससम्मान मृत्यु का अधिकार है. यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि आखिर उसे कब लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा जाए. मेडिकल बोर्ड के आदेश के बाद ही उसे हटाया जाएगा. कोर्ट के अनुसार, 'लिविंग विल' के लिए व्यक्ति के परिवार या फिर करीबी व्यक्ति हाईकोर्ट में अपील कर सकता है. जिसपर हाईकोर्ट फैसला लेगा.

कोर्ट के आदेश के मुताबिक, हाईकोर्ट की निगरानी में ही मेडिकल बोर्ड तैयार किया जाएगा और उस आधार पर पूरी प्रक्रिया की जाएगी.

आपको बता दें कि इससे पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की ओर से कहा गया था कि गरिमापूर्ण मृत्यु पीड़ा रहित होनी चाहिए. इसके लिए इस प्रकार की प्रक्रिया को तैयार किया जाना चाहिए जिससे गरिमापूर्ण तरीके से मृत्यु हो सके.

केंद्र सरकार इस मुद्दे पर पहले ही सुप्रीम कोर्ट में कह चुकी है कि इच्छा मृत्यु पर अभी सरकार सारे पहलुओं पर गौर कर रही है और इस मामले में आम जनता और इस क्षेत्र में काम कर रहे सामाजिक संगठनों से सुझाव भी मांगे गए हैं.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ में इच्छा मृत्यु यानी लिविंग विल का विरोध किया. लेकिन, पैसिव यूथेनेशिया को मंजूर करते हुए कहा कि इसके लिए कुछ सुरक्षा मानकों के साथ ड्राफ्ट बिल तैयार है.

ऑक्‍सफोर्ड इंग्लिश डिक्‍शनरी के मुताबिक जब कोई व्‍यक्ति असाध्‍य बीमारी से ग्रस्‍त हो जाता है और उसकी पीड़ा असहनीय होती है या वह ऐसे कोमा में होता है, जहां से उसके उबरने के चांस नहीं होते तो उसकी मृत्‍यु की चाह को पूरा करना यूथेनेसिया की श्रेणी में परिभाषित किया जा सकता है. 17वीं सदी में इस मेडिकल दशा को फ्रांसिस बेकन ने 'यूथेनेसिया' नाम दिया. उन्‍होंने इसको पीड़ा रहित सुखद मृत्‍यु कहा.

एक्टिव यूथेनेसिया
बायोएथिक्‍स के क्षेत्र में इस विषय पर इस वक्‍त सबसे ज्‍यादा चर्चा हो रही है. वैसे इस संबंध में विभिन्‍न देशों में अलग-अलग कानून हैं. यूथेनेसिया को भी एक्टिव और पैसिव यूथेनेसिया में विभाजित किया जा सकता है. एक्टिव(सक्रिय) यूथेनेसिया के तहत मेडिकल पेशेवर या कोई अन्‍य व्‍यक्ति जानबूझकर ऐसा काम करता है, जिससे रोगी की मृत्‍यु हो जाती है.

पैसिव यूथेनेसिया
इसके तहत जब रोगी को जीवित रखने के जरूरी जतन नहीं किए जाते या जब उसको जीवित रखने के प्रयासों को छोड़ दिया जाता है तो वह पैसिव यूथेनेसिया की श्रेणी में आता है. इसके तहत रोगी के लाइफ-सपोर्ट सिस्‍टम को बंद कर दिया जाता है. फीडिंग ट्यूब को डिस्‍कनेक्‍ट कर दिया जाता है. जीवन की अवधि को बढ़ाने वाली ड्रग्‍स को नहीं दिया जाता. सुप्रीम कोर्ट ने सशर्त रूप से पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत दी है. इस संबंध में कोर्ट ने गाइडलाइन जारी किए हैं. जब तक संसद में इस बारे में कानून नहीं बन जाता तब तक इन्‍हीं गाइडलाइंस के आधार पर पैसिव यूथेनेसिया की अनुमति है.

दरअसल एक्टिव और पैसिव यूथेनेसिया पर लंबी बहस चल रही है. कई लोगों का यह तर्क है कि इलाज रोककर रोगी को मरने की इजाजत देना नैतिक रूप से सही है. ऐसे लोगों का यह भी तर्क है कि जानबूझकर किसी को मारना नैतिक रूप से गलत है. हालांकि कुछ लोग इसकी आलोचना करते हैं कि वास्‍तव में एक्टिव और पैसिव यूथेनेसिया एक ही बात है. ये कहते हैं कि रोगी का जरूरी इलाज नहीं करना या जानबूझकर इलाज रोक देने में कोई अंतर नहीं है.

अलग-अलग देशों में इस संबंध में अलग-अलग प्रावधान हैं. बेल्जियम, कनाडा और स्विट्जरलैंड जैसे चुनिंदा देशों में ही एक्टिव यूथेनेसिया को विशेष श्रेणी में अनुमति है. इसके लिए कई शर्तें लगाई गई हैं. बेल्जियम में यह व्‍यवस्‍था है कि रोगी के आग्रह पर डॉक्‍टर उसके जीवन को समाप्‍त कर सकते हैं. लेकिन अधिकांश देशों में कई शर्तों के साथ पैसिव यूथेनेसिया की ही अनुमति है.
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