राहुल गांधीः कांग्रेस अध्यक्ष, मौके और चुनौतियां

राहुल गांधीः कांग्रेस अध्यक्ष, मौके और चुनौतियां राहुल गांधी अब कांग्रेस अध्यक्ष हैं. उनके सामने अपने को साबित करने के भरपूर मौके हैं, और चुनौतियां भी कुछ कम नहीं उनकी पार्टी विपक्ष में है, इसलिए वे सरकार की गलतियों पर उसे घेरने की रणनीति भी बना सकते हैं, जिससे जनता का भरोसा उनसे जुड़े.

गुजरात की सियासी रणभूमि में कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी नए तेवर और नए अंदाज में नजर आए. वो लोगों से मिल रहे थे, सेल्फी खिंचवा रहे थे, अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ जमीनी कार्यकर्ता से घुलमिल रहे थे. रैलियों के भाषण में राहुल की जुबान से ट्वीट की वही लाइनें निकल रही थीं, जिनको टीवी और सोशल मीडिया बतौर खबर इस्तेमाल कर सकें.

अपने भाषण में राहुल कोशिश करते थे कि, जनता के साथ संवाद कर सकें. हर सवाल, आरोप और अपनी बात पर वो जनता से हामी भरवाते थे. इस नए नवेले राहुल गांधी ने कांग्रेस को नई उम्मीद दी.

और तो और संसद में हमले की 16वीं बरसी यानी 13 दिसंबर के मौके पर संसद में जब सभी पार्टियों के नेता श्रद्धांजलि देने के लिए जमा हुए. तब राहुल गांधी बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को जगह देने के लिए आगे बढ़े. हुआ ये कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रद्धांजलि दे रहे थे तभी आडवाणी वहां पहुंचे और दूर खड़े हो गए क्योंकि उनके खड़े होने की जगह ही नहीं थी. ये देखते ही सोनिया गांधी के पीछे खड़े राहुल गांधी एकदम से बाहर आए और आडवाणी को पकड़कर आगे ले गए.

कभी विपक्ष में कांग्रेस पर वार करने वाले आडवाणी भी राहुल गांधी के इस कदम से हैरान दिखे. साथ ही बीजेपी ने नेता राहुल गांधी की सक्रियता देख थोड़ा सकपका गए. बाद में एक बीजेपी नेता ने माना कि राहुल गांधी का नया अंदाज कुछ खास है.

वैसे राहुल गांधी का ये नया रंग कांग्रेस को खूब पसंद आ रहा है. वरिष्ठ नेताओं के प्रति राहुल गांधी का झुकाव कांग्रेस पार्टी में भी दिखा. राहुल के इस कदम से हाशिए पर बैठे पुराने कांग्रेसी नेताओं में नया उत्साह खुल कर दिखा. गुजरात चुनाव में ये गर्मजोशी न सिर्फ राहुल गांधी के चुनाव प्रचार में दिखी बल्कि उनके साथ लगे कांग्रेस के नए पुराने नेताओं में भी दिखी लेकिन क्या ये काफी है.

राहुल गांधी 16 दिसंबर को कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभालेंगे. राहुल ऐसे समय कांग्रेस पार्टी की बागडोर ले रहे हैं जब पार्टी अभी तक सबसे बुरे समय से गुजर रही है. 132 साल पुरानी पार्टी का अस्तित्व देश के पांच राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश में ही बचा है.

लोकसभा चुनाव में 50 सीटों के नीचे तो कांग्रेस 2014 में ही आ गई थी, लेकिन उसके बाद एक के बाद एक राज्यों से अपनी सत्ता गंवाती चली गई है. जाहिर है कि कांग्रेस के नए अध्यक्ष के सिर पर कांटों का ताज सजा है और उम्मीदें आसमान की हैं. ऐसे में उनके सामने अनेक चुनौतियां खड़ी हैं, जिनका सामना करना आसान नहीं होगा.

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस की इतनी बुरी स्थिति पहले नहीं थी. देश में अगर राज्यों में कांग्रेस की सत्ता का आकलन किया जाए तो कांग्रेस अध्यक्ष रह चुकी सोनिया गांधी ने जब 1998 में जब अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली थी, उस वक्त कांग्रेस की सरकार सिर्फ चार राज्यों में थी. हालांकि लोकसभा में 141 सांसद थे. कांग्रेस की सरकारें जिन चार राज्यों में बची थीं वो थे- मिजोरम. नगालैंड, मध्य प्रदेश और उड़ीसा. बाकी सभी राज्यों में और केंद्र में पार्टी हार चुकी थी.

देश उन दिनों वाकई लगभग 'कांग्रेस मुक्त' हो चुका था. पार्टी टूट-टूट कर बिखर रही थी. पार्टी के बड़े बड़े नेता अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी, माधव राव सिंधिया, ममता बैनर्जी, जी के मूपनार, शीला दीक्षित, पी चिदंबरम आदि जैसे दिग्गज पार्टी छोड़ चुके थे. और कांग्रेस में लगातार टूट हो रही थी. आंकड़ों पर नजर डालें तो उस दौरान करीब 15 पार्टियां कांग्रेस से टूट कर निकली थीं.

लेकिन सोनिया गांधी के आने के बाद ये सिलसिला थमा. पंद्रह में से बारह पार्टियां फिर से कांग्रेस में आ मिलीं. तृणमूल कांग्रेस का स्वतंत्र वजूद बरकरार रहा, जबकि मणिपुर स्टेट कांग्रेस का RJD में और गोवा राजीव कांग्रेस का बाद में NCP में विलय हो गया था.

सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के कुछ ही महीनों बाद कांग्रेस में चुनाव जीतने का सिलसिला शुरू हो गया. 1998 में ही दिल्ली, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उसकी सरकार बन गई. और इसके साथ ही पार्टी में नई जान आ गई. हालांकि केंद्र में वापस आने में पार्टी को इंतजार करना पड़ा जो कि 2004 में यूपीए गठबंधन की सरकार के रूप में आ गई.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अगर कांग्रेस एक जुट हो जाए तो एक बार फिर वो पार्टी की ताकत देश को दिखा देंगे लेकिन उसके लिए राहुल गांधी को सोनिया गांधी की तरह जुट कर काम करना होगा. साल 2004 के चुनाव से पहले आम राय ये बनाई गई थी कि अटल बिहारी वाजपेयी ही प्रधानमंत्री बनेंगे पर सोनिया ने देशभर में घूमकर खूब प्रचार किया और सब को चौंका देने वाले नतीजों में यूपीए को 200 से ज्यादा सीटें मिलीं.

सोनिया गांधी स्वयं रायबरेली, उत्तर प्रदेश से सांसद चुनी गई थीं. इतिहासकारों की सुनें तो उनका मानना है कि राहुल गांधी और कांग्रेस जैसी पार्टी को नकारना गलत होगा भले ही उनके सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा नेता हो. हालांकि उन्हें अपनी मां सोनिया गांधी की कुछ गलतियों से बचना होगा.

जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व किया, वह एक राजनीतिक नौसिखिया थीं और उन पर लगातार विदेशी मूल होने के हमले हो रहे थे. इस दौरान वो मुट्ठी भर वरिष्ठ नेताओं की सलाह पर पूरी तरह से निर्भर हो गई थीं और पार्टी का सिर्फ चेहरा बन कर रह गई थीं. गठबंधन सरकार के बाद तो वो पूरी तरह से गठबंधन को संभालने में लगी रहीं और पार्टी के संगठन से दूर होती रहीं.

यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव और निकाय चुनाव में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के गढ़ से कांग्रेस साफ हो गई. अपने लोगों को नाराज न करके सोनिया गांधी ने संगठन को बहुत मजबूत नहीं होने दिया और नतीजा संगठन सोनिया गांधी के हाथ से फिसल गया. राहुल गांधी की पहली चुनौती यही है कि पार्टी के हित में उन्हें कड़े फैसले लेने होंगे ताकि संगठन को मजबूती मिल सके. साथ ही जमीनी कार्यकर्ता को भी पार्टी नेतृत्व के साथ जोड़ना होगा.

भारत की पूर्व इंदिरा गांधी की नीति थी कि कोई भी नेता इतना शक्तिशाली न बने कि केंद्र की सरकार के समानांतर आ जाए. वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यनीति इसी ओर इशारा करती है. लेकिन सोनिया गांधी ने गठबंधन की राजनीति को सफल करने के लिए शक्तिशाली क्षेत्रीय नेताओं जैसे भूपिंदर सिंह हुड्डा, वीरभद्र सिंह, अजीत जोगी, अमरिंदर सिंह और वाईएस राजशेखर रेड्डी को काफी मजबूती दी.

क्षेत्रीय नेताओं को नाराज करने से बचती रहीं और इसी के चलते उन पर मजबूत निर्णय न लेने वाली नेता का तमगा लगता रहा. राहुल गांधी को अपनी मां और अपनी दादी के नीति में बीच में रास्ता निकलना होगा. ताकि ये नेता कांग्रेस का साथ देते रहें और पार्टी के लिए खतरा भी न बने.

सोनिया गांधी ने अपने 19 साल के समय काल में कांग्रेस के दफ्तर के बजाय अपने घर दस जनपथ को अपना दफ्तर बनाया. कांग्रेस मुख्यालय में उनका दफ्तर सिर्फ सफाई के लिए खोला जाता था और कभी-कभार उनके खास कार्यक्रम के लिए खोला जाता.

घर पर दफ्तर होने की वजह सोनिया गांधी तक पहुंच काफी कम नेताओं की थी. आम कार्यकर्ता की भाषा में-दफ्तर में रौनक ही नहीं है या वो मिलना तो दूर-दिखती तक नहीं हैं. इससे वो जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से दूर होती रही हैं.

मनोविश्लेषक मानते हैं कि पार्टी के नेता को लोगों के बीच में दिखते रहना चाहिए, तभी एक जुड़ाव बना रहता है. और राहुल गांधी को यही करना है. दफ्तर में बैठने से लोगों में ये संदेश भी जाएगा कि उनकी बात सुनने के लिए कोई है.

सोनिया गांधी संसद में मौजूद रहती थीं और बहस में भी भाग लेती थीं लेकिन संसद में अपनी पार्टी के नेतृत्व को लेकर वो दूसरों पर निर्भर रहती थीं. वो बहुत अच्छी वक्ता नहीं थीं और हमेशा तैयार किया गया भाषण ही पढ़ती थीं. वो सदन की बहस में कभी भी हस्तक्षेप नहीं करती थीं. हालांकि सोनिया के पक्षधरों का मानना था कि इसका कारण उनकी हिन्दी कमजोर थी.

विपक्ष के नेता के रूप में शुरू से कोई और रहता था. सूची लंबी है-माधवराव सिंधिया, शिवराज पाटिल, प्रणव मुखर्जी और अब मल्लिकार्जुन खड़गे. अगर राहुल गांधी खुद को को नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं तो उन्हें संसद में अधिक सक्रिय होना पड़ेगा. अलग-अलग विषयों पर बाकायदा भाषण देना पड़ेगा और संसद के बहस में गंभीर और ठोस भाषण के साथ भाग लेना होगा.

बीजेपी ने मीडिया के साथ शुरू से दोस्ती साधी. लालकृष्ण आडवाणी, एम वेंकैया नायडू और नितिन गडकरी ने अपने अध्यक्ष काल में बीजेपी के दृष्टिकोण को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया. और वो मीडिया के लिए सुलभ रहे. जबकि सोनिया गांधी वाली कांग्रेस ने मीडिया को संदेह से देखा और वो मीडिया से बचते रहे.

सोनिया गांधी के सलाहकारों ने सुनिश्चित किया कि सोनिया तक मीडिया की पहुंत सीमित ही रहे. ज्यादातर प्रवक्ता ही पत्रकारों से मिलते थे. कुछ-कुछ राहुल गांधी का रिकॉर्ड भी ऐसा ही था लेकिन गुजरात चुनाव के बाद राहुल गांधी मीडिया से जुड़ते नजर आए.

कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में, राहुल गांधी को पार्टी के मुख्यालय में कुछ खास दिनों के लिए मीडिया के सामने सुलभ होना पड़ेगा. अगर पार्टी को अपनी बात लोगों तक पहुंचानी है तो सोशल मीडिया के साथ साथ पारंपरिक मीडिया को भी अपना दोस्त बनाना पड़ेगा. तभी वो अपनी बात प्रभावी तरीके लोगों तक पहुंचा पाएंगे.

गुजरात चुनाव में राहुल के बदले हुए रूप के बाद लोगों की उम्मीदें काफी बड़ गई है. अगले साल देश में करीब आठ राज्यों के चुनाव हैं और उसके बाद लोकसभा चुनाव है. गुजरात और हिमाचल में कांग्रेस को जीतने की उम्मीद नहीं है लेकिन आने वाले चुनाव में लोग राहुल का करिश्मा देखना चाहते हैं.

अब राहुल को दो चीजों पर डट जाना है एक राजनीतिक मैदान में टिके रहना और दूसरा हर हाल में चुनाव जीतना. इसके लिए उन्हें हर तरह की रणनीति बनानी होगी. बीजेपी में इस समय जीतने की भूख है, निकाय चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव, सब में उसी दृढ़ता से जुटी है उसके मुकाबले राहुल गांधी को नए आयाम गढ़ने होंगे तभी वो खुद को बेहतरीन नेता के रूप में भी साबित कर पाएंगे.
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