Wednesday, 14 April 2021  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

रामसेतु, मानव निर्मित प्राचीन पुल केवल कोरी कल्पना नहीं, अमेरिकी साइंस चैनल का दावा

जनता जनार्दन संवाददाता , Dec 14, 2017, 12:06 pm IST
Keywords: Ram Setu   Adam's Bridge   Palk Bay   Gulf of Mannar   Ancient Land Bridge   Smriti Irani   Indiana university   रामसेतु   भगवान राम   एडम्स ब्रिज   आदम का पुल   मानव निर्मित  
फ़ॉन्ट साइज :
रामसेतु, मानव निर्मित प्राचीन पुल केवल कोरी कल्पना नहीं, अमेरिकी साइंस चैनल का दावा नई दिल्लीः रामसेतु का अस्तित्व है या नहीं, इसे लेकर एक बार फिर बहस और राजनीति शुरू हो गई है. एक अमेरिकन साइंस चैनल ने दावा किया है कि रामसेतु कोरी कल्पना नहीं हो सकता है क्योंकि इस बात के प्रमाण हैं कि भारत और श्री लंका के बीच स्थित इस बलुई रेखा पर मौजूद पत्थर करीब 7000 साल पुराने हैं. इसके बारे में मान्यता है कि भगवान राम और उनकी वानर सेना ने श्री लंका में रावण पर हमले के लिए इस सेतु का निर्माण किया था.

रामसेतु के अस्तित्व को लेकर अक्सर बहस होती रहती है. हिंदूवादी संगठन जहां दावा करते हैं कि यह वही रामसेतु है, जिसका जिक्र रामायण और रामचरितमानस में है, वहीं एक पक्ष ऐसा भी है जो इसे केवल एक मिथ या कल्पना करार देता है. साल 2007 में रामसेतु के मुद्दे पर कांग्रेस सरकार के सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे से एक बड़ा राजनीतिक बवाल तक खड़ा हो गया था.

हालांकि अब एक साइंस चैनल ने तथ्यों के साथ दावा किया है कि रामसेतु पूरी तरह कोरी कल्पना नहीं हो सकता है, क्योंकि इस बात के प्रमाण हैं कि भारत और श्री लंका के बीच स्थित इस बलुई रेखा पर मौजूद पत्थर करीब 7000 साल पुराने हैं.

साइंस चैनल ने सोमवार को एक वीडियो ट्विटर पर डाला, जो देखते ही देखते भारत में वायरल हो गया. वीडियो में कुछ भूविज्ञानियों और वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि रामसेतु पर पाए जाने वाले पत्थर बिल्कुल अलग और बेहद प्राचीन हैं.

भूविज्ञानी ऐलन लेस्टर के मुताबिक, 'हिंदू धर्म में भगवान राम द्वारा ऐसे ही एक सेतु के निर्माण का जिक्र है. इस पर शोध करने पर पता चला कि बलुई धरातल पर मौजूद ये पत्थर कहीं और से लाए गए हैं.' हालांकि ये पत्थर कहां से और कैसे आए, यह आज भी एक रहस्य है.

पुरातत्वविद चेल्सी रोज़ कहती हैं, 'जब हमने इन पत्थरों की उम्र पता की, तो पता चला कि ये पत्थर उस बलुई धरातल से कहीं ज्यादा पुराने हैं, जिस पर ये मौजूद हैं.' ये पत्थर करीब 7000 साल पुराने हैं, वहीं जिस बलुई धरातल पर ये मौजूद हैं वह महज 4000 साल पुराना है.

चैनल का दावा है कि इस स्टडी से स्पष्ट होता है यह ढांचा प्राकृतिक तो नहीं है, बल्कि इंसानों द्वारा बनाया गया है. चैनल के मुताबिक, कई इतिहासकार मानते हैं कि इसे करीब 5000 साल पहले बनाया गया होगा और अगर ऐसा है, तो उस समय ऐसा कर पाना सामान्य मनुष्य के लिहाज से बहुत बड़ी बात है.

रामसेतु को लेकर अमेरिकी वैज्ञानिकों ने भले ही मुहर लगा दी हो, लेकिन देश में अभी भी इस पर सियासी घमासान और चर्चा जारी है. केंद्रीय कानून व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह सेतु हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है.

प्रसाद ने कांग्रेस पर परोक्ष रूप से कटाक्ष करते हुए कहा है कि अब उन लोगों को जनता को जवाब देना चाहिए जो सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर इस सेतु के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रहे थे.  वहीं केन्द्रीय भूतल परिवहन एवं जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने यह घोषणा की कि केन्द्र सरकार राम सेतु नहीं तोड़ेगी. इन सबके बाद देश की राजनीति में घमासान तेज हो गया है.

गृहराज्य मंत्री किरण रिजजू ने भी रामसेतु के अस्तित्व पर सवाल उठाने वालों को आईना दिखाया है. अमेरिका के आर्कियोलॉजिस्टों ने अपनी रिपोर्ट में रामसेतु को सुपर ह्यूमन क्रियेशन माना है. इसमें यह दावा किया गया है कि यह ढांचा वास्तव में मानव निर्मित है ना कि प्राकृतिक. वैज्ञानिकों ने इस ब्रिज की आयु करीब सात हजार साल के करीब बताई है. उनका कहना है कि रामसेतु के नीचे प्राकृतिक चट्टाने हैं और इसके ऊपर पत्थर लाकर रखे गए हैं.

रामसेतु पर अमेरिकी वैज्ञानिकों की मुहर लगने के बाद जहां बीजेपी ने कांग्रेस पर निशाना साधा है वहीं कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने भी पलटवार किया है. उन्होंने कहा कि सरकार के वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री राम पर बोलने के लिए अंग्रेजी का सहारा ले रहे हैं. इन लोगों को हिन्दी में शब्द नहीं मिल रहे हैं. सुरजेवाला ने कहा कि राम कण-कम में हैं. रोम-रोम में हैं. अखंड हैं. राम पूरे ब्रह्मांड में हैं. राम अनंत हैं.

सुरजेवाला ने आगे कहा कि आप मूर्ति में राम को ढूंढ सकते हैं, क्योंकि आस्था का विषय है, लेकिन अच्छा होता कि बीजेपी नेता गुजरात के दिलों में छिपे राम, मारे गए 14 पाटीदार नौजवानों और झूठे मुकदमें में फंसाए गए 20 हजार पाटीदारों के दिल में छिपे राम, दलितों, गरीबों, किसानों के राम को देख लेते तो उन्हें हर रोज नये मुद्दे गढऩे की जरूरत नहीं पड़ती. उन्होंने कहा कि बीजेपी भटक रही है अब विकास की बात नहीं कर रही है. वह मुद्दों पर नहीं आ रही है.

आपको बता दें कि रामसेतु को लेकर यूपीए सरकार के समय ही राजनीतिक घमासान मचा था. इस सरकार में एक समय तो ऐसा आया था कि इस ब्रिज को तोड़े जाने या जोड़े जाने तक की नौबत आ गई थी. कांगेस इस पर सवाल खड़ी करती रही है. यूपीए सरकार ने तो कोर्ट में इसके खिलाफ हलफनामा भी दाखिल किया था.

यूपीए-1 सरकार ने रामसेतु को तोड़ने का प्रस्ताव इसलिए लाया था क्योंकि मालवाहक जहाजों तथा नौसेना के जहाजों को काफी लंबा रूट तय करना पड़ता है. जानकारी के मुताबिक भारी जहाज इसके ऊपर से गुजराने के बाद उसकी पेंदी में रामसेतु की चट्टानों से टकराने या जहाज के फंसने का खतरा बना रहता है.

नौसेना के तत्कालीन रियर एडमिरल ने निजी बातचीत में बताया था कि इसके चलते भारी जहाजों या माल से लदे जहाजों को इस क्षेत्र में नहीं ले जाया जाता है. इसी सिलसिले में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए-1 की सरकार ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कोहराम मचा दिया था.

माना जा रहा है कि जहाजरानी मंत्रालय और नौसेना की रिपोर्ट आदि को देखते हुए तत्कालीन केन्द्र सरकार ने रामसेतु की थोरियम से बनी चट्टानों को हटाने पर विचार करना शुरू कर दिया था. सूत्रों की मानें तो रामसेतु की चट्टानें काफी मजबूत स्थिति में हैं. इन्हें तोड़ना इतना आसान नहीं है. हालांकि इसके आस्था से जुड़े होने के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी.

एडम्स ब्रिज या रामसेतु: भारत के दक्षिणपूर्व में रामेश्वरम और श्रीलंका के पूर्वोत्तर में मन्नार द्वीप के बीच चूने की उथली चट्टानों की चेन है, इसे भारत में रामसेतु व दुनिया में एडम्स ब्रिज (आदम का पुल) के नाम से जाना जाता है. इस पुल की लंबाई लगभग 30 मील (48 किमी) है. यह ढांचा मन्नार की खाड़ी और पॉक स्ट्रेट को एक दूसरे से अलग करता है.

इस इलाके में समुद्र बेहद उथला है. समुद्र में इन चट्टानों की गहराई सिर्फ 3 फुट से लेकर 30 फुट के बीच है. इस चट्टानी उथलेपन के कारण यहां नावें चलाने में खासी दिक्कत आती है. कहा जाता है कि 15 शताब्दी तक इस ढांचे पर चलकर रामेश्वरम से मन्नार द्वीप तक जाया जा सकता था लेकिन तूफानों ने यहां समुद्र को कुछ गहरा कर दिया.

और कहां ऐसी संरचनाएं: रेत और बालू के ढेर से दो द्वीपों को जोड़ने वाली ऐसी संरचनाएं दुनिया में कई जगहों पर पाई जाती हैं. अमेरिका में न्यू यॉर्क के पास लॉन्ग आइलैंड, अरकंसास राज्य में मिसीसिपी नदी में और बाल्टिक सागर में फिनलैंड के पास, समेत कई जगहों पर ये पाई गई हैं.

क्या है सेतुसमुद्रम परियोजना: 2005 में भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम परियोजना का ऐलान किया. इसके तहत एडम्स ब्रिज के कुछ इलाके को गहरा कर समुद्री जहाजों के लायक बनाया जाएगा. इसके लिए कुछ चट्टानों को तोड़ना जरूरी है.

छोटा सफर: जहाजों को अभी केरल की तरफ से तमिलनाडु आना हो तो उन्हें श्री लंका का चक्कर काटना पड़ता है. इस परियोजना के बाद उनका 30 घंटे और 650 किलोमीटर का सफर बचेगा.

कौन-कौन हैं खिलाफ
पर्यावरणविद: मन्नार की खाड़ी जैविक रूप से भारत का सबसे समृद्ध तटीय इलाका है जहां पौधों और जानवरों की लगभग 3,600 प्रजातियां फल-फूल रही हैं. इस रास्ते के निर्माण से इन प्रजातियों के लिए खतरा पैदा हो जाएगा. मूंगे की चट्टानों के लिए भी खतरा पैदा होगा.

हिंदू कट्टरपंथी: हिंदू धर्मावलंबियों की मान्यता है कि यह ढांचा रामायण में वर्णित वह पुल है जिसे भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई के लिए बनाया था. विश्व हिंदू परिषद आदि संगठन इसी आस्था के कारण इस पुल से छेड़छाड़ का विरोध कर रहे हैं.

नासा की तस्वीर: नासा से मिली तस्वीर का हवाला देकर दावा किया जाता है कि अवशेष मानवनिर्मित पुल के हैं. नासा का कहना है, 'इमेज हमारी है लेकिन यह विश्लेषण हमने नहीं दिया. रिमोट इमेज से नहीं कहा जा सकता कि यह मानवनिर्मित पुल है.
अन्य स्थान लेख
वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
 
stack