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गांधी परिवार से अमेठी का हो रहा मोहभंग?

समीरात्मज मिश्र , Oct 10, 2017, 16:07 pm IST
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गांधी परिवार से अमेठी का हो रहा मोहभंग?

अमेठी: 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को बीजेपी उम्मीदवार स्मृति ईरानी से कड़ी चुनौती मिली. फिर इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में अमेठी की चार में से सभी विधानसभा सीटें हार गई.

इसके बाद ये सवाल उठना स्वाभाविक था कि शायद अब ये संसदीय क्षेत्र कांग्रेस या यूं कहें कि गांधी परिवार का 'गढ़' नहीं रहा.

लेकिन पिछले दिनों तीन दिवसीय दौरे पर राहुल गांधी जब अमेठी पहुंचे और वहां उनसे मिलकर अपनी समस्याएं बताने वालों की जो भीड़ थी और लोग जिस तरह से समाधान की आस लगाए उनके पास आते दिखे, उसे देखकर ये कह देना भी थोड़ी जल्दबाज़ी होगी कि इस इलाक़े के लोगों का इस परिवार से विश्वास कहीं से भी कम हो रहा है.

पिछले क़रीब तीन दशक से गांधी परिवार और अमेठी एक-दूसरे के पूरक से बन चुके हैं. 1980 में पहली बार इस संसदीय सीट से संजय गांधी ने जीत हासिल की तो ये सिलसिला अब तक जारी है.

संजय गांधी के बाद राजीव गांधी, फिर सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी इस सीट से लोकसभा में पहुंच रहे हैं.

गांधी परिवार का कोई व्यक्ति नहीं लड़ा तो उनके क़रीबी कैप्टन सतीश शर्मा ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया. 1998 को छोड़कर अब तक सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी ही यहां से चुनाव जीतती आई है.

1998 में बीजेपी से चुनाव जीतने वाले संजय सिंह भी आज कांग्रेस पार्टी के ही प्रमुख नेता हैं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से न सिर्फ़ राजनीतिक गलियारों में बल्कि अमेठी में भी ये चर्चाएं होने लगीं कि यहां अब गांधी परिवार की चमक कुछ धूमिल हो रही है.

अमेठी के वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र श्रीवास्तव कहते हैं कि इसकी शुरुआत तो 2012 के विधान सभा चुनावों से ही हो चुकी थी जब तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस पार्टी सिर्फ़ दो विधान सभा सीटें जीत सकी थी और उसके बाद तो एक जीते हुए विधायक ने पार्टी छोड़ दी.

जहां तक 2017 के विधान सभा चुनाव की बात है तो कांग्रेस पार्टी यहां की चार में से एक सीट भी नहीं जीत पाई थी.

फिर भी, राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं चाहे जो हों और चुनावी नतीजे कुछ भी कहें लेकिन अमेठी का आम मतदाता ये मानने को जल्दी तैयार नहीं होता कि गांधी परिवार की चमक फ़ीकी पड़ रही है.

इस सवाल पर सदर तहसील के रहने वाले मंसूर अहमद तो भड़क जाते हैं, "मैं कांग्रेस पार्टी का कोई सदस्य नहीं हूं लेकिन गांधी परिवार ने अमेठी के विकास के लिए जो कुछ भी किया है, उसे यहां के लोग नहीं भुला सकते."

ये बात कहने वाले मंसूर अहमद अकेले नहीं हैं. पूछने पर लोग उन तमाम चीज़ों की सूची सामने रख देते हैं जो कि गांधी परिवार के सदस्यों के समय में अमेठी के विकास का कारण बने हैं. कई युवा तो राहुल गांधी की तुलना स्मृति ईरानी और नरेंद्र मोदी से करने लगे और उनका निष्कर्ष था कि राहुल गांधी उनके लिए न सिर्फ़ स्थानीय हैं बल्कि मददगार भी हैं.

लेकिन अमेठी में अब ये कहने वालों की भी कमी नहीं है कि कांग्रेस पार्टी, ख़ासकर राहुल गांधी में वो बात नहीं है जो उनके पिता राजीव गांधी में थी.

जहां तक विकास कार्यों में गांधी परिवार के योगदान की बात है तो उसे अमेठी में भारतीय जनता पार्टी के ज़िलाध्यक्ष दयाशंकर पांडेय भी नहीं नकारते, लेकिन पूरी तरह स्वीकारते हों, ऐसा भी नहीं है.

दयाशंकर पांडेय कहते हैं, "अमेठी में विकास कार्यों की शुरुआत वरुण गांधी के पिता और मेनका गांधी के पति संजय गांधी ने की थी और राजीव गांधी ने उन कामों को आगे बढ़ाया. राहुल गांधी ने कुछ नहीं किया."

वहीं कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं का कहना है कि बीजेपी नेता इसी तरह की भ्रामक बातें करके लोगों को गुमराह कर रहे हैं.

कांग्रेस के अमेठी ज़िला अध्यक्ष योगेश मिश्र कहते हैं, "बीजेपी यहां भी सांप्रदायिकता का कार्ड खेलकर लोगों को बांटने की कोशिश कर रही है लेकिन वो सफल नहीं हो पाएगी. केंद्र सरकार एक ओर यूपीए सरकार की योजनाओं को लागू नहीं कर रही है और जो योजनाएं चल रही हैं, उनका श्रेय ख़ुद लेने की कोशिश कर रही है. लेकिन यहां की जनता को सब पता है कि किसने क्या किया है."

अमेठी के पास शुकुल बाज़ार विकास खंड के रहने वाले क़रीब अस्सी साल के एक बुज़ुर्ग राम नरेश संजय गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक के कार्यकाल को याद करते हैं लेकिन बेहद दुखी मन से कहते हैं कि राहुल गांधी आम जनता से उस तरह नहीं घुले-मिले हैं जैसे कि राजीव गांधी मिलते थे.

राम नरेश के मुताबिक, "अमेठी संसदीय क्षेत्र का कोई ऐसा घर नहीं होगा जहां राजीव गांधी न गए हों. सोनिया गांधी भी बराबर आती थीं और सबसे मिलती थीं. लेकिन राहुल गांधी मुंशीगंज गेस्ट हाउस से बाहर नहीं निकलते हैं और अमेठी वालों को इस बात से काफी तकलीफ़ भी है."

अमेठी में ऐसे कई नेता हैं और कई परिवार हैं जो कि सालों से कांग्रेस के प्रति निष्ठा जताते रहे हैं, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान ऐसे तमाम लोगों का कांग्रेस से मोहभंग हुआ और वो लोग भारतीय जनता पार्टी में या तो शामिल हो गए या फिर उसके समर्थक हो गए.

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