Saturday, 08 August 2020  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

नित्य मानस कथाः एहि बिधि सकल जीव जग रोगी, सोक हरष भय प्रीति बियोगी

नित्य मानस कथाः एहि बिधि सकल जीव जग रोगी, सोक हरष भय प्रीति बियोगी नई दिल्लीः पुलिस सेवा से जुड़े रहे प्रख्यात मानस मर्मज्ञ श्री राम वीर सिंह उत्तर कांड की सप्रसंग व्याख्या कर रहे हैं. राम वीर जी अपने नाम के ही अनुरुप राम कथा के मानद विद्वान हैं. फिलहाल यह चर्चा श्री राम जी के सतसंग से जुड़ी हुई है. संत और असंत है कौन? जीवन नैया से पार के उपाय हैं क्या? उन्हें पहचाने तो कैसे?

सद्गति के उपाय हैं क्या? मानस की इस चर्चा में एक समूचा काल खंड ही नहीं सृष्टि और सृजन का वह भाष भी जुड़ा है. जिससे हम आज भी अनु प्राणित होते हैं -भ्रातृ प्रेम, गुरू वंदन, सास- बहू का मान और अयोध्या का ऐश्वर्य, भक्ति-भाव, मोह और परम सत्ता का लीला रूप... सच तो यह है कि उत्तर कांड की 'भरत मिलाप' की कथा न केवल भ्रातृत्व प्रेम की अमर कथा है, बल्कि इसके आध्यात्मिक पहलू भी हैं.

ईश्वर किस रूप में हैं...साकार, निराकार, सगुण, निर्गुण...संत कौन भक्ति क्या अनेक पक्ष हैं इस तरह के तमाम प्रसंगों और जिज्ञासाओं के सभी पहलुओं की व्याख्या के साथ गोस्वामी तुलसीदास रचित राम चरित मानस के उत्तरकांड से संकलित कथाक्रम, उसकी व्याख्या के साथ जारी है.
******

*ॐ*        
*नित्य मानस चर्चा*    
*उत्तरकांड*

अगली पंक्तियाँ:-
"एहि बिधि सकल जीव जग रोगी।
सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।
मानसरोग कछुक मैं गाए।
हहिं सब के लखि बिरलेन्ह पाए।.
जाने ते छीजहिं कछु पापी।
नास न पावहिं जन-परतापी।।
विषय कुपथ्य पाप अंकुरे।
मुनिहु हृदय का नर बापुरे।।
रामकृपा नासहिं सब रोगा।
जौं एहि भॉंति बनै संजोगा।।
सदगुर बैद बचन विस्वासा।
संजम यह न विषय कै आसा।।
रघुपति भगति सजीवन मूरी।
अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।
एहि बिधि भलेहि सो रोग नसाहीं।
नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।।
जानिअ तब मन बिरुज गोसाईं।
जब उर बल बिराग अधिकाई।।
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई।
बिषय आस दुर्बलता गई।।
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई।
तब रह राम भगति उर छाई।।
*******
        भुशुण्डिजी कह रहे हैं कि संसार के सारे जीव मानसिक रोगों से ग्रसित हैं। मनुष्य, कीट पतंग,पशु ,पक्षी सब।  लेकिन विरला ही कोई पहचान पाता होगा,अन्यथा जीव को पता ही नहीं होता कि किस रोग के कारण वह बार बार ग़लत काम कर बैठता है। उसकी वृत्ति को कौन उकसा रहा है। शारीरिक रोग तो शरीर के साथ छूट जाऐंगे किंतु मानस रोग तो जीव से चिपके हुए हैं,जहॉं भी जिस योनि में जीव रहेगा,उसके साथ ही रहेंगे।

    (यह हमारे देश की आध्यात्मिक मनीषा का दृष्टिकोण है। आज के मनोविज्ञान का आयाम सीमित है। विश्व में लाखों प्रसिद्ध मनोविज्ञान पर आधारित पुस्तकें हैं। ऐसा नज़रिया कहीं भी नहीं है। इस सिद्धांत को समझने के लिए पहले पुनर्जन्म को मानना पड़ेगा। व्यक्ति में सही सही आत्मावलोकन की शक्ति पैदा करने की सामर्थ्य केवल सनातन वैदिक धर्म के पास है। जब व्यक्ति अपनी आंतरिक वृत्तियों का अवलोकन दृढ़ता से निष्पक्ष होकर करेगा तो संभव है कि समझ पड़े कि मुझे जो भौतिक उपलब्धि हुई है,उसमें मेरी इच्छा और यत्न का कारण कुछ और ही है। मेरी इतनी क्षमता नहीं थी। जिस परिवेश में जन्म मिला,जीवन में जैसे लोग मिले ,जो कार्यक्षेत्र मिला ,वह सब मेरे स्वयं के प्रयत्न से नहीं वल्कि मेरी जन्मजन्मांतर की पोषित वृत्ति के अनुरूप ही मिला है।मेरी पात्रता पहले ही आकलित की जा चुकी है। मैं कुछ मानसिक रोग साथ लाया हूँ। )
"जानै ते छीजहिं कछु....":-

     कह रहे हैं कि अगर कोई अपने मन की प्रवृत्ति को ठीक ठीक पहचान भी ले तो सावधानी रखते हुए स्वयं के पैदा किए दुखों से बच तो सकता है पर उस मानस रोग को समाप्त नहीं कर सकता। जैसे किसी बृक्ष को पूरा काट भी दिया जाय तो भी बरसात आदि का जल मिल जाने पर वह भूमि में दबी जड़ से पुन: अंकुरित हो जाता है। मानस रोग की कोई भी बाहरी औषधि नहीं है। उसकी एक मात्र दवा है कि जीव पथ्य-कुपथ्य का ध्यान रखे बस। सर्वदा पथ्य का ही सावधानी पूर्वक सेवन करते रहने से रोग रह तो सकता है पर असरकारक नहीं होगा। व्यापेगा नहीं।

    विषय रूपी कुपथ्य में फँस कर तो मुनि
जनों को भी रोग जकड़ लेता है विचारे मनुष्य की क्या बात। मुनि भी मनुष्य ही हैं और अहर्निश सावधान भी रहते हैं। जब उनके हृदय पर भी रोग असर करते हैं ,बार बार अंकुरित होते रहते हैं ,तो विषयरत जीव कैसे बच सकता है।
(नारद जी का प्रकरण उदाहरण है। जो सर्वदा "नारायण-नारायण" में डूबे रहते हैं,ऐसे मुनि नारद--
"देखि रूप मुनि विरति बिसारी।
 बड़ी बार लगि रहे निहारी।।")

     "अंकुरे" शब्द महत्वपूर्ण है। हृदय के थल की मिट्टी में रोग दबे पड़े हैं। अनुकूल जल ताप मिला तो अंकुरित होने लगते हैं।
अब बताते हैं कि इनका नाश कैसे संभव है। यहॉं महत्वपूर्ण यह है कि पहले ज्ञान मार्ग में संयोग बनने पर भी घुनाक्षर न्याय की बात की गई थी। अर्थात कि सब कुछ यत्न करने पर भी सिद्धि अनिश्चित है। कहा था ,"अस संजोग ईस जौ करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई"।

लेकिन यहॉं सिद्धि अनिश्चित नहीं है। कह रहे हैं  "राम कृपा नासहिं सब रोगा"। लेकिन "जौं"
यहॉं भी लगा दिया "जौं एहि भॉंति बनै संजोगा"
      कैसा संजोग बने यह स्पष्ट करते हैं।
कहते हैं " सदगुर बैद बचन विस्वासा।
             संजम यह न विषय कै आसा।।"
  जब सदगुरु रूपी वैद्य मिल जाय और साथ ही  किसी भी लौकिक वस्तु धन,पद,ऐश्वर्य या और कोई कामना न रखे,ऐसा परहेज़ करे--तब राम कृपा की सम्भावना होगी।

   आज के संदर्भ में सबसे ख़तरनाक शब्द है सदगुरु। शास्त्रों ने जिसे सदगुरु कहा है वह ब्रह्मनिष्ठ श्रोतिय होगा। वह किसी की भौतिक कामनापूर्ति की बात सुनेगा ही नहीं। उसका कोई आडम्बर भी नहीं होगा। इस गुरू शब्द की भ्रामकता ने ही आसाराम,रामपाल,रामरहीम पैदा कर दिए हैं। जो धन संपदा एकत्र करके अरबों रुपए की सम्पत्ति आश्रम के नाम पर बना रहा हो,वह कालाजादू करने वाला ढोंगी तो हो सकता है,गुरू नहीं हो सकता।( तुलसी,सूरदास के पास तो झोंपड़ी भी सलीक़े की नहीं थी )

      ग़लती उन ढोंगियों की भी नहीं है। लाखों भेड़ें मुँडने को खड़ी हैं। पैरों पड़ रही हैं कि गुरूजी कृपा बरसाएँगे तो हमारा फलॉं काम बन जाएगा। यह अध्यात्म है ? इन लाखों लोगों में एक भी आध्यात्मिक नहीं है। सब भौतिक कामनाएँ लिए भिखारी हैं। ये आध्यात्मिक उन्नति नहीं चाहते। संसार के गर्त में गिरना चाहते हैं। इनके लिए साधारण नर्क नहीं रौरव नर्क में सीट बुक हो चुकी है। परमात्मा का खेल यह है कि ऐसे मूर्ख अहंकारी दंभी लोगों को रामचरितमानस और रामकथा में स्वभावत: न तो आनन्द आता है,न उनकी कोई रुचि होती है। क्योंकि इन्हें न तो शास्त्र का ज्ञान है,न रुचि है इसलिए इन्हें दयानन्द सरस्वती का आर्य समाज सुहाता है। जानते उसे भी नहीं हैं। जब कुछ आता ही नहीं है तो आर्य समाजी बन गए।

    सदगुरू का मिलना जन्म जन्मांतर की साधना का परिणाम होता है। इस मामले में सिख पंथ ने रास्ता निकाला है कि ग्रंथ ही गरू है। गुरु ग्रंथ साहिब। (यह अलग बात है कि अकेले पंजाब में बीस हजार के लगभग गुरुओं के अलग अलग डेरे हैं। )
    अब एक शर्त बता रहे हैं कि व्यक्ति को सदगुरु द्वारा कही बात पर विश्वास होना चाहिए। " कवनेउ सिद्धि कि बिनु विस्वासा"।
विश्वास के बिना सिद्धि नहीं होती।
   मानस रोगों में परहेज़ यह है कि किसी सांसारिक चीज़ की,विषयों की कामना को एकदम छोड़ दिया जाय। मानसिक रोगों का कारण ही यह है कि विषयों में लिप्त रहते रहें और बस उन्हीं की कामना करते रहें। अगर विषयों की ओर झुकाव है तो चाहे जितना इलाज कर लो,रोग ठीक होने वाला नहीं है।

   (यहॉं कुछ स्पष्टीकरण आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति हल्दी से केंसर के इलाज की दवा बनाने की कोशिश में दिन रात लगा है या किसी नई इलेक्ट्रानिक पुर्ज़े को बनाने में दिन रात लगा है जो मानव जीवन को सरल बना सकता है,अथवा कि जिसने भी मोबाइल का आविष्कार किया यह सब भी बिषय की श्रेणी में माना जाएगा तो दुनियॉं में ठहराव आ जाएगा। यह सारे कृत्य परहित के हैं। इनमें पवित्रता है। विषय नहीं हैं। इन कर्मों को करते हुए भी परमात्मा का ध्यान साधा जा सकता है। लेकिन उसी मोबाइल या मशीनरी पुर्ज़े को दस गुना दाम पर बेच कर धन कमाने की नीयत से यदि कोई गुरू के पास या भगवान के मंदिर जाता है और हृदय में विश्वास भी साधे हुए है तो ऐसे अपवित्र व्यक्ति के लिए भक्ति नहीं है। इसको परमात्मा चौदह कोस या इक्कीस कोस नंगे पैर (परिक्रमा के नाम पर)घुमा कर दण्डित करता है। यह प्रायश्चित भी है। )

"रघुपति भगति सजीवन मूरी":-
       कहते हैं कि मानस रोग की दवा तो रघुपति भगवान रामजी की भक्ति रूपी संजीवनी बूटी है। संजीवनी अर्थात मृतप्राय को जिला देने वाली। यह भक्ति रूपी दवा श्रद्धा रूपी शहद(अनूपान) में मिलाकर ली जाती है।
इस बिधि से "भलेहि सो रोग नसाहीं" और कोई रास्ता नहीं है।
    
कह रहे हैं कि जब मन में वैराग्य का बल आने लगे और विषयों के प्रति अनासक्ति होने लगे तो समझिए कि मानस को स्वास्थ्य लाभ हो रहा है। जहॉं व्यक्ति के हृदय में विषयों के प्रति वैराग्य आया और परमात्मा के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ तो उस समय ज्ञान अपना प्रभाव दिखाता है और व्यक्ति में साधनभक्ति आने लगती है।
     
रोग दूर होता है तो रोगी के शरीर में बल भी बढ़ने लगता है और धीरे धीरे भूख भी बढ़ जाती है। रोगी ठीक हो जाता है तो उसे जल से नहलाते भी हैं। यहॉं जो रूपक बाँधा है उसमें बल तो वैराग्य है,सुमति भूख है ,निर्मल शुद्ध ज्ञान जल है। मानसरोग नष्ट होने पर बुद्धि दिन प्रति दिन निर्मल होती जाती है। परमात्मा के कथारसपान की भूख बढ़ती जाती है जिससे धीरे धीरे अंत:करण में भी रामरस छा जाता है।

       पहले रामभक्ति को"सजीवन मूरी" कहा था। उसी को "उर छाई" कहा है। अर्थात कि रामभक्ति साधन भी है और साध्य भी।
आज के प्रसंग में विमर्श के लिए बहुत अवकाश है। आदरणीय मानस रत्न जी का कृपा प्रसाद तो उनकी अति व्यस्तता के बाद भी नित्य मिलता ही ही। इस यज्ञ में सबसे आहुति देने के लिए आग्रह है।
  यथामति कुछ कह तो दिया है किंतु संक्षेप की चाहना में कुछ छूट भी गया है। विद्वज्जन कृपया पूर्ति करें।
आभार !
अन्य धर्म-अध्यात्म लेख
वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
 
stack