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नित्य मानस चर्चाः अथ रुद्राष्टकम्- कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी

नित्य मानस चर्चाः अथ रुद्राष्टकम्- कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी कानपुरः 'हरि अनंत हरि कथा अनंता' की तर्ज पर प्रभु चरित का कोई आदि, अंत नहीं... त्रेता, द्वापर, सतयुग, कलयुग के कालचक्र में अध्यात्म के अनगिन पाठ के बीच प्रभु के कितने रंग, रूप, कितने अवतार, कितनी माया, कैसी-कैसी लीलाएं, और उन सबकी कोटि-कोटि व्याख्या.

गोसाईं जी का श्री रामचरित मानस हो या व्यास जी का महाभारत, कौन, किससे, कितना समुन्नत? सबपर मनीषियों की अपनी-अपनी दृष्टि, अपनी-अपनी टीका...

इसीलिए संत, महात्मन, महापुरूष ही नहीं आमजन भी इन कथाओं को काल-कालांतर से बहुविध प्रकार से कहते-सुनते आ रहे हैं. सच तो यह है कि प्रभुपाद के मर्यादा पुरूषोत्तम अवताररूप; श्री रामचंद्र भगवान के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते. तभी तो प्रभु के लीला-चरित्र के वर्णन के लिए साक्षात भगवान शिव और मां भवानी को माध्यम बनना पड़ा.

राम चरित पर अनगिन टीका और भाष उपलब्ध हैं. एक से बढ़कर एक प्रकांड विद्वानों की उद्भट व्याख्या. इतनी विविधता के बीच जो श्रेष्ठ हो वह आप तक पहुंचे यह 'जनता जनार्दन' का प्रयास है. इस क्रम में मानस मर्मज्ञ श्री रामवीर सिंह जी की टीका लगातार आप तक पहुंच रही है.

हमारा सौभाग्य है कि इस पथ पर हमें प्रभु के एक और अनन्य भक्त तथा श्री राम कथा के पारखी पंडित श्री दिनेश्वर मिश्र जी का साथ भी मिल गया है. श्री मिश्र की मानस पर गहरी पकड़ है. श्री राम कथा के उद्भट विद्वान पंडित राम किंकर उपाध्याय जी उनके प्रेरणास्रोत रहे हैं. श्री मिश्र की महानता है कि उन्होंने हमारे विनम्र निवेदन पर 'जनता जनार्दन' के पाठकों के लिए श्री राम कथा के भाष के साथ ही अध्यात्मरूपी सागर से कुछ बूंदे छलकाने पर सहमति जताई है. श्री दिनेश्वर मिश्र के सतसंग के अंश रूप में प्रस्तुत है, आज की कथाः

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प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशम् ,
अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं,
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यं।।
उत्तरकांड, मानस, शिव-स्तुति, प्रतिपाद्य
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भुसुंडिजी के गुरुदेव भगवान शिव के गुणों की स्तुति करते हुए उक्त श्लोक में कहते हैं कि हे प्रचंड यानी रौद्रस्वरूप- शिव ! भक्त पर दया करो। गुरुदेव की यह प्रार्थना “शुक्ल-यजुर्वेद” के सोलहवें अध्याय (रुद्राष्टाध्यायी) में शिव की प्रार्थना के समतुल्य है, जिसका तीसरा श्लोक है--
“यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे। शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिसीः पुरुषं जगत।।”
अर्थात्- हे प्राणियों के रक्षक एवं पर्वत पर अवस्थित होने वाले रुद्र! तू अपने जिस बाण को प्रलय (शत्रुओं के विनाश) के निमित्त हाथ में लेता है, उसे जगत के कल्याण के लिए प्रयोग कर। वह मनुष्यों और पशुओं का अहित करने वाला न हो।

प्रचंड विद्वान् रावण द्वारा रचित “तांडव-स्तोत्र” में उनकी स्तुति करते हुए लिखा गया--
“अखर्वसर्वमंगलाकलाकदंबमंजरी, रस प्रवाहमाधुरीविजृम्भणामध्रुवतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकम् भवान्तकम् मखान्तकम्, गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे।।”

अर्थात् जो अभिमानरहित पार्वती की कलारूप कदम्बमंजरी के मकरन्दस्रोत की बढ़ती हुयी माधुरी के पान करने वाले मधुप हैं तथा कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्ष-यज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी अंत करने वाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ। इस श्लोक का उत्तरार्ध भगवान शिव के प्रचंड स्वरूप से ओतप्रोत है, जो संहारक है।

विद्वान् आचार्यश्री शर्माजी ने समीचीन अर्थ किया कि भगवान शिव का प्रचंड रूप लोक में अनुशासन, न्याय, धर्म, श्रुति-मार्ग-संरक्षण आदि स्थापित करने से ही सत्प्रेरित है। मानस में भगवान शिव का प्रचंड स्वरूप, तात्त्विक-अनुशासनार्थ तब प्रगट होता जब भगवती उमा उनसे प्रभु श्रीराम के निराकार व साकार स्वरूप में आशंका करती हुयी कहती हैं कि--
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
देखि चरित महिमा सुनत भ्रमित बुद्धि अति मोरि।।

अपने पूर्वजन्म के अपराध का फल पाने की स्मृति का वर्णन करते हुए, अत्यंत अनुनय विनय के साथ वे अपनी जिज्ञासा प्रगट करती हैं, जो शिव को प्रिय लगी, और भगवान राम की कथा प्रसन्नचित्त होकर सुनाते-सुनाते, उनके प्रभु के प्रेम ने प्रचंड रूप धारण कर लिया और ईश्वराग्रह-संश्लिष्ठ उन्होंने जैसी भाषा का
प्रयोग किया, वह अन्य किसी प्रसंग में नहीं मिलती, देखें-
एक बात नहिं मोहिं सोहानी। जदपि मोह बस कहिहु भवानी।।
तुम्ह जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।।
कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जो मोह पिसाच।
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच।।
अग्य अकोबिद अंध अभागी।काई विषय मुकुर मन लागी।।
लंपट कपटी कुटिल विसेषी।सपनेहुँ सन्त सभा नहिं देखी।।
कहहिं ते बेद असंमत बानी।जिन्हँ के सूझु लाभ नहिं हानी।।
मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना।राम रूप देखहिं किमि दीना।।
जिन्हँ के अगुन न सगुन बिबेका।जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।।
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं।तिन्हहिं कहत कछु अघटित नाहीं।।
बातुल भूत बिवस मतवारे।ते नहिं बोलहिं बचन सँभारे।।
जिन्ह कृत महामोह मद पाना।तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना।।

यह भगवान शिव का रौद्रस्वरूप है, जिसमें भी अपार करुणा समाहित है। प्रकृष्टं------इसका अर्थ है उत्कृष्टता, सर्वोत्तमता । यद्यपि “शिवश्च हृदयेविष्णुः विष्णुश्च हृदये शिवः”यह तात्त्विक- ध्रुव-सत्य है, किन्तु देवताओं की दृष्टि से देखें तो शिव “देवाधिदेव-महादेव” हैं. विष्णु “उपेन्द्र” यानी इन्द्र के लघु-भ्राता हैं। विष्णु देवताओं के संरक्षक हैं। वे देवताओं का पक्ष लेते हैं किन्तु शिव का मत उनसे भिन्न है। देवताओं और दैत्यों में वे समान रूप से लोकप्रिय हैं।

दैत्य, मात्र शिव की ही पूजा करते हैं। इसलिए शिव-भक्तों की संख्या बड़ी विशाल है। गोस्वामीजी इसी को दृष्टिगत रखकर मानस में शिव की प्रशंसा करते हैं--
असुर नाग सुर नर मुनि देवा।
सकल करहिं पद पंकज सेवा।।

देवत्त्व की उपलब्धि, पुण्य का परिणाम है, देवता मर्यादा समर्थक हैँ, ऐसा सोचकर विष्णु, देवताओं का समर्थन करते हैं, ताकि सत्कर्म के प्रति लोगों की आस्था बनी रहे। भगवान देवाधिदेव शंकर, भगवान विष्णु के इस मत से सहमत नहीं हैं। उन्हें देवता और दैत्यों में बहुत अंतर प्रतीत नहीं होता। उनकी दृष्टि में देवता और दैत्य
दोनों भोग में आसक्त हैं। देवता सत्कर्म के माध्यम से भोग प्राप्त करना चाहता है, किन्तु दैत्य उसे प्राप्त करने के लिए पाप और पुण्य दोनों का आश्रय लेते हैँ। पर यह विभाजन भी केवल शाब्दिक और बहिरंग मात्र है। देवता भी स्वार्थ-सिद्धि के लिए,कभी असद् मार्ग का आश्रय न लेते हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

पुराणों के सैकड़ों उपाख्यान इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं। इसलिए देवता और दैत्य, जो भी शिव के निकट आता है, वे समान रूप से उनकी आकांक्षा पूर्ण करते हैं। कभी वे देवताओं की प्रार्थना स्वीकार स्वयं भी असुरों का संहार करते हैं, तो कभी अपने आश्रित असुर का पक्ष लेकर अपने परम मित्र विष्णु को चुनौती देने से नहीं घबराते। इनके आश्रित असुर इतने से ही संतुष्ट हो जाते हैं।

यही भगवान शिव का उत्कृष्ट स्वरूप है। इसके अतिरिक्त “दानी कहूँ संकर सम नाहीं।” वाला उनका महादानी का रूप भी उन्हें प्रकृष्टता प्रदान करता है। भक्त दिवोदास को काशी ही दे दिया और दुखी रहने लगे। देवताओं के अथक परिश्रम से उन्हें काशी-निवास मिला। भष्मासुर को अपना संहार का पोर्टफोलियो ही सौंप दिया, जो अद्वितीय दान था, जिससे उन्हें बचाने के लिए भगवान विष्णु को अथक प्रयास करना पड़ा।
प्रगल्भं
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प्रगल्भता का अर्थ है तेजस्विता, प्रत्युत्पन्नमतित्व, विलक्षणता आदि। रावण के अत्याचार से संत्रस्त, पृथ्वी, मुनि, देवताओं को ब्रह्मा से यह ज्ञात हुआ कि ईश्वर ही इस समस्या का समाधान दे सकता है। पर ईश्वर है कहाँ? ईश्वर को सगुण साकार मानने वाले, विभिन्न लोकों में उनकी उपस्थिति का वर्णन करने लगे--
बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कँह पाइय प्रभु करिअ पुकारा।।
पुर बैकुंठ जान कहँ कोई। कोइ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।

भगवान शंकर की प्रगल्भता यहाँ प्रकट होती है। वे कहते हैं ईश्वर सर्वब्यापक है, यही सत्य है। किन्तु उसकी सर्वब्यापकता के ज्ञान से ही, समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। सर्वब्यापक यदि स्वयं सक्रिय होता, तो क्या उसमें रावण रूपी बुराई को विनष्ट करने का संकल्प उत्पन्न नहीं होता? अतः उसमें इच्छा प्रकट करने की
आवश्यकता है। निराकार को प्रेम और प्रार्थना के माध्यम से सगुण-साकार रूप में प्रकट करना होगा। उसमें ममत्व और राग की सृष्टि करनी होगी, जिससे वह हमारी समस्याओं को देखकर द्रवित हो जाय। उसमें दुखी जीव को कष्ट से मुक्त करने की करुणा उत्पन्न करनी होगी।

वे कह उठते हैं--
हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।
देस काल दिसि विदिसहुँ माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।।
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।।
मोर बचन सबके मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।।

यही भगवान शिव का प्रत्युपन्नमतित्व है, प्रगल्भता है। भगवान राम के विवाहावसर पर, ब्रह्माजी को लगा कि जनकपुर में कहीं कोई ऐसी वस्तु दिखाई नहीं देती, जिसे कहा जाय कि मैंने बनायी है--

बिधिहि भयउ आचरज विसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी।।

देवाधिदेव प्रगल्भ शिव मुस्कुराते हुए देवताओं के पास आए। सीधे ब्रह्माजी से कहा कि आप किस सोच में हैं? ब्रह्मा की ओर संकेत करते हुए, सभी चकित देवताओं से बोले--
सिव समझाये देव सब,जनि आचरज भुलाहु।
हृदय बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु।।

ब्रह्माजी से उनका ब्यंग्य था कि महोदय! यह मत ढूँढ़िए कि “मैनै क्या बनाया है, बल्कि यहाँ तो यह पता लगाइए कि मुझको किसने बनाया है?”

परेशं अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं------- ईश्वरानाम् ईश्वरः इति परमेश्वरः। यह देवाधिदेव का ही पर्याय है, जो हम लोग निरंतर उनके सद्गुणाकार-श्रीविग्रह में देख रहे हैं। जगदातमा महेस पुरारी।। की पंक्ति भगवान शिव की अखंडता का ही बोध कराती है।

एकं ब्रहममाद्वितीयं समस्तं, सत्यं सत्यं नेहनानास्तिकिंचित्।
एको रुद्रो नद्वितीयोववस्थो, तस्मादेकं त्वम् प्रपद्ये महेशम्।।

शिव पुराण का यह श्लोक ”अभिलाषाष्टकं” के रूप में जाना जाता है। इसी श्लोक के आगे के श्लोकों में स्तुति करते हुए कहा गया कि--
नो ते गोत्रं नेष जन्मापिआख्या, नो वा रूपं नैव शीलं न देशः।
इत्थं भूतोपीश्वरस्यं त्रिलोक्याः,सर्वान् कामान् पूरयेस्तद् भजे त्वाम्।।

अर्थात् जिसके कहीं कोई गोत्र का उल्लेख नहीं मिलता, जन्म व माता पिता का कोई वर्णन नहीं उपलब्ध है, जिसका रूप, शील, देश अज्ञात है, ऐसे सभी प्राणियों में स्थित त्रिलोकेश्वर भोलेनाथ की सभी इच्छाओं की पूर्ति हैतु, उनका भजन करता हूँ। यह उनके “अजं”स्वरूप का विस्तार है। करोणों कामदेवों से भी सुन्दर शिव करोणों सूर्यों के समान प्रकाशमान हों, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

त्रयः शूल निर्मूलनं शूल पाणिं--------------- आ.मानसरत्नजी ने सत्य-बोध कराया कि भगवान शिव संहारक और संरक्षक दोनों हैं। भुसुंडि के गुरुदेव, उनके क्रुद्ध संहारक स्वरूप को उनका संरक्षक बनाने के लिए, द्वादश-ज्योतिर्लिंग में से एक “बैद्यनाथं” स्वरूप का आवाहन करते हुए, “तीनों ताप हरण कर लेता है, तिरशूल तुम्हारा।”को अपनी स्तुति में समाहित करते हुए यह विशेषण प्रकट करते हैं।

त्रिशूल से शत्रुओं का संहार करने वाले भगवान शिव, उसी से हमारे आन्तरिक शत्रुवत् दैहिक, दैविक, भौतिक तापों का भी संहार करते हैं। शुक्ल-यजुर्वैद में उनकी स्तुति करते हुए लिखा गया है--
“अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैब्यो भिषक्।
अहीश्च सर्वान्जम्भयन्त्सर्वाश्च
यातुधान्यो$धराचीः परा सुव।”

अर्थात्-सब देवताओं में प्रथम पूज्य, उपदेश देने वाला(वक्ता), देवताओं का हितकारी एवं चिकित्सक की भाँति स्मरण मात्र से ही रोगों का निवारण करने वाला रुद्र,हमारे कार्यों का अधिकता से वर्णन करे। वह विषैले सर्पादि
एवं क्रूर प्राणियों को नष्ट करे। राक्षसों और राक्षसी बृत्तियों वालों को हमसे दूर करे।

भवानीपतिं-----------“भवम् भवानी सहितं नमामि” के रूप में शक्ति व शिव की संयुक्त आराधना ही
परम हितकारी है। क्यों? विना शक्तिमान के शक्ति अपनी चरम स्थिति में विध्वंशकारी बन जाती है, अतः
नियंत्रक शक्तिमान अपरिहार्य है। और शक्ति रूपी ‘इकार’ की अनुपस्थिति में “शिव” भी “शव” हो जाता है, निष्प्रयोज्य हो जाता है। ब्याख्या-विस्तार अभी संभव नहीं है। इसलिए गुरुदेव शिष्य कल्याणार्थ उन्हें
भवानी-पतिं कहकर उनका आवाहन करते हैं।

भावगम्यं -----------वस्तुतः ईश्वर कैसा है, यह वाणी का विषय नहीं है। पर ब्यक्ति को जैसे ईश्वर की
आवश्यकता होती है, वह वैसे ही गुण आरोपित कर लेता है और उसकी भावना के अनुसार, उसके समक्ष, ईश्वर,स् वयं को उसी रूप में प्रकट कर देता है--
जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन्ह तैसी।।
जे जेहि भाँय रहा अभिलाषी। तेहि-तेहि के तसि तसि रुख राखी।।

“राम भूखे भाव” के”या प्रभु भाव ग्राहक” भगवान राम की तरह ही भगवान शिव भी भाव यानी प्रेम के ही भूखे हैं। इसलिए भगवान राम, परब्रह्म को साकार-ब्रह्म बनाने के लिए उन्होंने देवताओं को प्रेम का ही मार्ग बताया था। ऐसे सर्वसद्गुणभंडार भगवान शिव ,सभी जनों का सदा परम कल्याण करें।

जय शिव।
नमन सबहिं।विलम्ब हेतु क्षमहु सबहिं।
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कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी,
सदा सज्जनानंददाता पुरारी।
चिदानंदसंदोह मोहापहारी,
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।
उत्तरकांड, मानस, शिव-स्तुति, अगम,वरेण्य।
*****

कलातीत.....

चैतन्यं शाश्वतं शान्तं, ब्योमातीतं निरंजनं।
विन्दु-नाद कलातीतं, तस्मै श्री गरवे नमः।।

भगवान शिव को गोस्वामीजी ने “सकल कला गुण धाम”कहा है। यहाँ उन्हें “कलातीत” कहा गया। सगुण-साकार रूप में शिव ‘सकल कला गुणधाम हैं, तो निर्गुण निराकार रूप में वे कलातीत हैं। सभी गुणों से युक्त ईश्वर ही निर्गुण है, उसी प्रकार सभी कलाओं से युक्त शिव कलातीत हैं।

कृष्णभक्तों द्वारा बहुधा श्रीमद्भागवत् की एक पंक्ति मे यह कहा गया है कि अन्य अवतार जहाँ अंश-कला के रूप में हैं, श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान हैं--

“एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान स्वयम्।”

कहा जाता है कि, श्रीकृष्ण षोडष कला के अवतार हैं, इसलिए पूर्ण हैं और राम में द्वादश कलायें हैं। हमारे समूह-निर्दैष्टा, मानस-प्राण श्री रामबीर सिंह की तरह अन्य सभी रामभक्तों को यह मान्यता स्वीकार नहीं है। उनका विश्वास है--

“रामस्तु भगवान् स्वयम्।” षोडष और बारह कला के विवाद पर समाधान यह कहकर दिया जाता है कि, श्रीकृष्ण,चंद्रवंश से संबंधित हैं। चन्द्रमा में सोलह कलायें होती हैं, जबकि श्रीराम, सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हैं, तथा सूर्यनारायण की पूजा “द्वादशादित्य”के रूप में की जाती है। इसी कारण भगवान राम को बारह कला की उपाधि दी गयी है। निराकार ब्रह्म के संबंध में कला के आधार पर विवाद संभावित होता है,अतः भगवान शिव की स्तुति कलातीत के रूप में सूग्राह्य है।

भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र में उन्मुक्त-लीला-बिलास, से समाज में भयावह स्थिति उत्पन्न  होने के कारण, भगवान श्रीराम और भगवान शिव के मर्यादा-पूर्ण आदर्श-चरित्र का अनुपालन ही यथेष्ट है। भगवान कृष्ण के चरित्र का आनंद-उन्मेष, बड़े बड़े ज्ञानियों की समझ के परे होने के कारण, उसका समादर करते हुए भी
जनहित में प्रभु राम और प्रभु शिव का आदर्श अनुकरणीय होना चाहिए।

कल्याण कल्पान्तकारी----------कल्याण तो भगवान के ‘शिव’नाम का ही अर्थ है।यहाँ भुसुंडिजी के गुरुदेव की क्रुद्ध रुद्र-रूपी भगवान शंकर के इस पावन प्रसिद्ध नाम से सोद्देश्य स्तुति स्वतः स्पष्ट है। उनके दंड में भी ब्यक्ति का कल्याण ही सन्निहित है।

कामजारि रति कहँ वर दीन्हाँ।
बड़ उपकार कृपानिधि कीन्हाँ।।

“जातस्यहिध्रुवोर्मृत्युं,ध्रुवं जन्ममृतस्य च।।  के अनुसार कल्प का सृजन हुआ तो उसका अन्त भी अवश्यंभावी है और फिर सृजन। ”एको$हं बहुष्यामि” की अधिघोषणा के बाद अवतारवाद की- “संभवामि युगे-युगे” संबंधी अवधारणा तो तभी सार्थक होगी, जब कल्पांत/ कल्प सृजन क्रमिक रूप में साकार होगा। इसी कारण कल्याण के साथ कल्पान्तकारी शब्द का प्रयोग गुरुदेव ने किया कि आप कल्याण से हितबद्ध कल्पान्तकारी हैं। अतः कल्पान्त से पूर्व ही अपने क्रोध का शमन कर शिष्य पर कृपा करिए। उसका कल्याण करिए।

सदा सज्जनानंद दाता----------भगवान शिव, मानस में कहते हैं- उमा कहुउँ मैं अनुभव अपना। सत् हरि भजन जगत सब सपना।। ऐसे ही सत्+जन=सज्जन के शिव सदैव आनंददाता हैं।

हरष हेतु हेरि हरि ही को। किय लोचन तियभूषन ती को।।

जैसे ही पार्वतीजी ने शिव के परम सत्य “रामनाम” पर आस्था जताते हुए ‘विष्णुसहस्रनाम’ के स्थान पर धारण किया, शिव ने उन्हें अपने अंग में समाहित कर लिया। धन्य हैं अर्द्धनारीश्वर-शिव। देवर्षि नारद को सत् का ज्ञानोपदेश दिया, किन्तु उन्होंने पालन नहीं किया, तो उनकी दुर्दशा हो गयी। उन्होंने भगवान नारायण से अपराध-मुक्ति का उपाय पूछा तो उन्हें कहा गया-

जपहु जाइ संकर सतनामा।।

प्राण-प्रिया सती को भी सच्चिदानंद प्रभु के विषय में शिव ने समझाने का प्रयास किया, किन्तु उन्हें समझ में नहीं आया।उनको भी जब शिव-दर्शन की अनुभूति हुयी तो--

मरत सती हरि सन् वर माँगा। जनम जनम सिव पद अनुरागा।।

गरुणजी के मोह की विशद चर्चा हम लोगों ने की। वे नारायण-पार्षद, परम-ज्ञानी होने के बाद भी हरिमाया के प्रभाव में मोहाच्छन्न हो गये। भगवान शिव ने उन्हें भी--

जब बहु काल करिय सतसंगा। तबहिं मोह दुख दारिद भंगा।।

का सद्ज्ञान देकर भुसुंडिजी के पास भेजा और उन्हें आनंद की प्राप्ति हुई। पूरी सृष्टि के संरक्षण के लिए उनका गरल पान तथा भागीरथी की लोक-प्राप्ति हेतु अनेक ऐसे कार्य हैं, जिनसे उन्हें सज्जनानंद दाता कहना, उनके गुणानुकूल है। ऐसे शिव, भुसुंडि के साथ कल्पान्त के पूर्व सभी जीवों का कल्याण करें, गुरुदेव की यही प्रार्थना इस शब्दावाहन में समाहित है।

पुरारी-------पुराणों में त्रिपुरासुर का जो उपाख्यान आता है, उनमें यह बताया गया है कि इस दैत्य ने तपस्या के द्वारा अंतरिक्ष में “त्रिपुर”की याचना की। स्वर्ण, चाँदी और लौह के द्वारा निर्मित यह तीनों पुर अंतरिक्ष में परस्पर बिरोधी दिशाओं में चक्कर काटते रहते थे और वह इन तीनों पुरियों में बिहार करता था। अपनी मृत्यु के विषय में उसने यह वरदान माँग लिया था कि उसकी मृत्यु तभी हो, जब एक बाण से एक साथ तीनों अन्तरिक्ष पुर विनष्ट हो जाँय। उसकी यह धारणा थी कि यह सर्वथा असंभव है, इसलिए वह अमर बनकर अंतरिक्ष में बिहार करता रहेगा। किन्तु भगवान शिव ने इस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया और एक ही बाण से त्रिपुरासुर को विनष्ट कर दिया।

गुरुदेव, शिव को पुरारी कहकर, उनसे अपना क्रोध शान्त कर, भुसुंडि के कल्याण की प्रार्थना समर्पित कर रहे हैं कि आप तो असंभव को भी संभव कर देने वाले भोलेनाथ हैं।

चिदानंदसंदोह मोहापहारी-------------श्रीमद्भागवत् के प्रथम श्लोक में प्रभु के स्वरूप के विषय में लिखा गया-

सच्चिदानंदरूपाय, विश्वोत्पत्याय हेतवे।
ताप त्रय विनाशाय, श्रीकृष्णाय वयं नमः।।

मानस में प्रभु का स्वरूप-चिदानंदमय देह तुम्हारी।। वही अर्थ है-”चिदानंद संदोह”का भी। सत्+ चित्+ आनंद सत्य, चैतन्य और आनंद-स्वरूप। प्रभु शिव को प्रसन्न कहा गया, इसी स्वरूप-स्मृति के बोधजन्य अनुभूति से। यह स्वरूप मोहापहारी होने के विषय में भाव, मानस से ग्रहण करें--

“ राम सच्चिदानंद दिनेसा।
नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा।।
सहज प्रकासरूप भगवाना।
नहिं तहँ पुनि विग्यान बिहाना।।”

ब्रह्म का सच्चिदानंद स्वरूप सूर्य की भाँति है। वहाँ मोह रूपी रात्रि का लवलेश भी नहीं है। अतः उसका ध्यान, भक्ति, कथा-श्रवण, ज्ञान से ही मोह का सम्पूर्ण विनाश संभव है।यद्यपि अवतार के बाद प्रभु में भी हर्ष, विषाद, रोष आदि के भाव दिखाई देते हैं, किन्तु यह सब ब्यक्ति की दृष्टि की प्रतीति मात्र है।

भगवान शिव, रामकथा रूपी गंगा को सिर पर रखते हैं अतः आ.गुरुदेव के कथनानुसार महामोह रूपी महिषासुर को कालिका रूपी रामकथा विनष्ट करती है। यही है मोहापहारी का भाव-वैशिष्ट्य, जिसका उल्लेख गुरुदेव भगवान शिव से करके मोह-युक्त शिष्य को क्षमा करने की स्तुति करते हैं।

प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ----------मन एव मनुष्याणाम् कारणं बंध-मोक्षयोः।

मन से बड़ा कोई शत्रु नहीं, मन से बड़ा कोई मित्र नहीं। जब मायावी पुत्र मन, मंथन करके हमें सांसारिक विषय भोगों का विषयासक्त बनाता है, तब वह मन्मथ, कामदेव, मनोभव, मनसिज आदि की संज्ञा से विभूषित होता है। अब जब वह भगवान शिव को वहिर्मुखी बनाने का प्रयास करता है, तो भगवान उसे जलाकर भस्म कर देते हैं। और काम से राम की ओर इसे परिवर्तित कर बंधन को मोक्ष में परिणत कर देते हैं।

इसी भाव की प्राप्ति के लिए “रुद्राष्टाध्यायी(शुक्ल यजुर्वेद)में रुद्र का आवाहन करते हुए पहले ही अध्याय में उच्चारित किया जाता है--

“तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।”


इसी कारण गुरुदेव श्लोकान्त में भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि हे मन्मथारी! शिष्य के मन को शिव-संकल्पित बनावें।

आज बस यहीं तक--नमन सबहिं।
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