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अयोध्‍या केस: शिया वक्‍फ बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, बाबरी मस्जिद स्थल को बताया अपनी संपत्ति

जनता जनार्दन डेस्क , Aug 09, 2017, 13:46 pm IST
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अयोध्‍या केस: शिया वक्‍फ बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, बाबरी मस्जिद स्थल को बताया अपनी संपत्ति नई दिल्‍ली: राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के समाधान की पेशकश करते हुए उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय से मंगलवार को कहा कि अयोध्या में विवादित स्थल से 'समुचित दूरी' पर मुस्लिम बहुल इलाके में एक मस्जिद का निर्माण किया जा सकता है.

इस दलील के साथ शिया बोर्ड पहला मुस्लिम संगठन बन गया है जो अयोध्या मुद्दे पर विभिन्न हिंदू निकायों की मांग के समर्थन में आ गया है. हिंदू निकायों ने विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण की अनुमति देने की मांग करने के दौरान सुझाव दिया था कि इस इलाके से कुछ दूरी पर एक मस्जिद का निर्माण किया जा सकता है.

उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सैयद वसीम रिजवी द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया कि बाबरी मस्जिद स्थल उसकी संपत्ति है और सिर्फ उसे विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिये बातचीत करने का हक है. उसने सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावे पर आपत्ति जताई.

स्थल से समुचित दूरी पर मस्जिद के निर्माण का समर्थन करते हुए उसने कहा, 'इबादत स्थलों यानि मस्जिद और मंदिर की नजदीकी से बचा जाना चाहिये क्योंकि दोनों मजहबों के लोग लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करेंगे जिससे एक-दूसरे के धार्मिक क्रियाकलापों में विघ्न पैदा होगा जिससे अक्सर टकराव होगा और दोनों वर्गों के बीच शत्रुता पैदा होगी.'

शिया बोर्ड ने कहा, 'उत्तरदाता प्रतिवादी (शिया बोर्ड) की यह भी राय है कि अंतिम फैसला लाने के लिये मस्जिद को मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की सर्वाधिक श्रद्धापूर्ण जन्मस्थली से तर्कसंगत दूरी पर मुस्लिम बहुल क्षेत्र में मस्जिद बनाई जा सकती है.' इस हलफनामे का महत्व है क्योंकि इसे भूमि विवाद मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों पर शीर्ष अदालत के तेजी से सुनवाई करने पर सहमत होने के कुछ ही दिनों के भीतर दायर किया गया है.

शिया बोर्ड ने अपने 30 पन्नों के हलफनामे में कहा कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड सुन्नी कट्टरपंथियों, धर्मांधों और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में आस्था नहीं रखने वालों के नियंत्रण में है, जिनकी मौजूदा मामले में बिल्कुल भी हिस्सेदारी नहीं है.

सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के रुख पर चोट करते हुए उसने कहा, 'चूंकि बाबरी मस्जिद शिया वक्फ बोर्ड की संपत्ति थी, इसलिये सिर्फ उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड को बातचीत करने और शेष अन्य हितधारकों के साथ शांतिपूर्ण समाधान पर पहुंचने का हक है.' शिया निकाय ने विवादित मुद्दे के सौहार्दपूर्ण समाधान को तलाशने के लिये एक समिति का गठन करने की भी मांग की है.

उसने उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री या उनके द्वारा नामित कोई व्यक्ति और प्रधानमंत्री कार्यालय से मनोनीत किसी व्यक्ति को मिलाकर एक समिति गठित करने की मांग की. उसने कहा कि शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड का नामित व्यक्ति और निर्मोही अखाड़ा और हिंदू संप्रदाय का एक-एक प्रतिनिधि समिति के समक्ष सौहार्दपूर्ण समाधान के लिये सुझाव और प्रस्ताव देगा.

शिया बोर्ड शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित अपीलों में से एक पक्षकार है. उसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले का उल्लेख किया और कहा कि यह कहा गया है कि 'मुस्लिमों' को विवादित क्षेत्र का एक तिहाई से कम हिस्सा नहीं मिलना चाहिए. उसने कहा, 'मुस्लिम से उच्च न्यायालय का आशय 'शियाओं' से था क्योंकि उच्च न्यायालय ने सुन्नी बोर्ड के इस दावे को खारिज कर दिया था कि बाबरी मस्जिद सुन्नी वक्फ था.

उच्च न्यायालय ने कहा कि बाबरी मस्जिद एक वक्फ है. उसने सुन्नी बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया कि यह सुन्नी वक्फ था जिसका दावा मुस्लिम वक्फ अधिनियम, 1936 के तहत मुख्य वक्फ आयुक्त की 16 फरवरी 1944 की अधिसूचना के आधार पर किया गया था. हाल में प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर ने न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर की पीठ का गठन 11 अगस्त से अयोध्या भूमि विवाद मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिये किया था.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के 2010 के फैसले के खिलाफ ये अपील दायर की गयी हैं. उच्च न्यायालय ने अयोध्या में राम जन्म भमि-बाबरी मस्जिद स्थल की विवादित 2.77 एकड़ भूमि को तीन समान हिस्सों में विभक्त करने और उसे सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला को सौंपने का निर्देश दिया था.
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