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कनकधारा स्तोत्र के दैनिक पाठ से दूर होती है गरीबी, मां लक्ष्‍मी का है वरदान

कनकधारा स्तोत्र के दैनिक पाठ से दूर होती है गरीबी, मां लक्ष्‍मी का है वरदान नई दिल्लीः कनकधारा स्तोत्र को स्वर्णधारा स्तोत्र के नाम से भी जाना जाता है। इस स्तोत्र का फल चमत्कारी व शीघ्र फल देने वाला है। जितने भी महालक्ष्मी प्राप्‍ति के मंत्र हैं उन में कनकधारा स्तोत्र प्रमुख स्थान रखता है। यह स्तोत्र धन व दरिद्रता सम्बंधी जितने भी दोष हैं उन सबका शमन करने में अत्यधिक सक्षम है। इस स्तोत्र की महिमा के विषय में कहा जाता है कि ये स्वर्ण वर्षा करवाने वाला अदभुत स्तोत्र है।

आदि गुरु शंकराचार्य ने कनकधारा स्तोत्र द्वारा एक गरीब के घर में धन वर्षा करवाई थी। इस विषय में एक कथा प्रसिद्ध है कि एक बार जगदगुरु शंकराचार्य भिक्षा के लिये एक दरिद्र के घर पहुंचे, उस घर में एक वृद्ध स्त्री रहती थी, वृद्धा ने भिक्षा के लिये आये शंकराचार्य को एक सूखा आंवला दिया और बडे ही करुण स्वर में बोली बेटा मेरे काफी ढूंढने पर भी मुझे सिर्फ यह सूखा आंवला ही मिला इसे ग्रहण करो।

शंकराचार्य ने उस वृद्ध स्त्री की स्थिति देखी तो रो उठे उन्होंंने तत्काल माता महालक्ष्मी का आवाह्न किया आवाह्न करने पर माता महालक्ष्मी प्रकट हुई और कहा शंकर में इसकी दरिद्रता दूर नहींं कर सकती। इसके भाग्य में धन नही है, इसके कर्म ही इसकी दरिद्रता का कारण हैं, यह कहकर महालक्ष्मी अंतर्ध्‍यान हो गईंं। लेकिन शंकराचार्य उस वृद्धा की दरिद्रता दूर करने के लिये संकल्पबद्ध थे। उन्होने तुरंत विह्ल भाव से कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना आरम्भ कर दिया।

18 श्लोक के इस स्तोत्र का पाठ करते-करते शंकराचार्य जी के अश्रु किसी झरने की तरह बहने लगे। जैसे ही स्तोत्र का खत्म हुआ तुरंत वहां स्वर्ण की वर्षा होने लगी। तब माता महालक्ष्मी पुन: प्रकट हुईंं और बोली शंकर तुमने इस स्तोत्र का निमार्ण कर जगत का कल्याण किया है। इस कनकधारा स्तोत्र का जो भी भक्ति भाव से पाठ करेगा उसके कुल में धन का अभाव कभी नही होगा।

*कनकधारा स्तोत्र*

अंगं हरे: पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अंगीकृताखिल-विभूतिरपांगलीला मांगल्यदाऽस्तु मम मंगलदेवताया: ।।1।।

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
मालादृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवाया: ।।2।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदान- दक्षमानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध- मिन्दीवरोदर सहोदरमिन्दिराया: ।।3।।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द-
मानन्दकन्दमनिमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनाया: ।।4।।

बाह्वन्तरे मुरजित: श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयाया: ।।5।।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारे- र्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव ।
मातु: समस्तजगतां महनीय मूर्ति-
र्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया: ।।6।।

प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावा-
न्मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया: ।।7।।

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा-मस्मिन्नकिंचन-विहंगशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह: ।।8।।

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टि: प्रहृष्टमकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया: ।।9।।

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैक-गुरोस्तरुण्यै ।।10।।

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ।।11।।

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ।।12।।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ।।13।।

यत्कटाक्षसमुपासनाविधि:
सेवकस्य सकलार्थसम्पद: ।
सन्तनोति वचनांगमानसै-
स्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ।।14।।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।।15।।

दिग्घस्तिभि: कनककुम्भमुखाव सृष्ट-
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुतांगीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेषश- लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ।।16।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरंगितैरपांगै: ।
अवलोकय मामकिंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया: ।।17।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतर-भाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशया: ।।18।।

।। हरिः ॐ तत्सच्छ्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकनकधारास्तोत्रम् हरिः ॐ तत्सत्।।
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