अक्षर ज्ञान अभियान को लगे पंख: गर्मी की छुट्टियों में आयोजित हुआ समर कैंप

जनता जनार्दन संवाददाता , Jun 01, 2017, 20:40 pm IST
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अक्षर ज्ञान अभियान को लगे पंख: गर्मी की छुट्टियों में आयोजित हुआ समर कैंप नई दिल्ली: अक्षर ज्ञान अभियान देश की राजधानी दिल्ली में सरकारी स्कूल के कुछ प्रतिबद्ध अध्यापकों का एक अनूठा प्रयास है जिसके तहत समाज के सबसे गरीब वर्ग के बच्चों को स्कूल से जोड़ा जा रहा है।

यूं तो इस वर्ष सीबीएसई बारहवीं परीक्षा के परिणाम ने पूरे देश का ध्यान देश की राजधानी दिल्ली के सरकारी स्कूलों के शानदार प्रदर्शन की ओर खींचा है पर फिलहाल हम आपका ध्यान दसवीं और बारहवीं यानि माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक नहीं अपितु प्राथमिक स्कूलों की ओर खींचना चाहते हैं जिसकी स्थिति दयनीय बनी हुई है। 

दिल्ली के सरकारी प्राथमिक स्कूल मुख्य रूप से दिल्ली नगर निगम के तीनों बंटे हुए धड़ों के द्वारा संचालित हो रहे हैं । पर सभी स्कूलों में लगभग एक जैसी स्थिति हैं जहां प्रत्येक वर्ष दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या कम हो रही है। 

दाखिला कम होने और छात्रों की संख्या कम होने के अनेक कारण हो सकते हैं पर इन कारणों का विश्लेषण नहीं अपितु इन विद्यालयों में छात्रों के दाखिले के लिये एक अनूठे अभियान का नाम है अक्षर ज्ञान अभियान।

अक्षर ज्ञान अभियान मुख्य रूप से दिल्ली नगर निगम के दो शिक्षकों मनोज कुमार और अंशु पाठक के प्रयासों से संचालित हो रहा है। दोनों लगभग एक डेढ़ दशक से अध्यापन के सरकारी पेशे में हैं ।



इन दोनों ने अपनी सीमाओं का विस्तार करते हुए पिछले दो तीन वर्षों से लगातार अपने विद्यालय में ही नहीं अपितु अनेक विद्यालयों में छात्र छात्राओं की संख्या विस्तार के लिये सघन प्रयास किये हैं।

इन प्रयासों के तहत ऐसे बच्चों की पहचान की जाती है जो किसी कारण से स्कूल से नहीं जुड़ पा रहे हैं । उदाहरण स्वरूप वे  कामकाजी हैं जैसे कूड़ा बीनने वाले, भीख मांगने वाले, चाय की दुकानों में कार्यरत हैं। या फिर अन्य कारणों से पढ़ नहीं पा रहे हैं  जैसे उनके अनेक छोटे भाई बहन हैं जिनकी देखभाल के लिये वे घर से नहीं निकल पा रहे। माता पिता जागरूक नहीं है, पढ़ने के लाभों को बेकार मानते हैं  या .............अनेकों कारण हैं जिनकी वजह से पांच वर्ष से 14 वर्ष तक के लाखों बच्चे दिल्ली में भी स्कूलों से बाहर हैं।



अंशु पाठक और मनोज कुमार दक्षिणी दिल्ली नगर निगम में कार्यरत शिक्षक हैं जो अपने इलाके यानि दक्षिण पश्चिम दिल्ली के नजफ गढ़ जोन में पांच से 14 वर्ष आयु के ऐसे बच्चों की पहचान करते हैं जो स्कूल नहीं जा रहे।

सबसे पहले इनके लोकेशन की तलाश होती है। ये सबसे आसान हैं क्योंकि हर चौराहे पर रैडलाइट पर हाथ फैलाये कुम्हलाये चेहरे, दुबले पतले हाथ और आंखों में कुछ पाने की भूख हम आप रोज देखते हैं। 

इन्हें देख कर हमारे आपके लिये सबसे आसान काम है हिकारत की नजर से देखना और उपदेश देना। हम में से कुछ लोग ऐसे अवसरों पर तटस्थता की निर्मम चादर ओढ़ वीतराग संन्यासी बन जाते हैं।



कुछ प्रतिशत अपना बचा खुचा जूठन इनकी ओर बढ़ाते तो कुछ सहानुभूति में पगे यथाशक्ति तथाभक्ति का उदाहरण पेश करते हुए यथासंभव दान भी करते हैं। पर दिल्ली नगर निगम के ये शिक्षक इनकी सहायता अलग तरीके से करते हैं।

इन बच्चों से मिलना, नियमित समय तक इन्हें बिस्किट, चाकलेट, ब्रैड आदि खिलाने के साथ इनका विश्वास जीत कर इनके रहने के ठिकाने तक पहुंचना एक आसान नहीं कठिन काम होता है।

इससे कठिन है इनके अभिभावकों को समझाना कि इन बच्चों को स्कूल जाना चाहिये। दरअसल इनके बच्चे एक तरह से कमाउ पूत हैं जो परिवार की आर्थिक शक्ति बढ़ाने में योगदान देते हैं। इस योगदान से वंचित रहकर पढ़ने के लिये स्कूल भेजना एक कठिन और बेहद चुनौतीपूर्ण फैसला होता है।



अंशु पाठक कहती हैं सबसे कठिन काम अभिभावकों का विश्वास जीतना है। यदि एक बार वे सहमत हो भी गये तो भी इन्हें लगातार प्रेरित करते रहने के लिये नियमित अंतराल पर इनके साथ संवाद आयोजित करना जरूरी होता है।

हर दो महीने में कम से कम एक बार या अधिकतम तीन महीने में एक बार इनके आवास के निकट एक आयोजन दोनों शिक्षकों द्वारा होता है। इस आयोजन में बच्चों के लिये वर्कशॉप का आयोजन और उनके माता पिता को लुभाने के लिये शिक्षा के प्रति जागृत रखने के लिये यथासंभव सहायता की जाती है।

उदाहरण स्वरूप अभिभावकों के लिये थोड़ा बहुत राशन, शैंपू साबुन, कपड़े आदि तथा बच्चों के लिये स्नैक्स, स्टेशनरी, किताबें खेल खिलौने आदि।


सबसे कठिन काम है इन्हें लगातार स्कूल में साल दर साल टिकाये रखना । दरअसल ये बच्चे शुद्ध सर्वहारा समाज के सदस्य हैं जो अपने माता पिता अभिभावक के लिये उपलब्ध रोजगार के हालातों के अनुसार उस स्थान पर टिके होते हैं । यदि अभिभावकों ने किसी कारण से अपना ठिकाना बदल दिया तो बच्चों की पढ़ाई छुट जाती है।

पर इन सब समस्याओं के बावजूद पिछले दो वर्षों में अक्षर ज्ञान अभियान ने अपने साथ लगभग ढाई तीन सौ बच्चों को जोड़ा है। ये बच्चे नियमित स्कूल जा रहे हैं।



इनमें से कुछ बच्चों के लिये सर्व शिक्षा अभियान के तहत तीन केन्द्र खुले हैं। इन तीन केन्द्रों में लगभग सवा सौ बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। ये केन्द्र किसी गैर सरकारी संगठन यानि एनजीओ द्वारा नहीं बल्कि सरकार द्वारा अनुबन्ध पर नियुक्त शिक्षकों द्वारा संचालित हो रहे हैं।

इनके लिये बुनियादी ढांचा यानि स्कूल - केन्द्र के लिये  स्थान, बेंच डैस्क आदि  दिल्ली नगर निगम के विद्यालयों द्वारा उपलब्ध कराया जाता है जबकि शिक्षकों का मानदेय एसएसए के द्वारा दिया जाता है।

ये केन्द्र निगम के अंतर्गत चल रहे विद्यालय नियमों से थोड़े से अलग संचालित होते हैं जहां समाज के सबसे वंचित वर्ग के बच्चे शिक्षा पा रहे हैं।



गर्मी की छुट्टियों में जब स्कूल बन्द हैं तो इन बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने के लिये समर वर्क शॉप का आयोजन तीनों केन्द्र पर हो रहा है। बच्चे इनमें पूरे उत्साह के साथ भाग ले रहे हैं ।

ये उत्साह कायम रहे इसके लिये व्यापक समाज का सहयोग जरूरी है। आप चाहें तो अक्षर ज्ञान अभियान को अपना सहयोग दे सकते हैं। यह सहयोग नैतिक समर्थन के रूप में हो सकता है। आर्थिक सहयोग भी दिया जा सकता है। आप चाहें तो इन बच्चों को प्रेरित करने के लिये पढ़ाने के लिये अपनी सुविधानुसार समय दान कर सकते हैं।

समर कैंप के तहत सागरपुर, सुलहकुल और मटियाला की बस्ती में बच्चों के लिये तरह तरह की गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं। पढ़ाई लिखाई के साथ मनोरंजन का इंतजाम हो रहा है। अभिभावकों के बीच राशन बांटे जा रहे। स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

 
इस आयोजन में आप भी भाग ले सकते हैं। अच्छा लगेगा आपको भी और आपके बच्चों को भी। यदि गर्मी की छुट्टियों में दिल्ली में हैं तो इन बच्चों के साथ भी कुछ पल बितायें। सार्थक समाजोपयोगी पल ।
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