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मॉडरेशन पर हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है सीबीएसई

मॉडरेशन पर हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है सीबीएसई नई दिल्ली: 12वीं क्लास के करीब डेढ़ करोड़ स्टूडेंट्स का भविष्य अधर में लटका है क्योंकि मॉडरेशन यानी छात्रों को नंबर बढ़ाकर देने की पॉलिसी के मुद्दे पर गड़बड़ी कायम है। दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट ने छात्रों को नंबर बढ़ाकर देने की सीबीएसई की पॉलिसी को इस साल जारी रखने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सीबीएसई अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है। ज्यादातर स्कूल्स इस मामले में क्या फैसला आता है इसको लेकर कन्फ्यूजन की स्थिति में हैं जिस वजह से स्टूडेंट्स के 12वीं के रिजल्ट आने में देर हो रही है।

बुधवार को यूपी बोर्ड ने फैसला किया है कि सीबीएसई जो भी फैसला करेगी उसे ही फॉलो किया जाएगा तो वहीं आईएससीई इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन जो आमतौर पर हर साल मई के दूसरे सप्ताह तक अपने रिजल्ट्स की घोषणा कर देता था वह भी इस साल इसी रणनीति का पालन कर रहा है। इस पूरे मामले पर संदेह इसलिए भी है कि सीबीएसई ने चुप्पी साध रखी है कि मॉडरेशन विवाद को लेकर वह 12वीं के रिजल्ट्स रोकेगा या नहीं। रिजल्ट्स जारी करने में देरी की वजह से ऐडमिशन कैलेंडर पर ही इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। साथ ही मॉडरेशन अप्लाई होगा या नहीं इसका असर सभी बोर्ड्स के कैंडिडेट्स पर पड़ेगा।

बुधवार को मानव विकास संसाधन मंत्रालय ने हाई कोर्ट के ऑर्डर पर कानूनी सलाह लेने का फैसला किया था। सूत्रों की मानें तो सीबीएसई हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटिशन दायर कर सकती है। हाई कोर्ट के फैसले ने पूरे मामले को और पेचीदा बना दिया है क्योंकि सीबीएसई ने सभी 31 बोर्डों के साथ मिलकर 24 अप्रैल को यह फैसला किया था कि मार्क्स मॉडरेट नहीं किए जाएंगे यानी स्टूडेंट्स को नंबर बढ़ाकर नहीं दिया जाएगा। इस सहमति के आधार पर 7 स्टेट बोर्ड्स अपने रिजल्ट्स की घोषणा कर चुके हैं। 32 एजुकेशन बोर्ड जिसमें सीबीएसई और सीआईएससीई शामिल है ने इस बात पर सहमति जतायी थी कि सभी स्टूडेंट्स के लिए एक लेवल बनाया जाएगा ताकि हाल के सालों में कॉलेजों में ऐडमिशन के दौरान जो कट ऑफ बहुत ज्यादा ऊपर चला जाता है उसे रोका जा सके।हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद बुधवार सुबह मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सीबीएसई के चेयरपर्सन और स्कूल एजुकेशन के सेक्रटरी के साथ बैठक कर पूरे मामले पर चर्चा की। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'मीटिंग में यह फैसला किया गया कि इस मामले पर कानूनी राय ली जाएगी और दूसरे विकल्पों पर भी चर्चा होगी। आगे क्या कार्रवाई करनी है इसका फैसला कानूनी राय लेने के बाद ही किया जाएगा। कुछ स्कूल बोर्ड्स जैसा कि पंजाब बोर्ड ने बिना मॉडरेशन के अपने रिजल्ट्स डिक्लेयर कर दिए हैं इससे भी कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है।'

हालांकि एचआरडी मंत्रालय के सूत्रों की मानें तो इस मामले की वजह से रिजल्ट्स आने में देरी होगी तो वहीं सीबीएसई के सूत्रों का कहना है कि जब तक इस मामले पर आखिरी फैसला नहीं आ जाता तब तक कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया, 'अगर सीबीएसई हाई कोर्ट के आदेश के हिसाब से काम करने का फैसला करती है तो उन बोर्डों के साथ समस्या खड़ी हो सकती है जिन्होंने अपने रिजल्ट्स जारी कर दिए हैं। और अगर सीबीएसई कोर्ट के फैसले पर रीव्यू लेती है तो रिजल्ट्स में देरी होगी।'

सीबीएसई के पूर्व चेयरपर्सन अशोक कुमार गांगुली ने एचआरडी मंत्रालय से इस मामले में हस्तक्षेप कर मॉडरेशन सिस्टम के दुरुपयोग को रोकने की मांग की थी। मॉडरेशन यानी अंक बढ़ाकर देने की प्रक्रिया इस शुरू हुई थी ताकि एग्जाम सिस्टम में कमी या मुश्किल लेवल की वजह से छात्रों के किसी सेक्शन को नुकसान न हो। इसकी बजाए यह स्कूल बोर्ड्स के बीच कॉम्पटिशन का जरिया बन गया। इतना ही नहीं सीबीएसई भी इस कॉम्पटिशन में शामिल हो गया। पिछले साल टीओआई ने रिपोर्ट किया था कि ऑल इंडिया मैथ्स एग्जाम के रिजल्ट में सीबीएसई ने मॉडरेशन के जरिए 16 मार्क्स और दिल्ली रिजन में 15 मार्क्स दे दिए थे। नतीजतन लाखों स्टूडेंट्स ने मैथ्स में जरूरत से ज्यादा हाई मार्क्स स्कोर किया था।
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