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सनातन है क्या? त्रिभुवन की फेसबुक वॉल से

जनता जनार्दन संवाददाता , Apr 30, 2017, 14:05 pm IST
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सनातन है क्या? त्रिभुवन की फेसबुक वॉल से
ईसाई ईसा को ही पूजते हैं। मुसलमान मुहम्मद साहब को ही आख़िरी पैग़ंबर मानते हैं और अल्लाह के अलावा किसी अन्य में कोई विश्वास नहीं करते। बौद्धों के लिए बुद्ध के अलावा कुछ भी मान्य नहीं हैं। हर धर्म के साथ यही विशेषता जुड़ी है। लेकिन सनातन धर्म ऐसा है कि वह समय के साथ अपने नाम को भी बदलता चलता है और अपने देवताओं को भी। वह अपनी संस्कृति को भी बदलता है और अपनी भाषा को भी। वह ठहरना सीखा ही नहीं। जो आज है, वह कल हो ही नहीं सकता उसमें। -उसने मुझे कहा।
 
वह बोला : राम से पहले शिव थे। ब्रह्मा थे। विष्णु और महेश थे। हम समय के अनुसार अपने आपको अपडेट करते रहते हैं। कभी सरस्वती, कभी लक्ष्मी और कभी कापालिका। कभी गणेश और कभी कामदेव। हम कभी भगवान् श्रीराम को पूज लेते और कभी श्रीकृष्ण को। मर्यादा की ज़रूरत पड़ी तो राम जी को याद किया और रणनीति की तो श्रीकृष्ण याद आ जाते हमें। हम पर्वत को पूज लेते और अगले ही पल ज़रूरत पड़ी को फावड़े से तोड़ उसे आंगन में ला बिछाएं। हम एक क्षण गाय को माता कहें और अगले क्षण पाएं कि वह दंड प्रहार से उसे अपने खेत और घर से भगाने में व्यस्त हो जाएं। 
 
हमने कभी अग्नि की पूजा की तो कभी वायु की। कभी अश्विनीकुमारों को पूजा और भुला भी दिया तो कभी आदित्य और इंद्र को स्थापित किया और बिसार दिया। ज़रूरत पड़ी तो कामदेव को साकार किया और आत्मार्पित किया। कामोत्सव से मन भरा तो त्वष्टा और सुकृति को ले आए। -उन्होंने ज्ञानवर्धन किया। 
 
वे बोले : तुम भूल गए, कभी मित्र, वरुण और शुनाशीर की भी पूजा होती थी। कभी पूषा और कभी विश्वकर्मा की। हमने कभी ऋद्धि को माना तो कभी सिद्धि को। कभी अहल्या, कुंती, तारा, द्रोपदी और मंदोदरी को। 
 
इन से बोर हुए तो हम काली, कल्याणी, कुमारिका, चंडिका, त्रिमूर्ति, दुर्गा, रोहिणी, शांभवी और सुभद्रा को ले आए। 
 
हमारा मन इनसे भरा तो हम चामुंडा को ले आए तो कभी छिन्नमस्ता को। और तो और, हमने राक्षस, भूत-पिशाच और प्रजापतियों तक को समान भाव से पूजा। हमारे लिए जती, सती और यती भी पूजनीय रहे। हम श्वेतांबर को प्रणाम करते और दिगंबर को मस्तक नवाते। हम ईसा, मूसा और पैगंबर को भी पूज लेते। 
 
वे कहने लगे : उषा काल में सनातनी होते हैं, सुबह-सुबह आर्यसमाजी हो जाते हैं, दोपहर में थोड़ी देर वामपंथ का आचमन कर शाम को संघ की शाखा में चले जाते हैं और रात को हम शुद्ध अघोरपंथी-कामधर्मी। 
 
वे बोले: हम बुद्ध के समय हीनयानी और महायानी तो इस्लाम की जब तूती बोलती है तो मुल्ला आनंद नारायण और ईसाइयत का डंका बजे तो माइकेल मधुसूदन दत्त और सिख धर्म की पताका फहरे तो हम तत्काल सरदार अयोध्यासिंह हरिऔध उपाध्याय। 
 
हम ईसोपनिषद् लिख लेते, हम अथअल्लोहपनिषद् रच लेते और हम कर लेते अथकथाश्री देवपुरुष अक़बर की। 
 
वे कहने लगे : देखो, बुद्ध ने कहा : ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं। हमने कहा : भगवान् बुद्ध। 
 
और तो और : अंबेडकर ने राम को मन से भरपूर गालियां दीं, लेकिन प्रभु राम के हम भक्तों ने उनको भी पूजनीय घोषित कर दिया। 
 
हम आज गाय को पूज रहे हैं, कल काले कुत्ते को पूजेंगे और परसों काले कौए को। बोलो : करोगे हमारा मुकाबला? तुम हज़ारों साल से ठहरे हुए जंग लगे और हम हर पल गहरे से गहरे और ताज़ा के ताज़ा! ऐप्पल की तरह हर समय अपडेटिड वर्शन हमारा तैयार। 
 
मैं चुप, मौन और स्तब्ध।

# वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक लेखक त्रिभुवन अपने स्तंभो और विचारों के साथ-साथ फेसबुक पर भी खासे चर्चित हैं. वहां उनकी टिप्पणियां खूब प्रतिक्रिया बटोरती हैं. यह टिप्पणी भी उनकी फेसबुक वॉल से उठा ली गई है.
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