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कृषि नीति में खामियों के चलते दालों की कीमत में गिरावट

कृषि नीति में खामियों के चलते दालों की कीमत में गिरावट लखनऊ: अच्छे मानसून और उन्नत तकनीक की वजह से पिछले कई सालों के बाद इस साल देश में दालों की रिकार्ड पैदावार है. खरीफ के बाद रबी सीजन में भी चना, मटर और मसूर की ज्यादा पैदावार के बाद भी दाल उत्पादक किसान निराश हैं. स्थिति यह है कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर अपनी दालों को मंडियों में बेचना पड़ रहा है.

उत्तर प्रदेश दाल एसोसिएशन के अध्यक्ष भरत भूषण ने बताया '' इस साल पूरे देश में 2 करोड़ 20 लाख टन दलहन के उत्पादन का अनुमान है जबकि पिछले साल सूखे के कारण देश में मात्र 1 करोड़ 70 लाख टन ही दालें पैदा हुई थी। ऐसे में मंडियों में दालों की आवक बढ़ी है। थोक से लेकर खुदरा बाजार में दाल सस्ती बिक रही है, लेकिन किसानों को उनकी पैदावार का दाम नहीं मिल पा रहा है। गोरखपुर जिले के चौरीचौरा ब्लाक के सरदार नगर गांव के किसान राधेश्याम सिंह ने बताया इस अरहर और मटर की 10 बीघे से ज्यादा खेती की थी। पैदावार भी अच्छी हुई है लेकिन मंडियों में दाम अच्छा नहीं मिल रहा है। ''

झांसी जिले के बेहटा गांव के किसान मनिराम ने बताया कि इस साल मसूर की अच्छी पैदावार हुई है। न्यूनतम समर्थन मूल्य चालू सीजन में 3959 रुपए प्रति कुंतल है लेकिन मंडियों में 3500 से लेकर 3700 रुपए प्रति कुंतल ही किसानों से खरीदा जा रहा है। ऐसे में लागत निकलना ही मुश्किल हो रहा है। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5050 रुपए प्रति कुंतल घोषित है जिसमें बोनस भी शामिल है लेकिन मंडियों में अरहर की दाल 4200 से 4500 रुपए प्रति कुंतल बिक रही है। इसी तरह मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5225 रुपए प्रति कुंतल है जबकि मंडियों में दाल 4400 से लेकर 5000 रुपए खरीदी जा रही है।

लखनऊ की सबसे बड़ी गल्ला मंडी पाण्डेयगंज के गल्ला मंडी व्यापार मंडल के अध्यक्ष राजेन्द्र अग्रवाल ने बताया '' चालू सीजन में दालों की पैदावार ज्यादा हुई है इसके अलावा आयात भी लगतार हुआ है जिससे बड़ी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर दाल खरीदी जा रही है। ''

भारतीय दाल और अनाज एसोसिएश्न के उपाध्यक्ष विमल कोठारी ने बताया '' देश में दलहन की बढ़ी पैदावार के चलते दलहन की कीमतों पर दबाव है। रबी सीजन की प्रमुख दलहनी फसलें चना और मटर की आवक बड़ी मात्रा में हो रही है वहीं 17 अप्रैल के बाद से अरहर की आवक भी बढ़ जाएगी। '' उन्होंने कहा पैदावार अधिक होने और सरकार के पास दालों के भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था न होने से दालों की कीमतें घट गई हैं। देश में दालों की खपत इस साल 240 लाख टन से उपर रहने का अनुमान है जबिक दालों का उत्पादन 200 से लेकिर 220 लाख टन रहने वाला है। ऐसे में दालों की बड़ी पैदावार के बाद भी दालों के आयात की जरूरत पड़ेगी।

लखनऊ की सबसे बड़ी गल्ला मंडी पाण्डेयगंज के गल्ला मंडी व्यापार मंडल के अध्यक्ष राजेन्द्र अग्रवाल ने बताया ‘’ चालू सीजन में दालों की पैदावार ज्यादा हुई है इसके अलावा आयात भी लगतार हुआ है जिससे बड़ी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर दाल खरीदी जा रही है। ‘’

देश में दालों की बढ़ती पैदावार के बाद भी प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता कम है। विश्व संगठन और विश्व खाद्यद और कृषि संगठन के अनुसार प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 104 ग्राम दालों उपलब्ध होनी चाहिए लेकिन भारत में यह 50 ग्राम से भी कम है। देश में प्रति दिन प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता कम से कम 50 ग्राम करने के लिए भारत सरकार ने साल 2006 में दालों के निर्यात पर पाबंदी लगाने के साथ ही साल 2030 तक 32 मिलियन टन दालों के उत्पादन का लक्ष्य रखा है। देश में दालों के कुल उत्पादन में उत्तर प्रदेश का स्थान दूसरा है। मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा दालों का उत्पादन होता है लगभग 24 प्रतिशत। वहीं उत्तर प्रदेश में देश की कुल दालों का 16 प्रतिशत उत्पादन होता है।
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