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हर एक घंटे देश में एक विद्यार्थी कर रहा है खुदकुशी

हर एक घंटे देश में एक विद्यार्थी कर रहा है खुदकुशी नई दिल्लीः मुंबई में मैनेजमेंट के छात्र 24 साल के अर्जुन भारद्वाज ने 19वीं मंजिल पर स्थित होटल के कमरे से छलांग लगाकर जान दे दी। मीडिया में आई खबरों में कहा गया कि वह परीक्षा में फेल होने की वजह से अवसाद की चपेट में था और सोशल मीडिया पर गाहे-बगाहे अपना जीवन खत्म करने की बात किया करता था। ऐसी रिपोर्ट भी हैं जिनमें कहा गया है कि वह शायद मादक पदार्थ सेवन की समस्या से जूझ रहा था।

भारद्वाज की घटना सुर्खियां बनीं, शायद इसलिए क्योंकि उसने पांच सितारा होटल से छलांग लगाई थी और फेसबुक पर खुदकुशी के तरीकों पर चर्चा की थी। लेकिन, यह घटना अपने आप में कोई अपवाद नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2015 के मौजूद (सबसे ताजा) आंकड़े बता रहे हैं कि भारत में हर एक घंटे में एक विद्यार्थी अपनी जान दे रहा है।

2015 में देश में 8,934 विद्यार्थियों ने खुदकुशी की। आत्महत्या की कोशिशों की संख्या तो इससे कहीं ज्यादा होने का अनुमान है। इनमें से कई का तो दुनिया को पता तक नहीं चल पाता है।

मेडिकल जर्नल लांसेट की 2012 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 15 से 29 साल के बीच के किशोरों-युवाओं में आत्महत्या की ऊंची दर के मामले में भारत शीर्ष के कुछ देशों में शामिल है। इसलिए समस्या को गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है।

2015 में महाराष्ट्र में सर्वाधिक 1230 छात्र-छात्राओं ने खुदकुशी की। यह कुल आत्महत्या (8934) का 14 फीसदी है। 955 आत्महत्याओं के साथ तमिलनाडु नंबर दो पर और 625 खुदकुशी के साथ छत्तीसगढ़ नबंर तीन पर रहा। यह ध्यान देने की बात है कि महाराष्ट्र और तमिलनाडु देश के दो सबसे विकसित प्रदेश हैं। इन दोनों में आत्महत्याओं की ऊंची दर बता रही है कि आर्थिक विकास के दबाव किस हद तक बढ़ गए हैं।

कई सालों का समग्र अध्ययन बताता है कि सिक्किम में आत्महत्या की दर देश में सबसे ज्यादा है। और, यहां से देश के लिए चेतावनी के संकेत मिल रहे हैं।

दिल्ली और चंडीगढ़ के बाद प्रति व्यक्ति आय के मामले में सिक्किम देश में तीसरे नंबर पर है। साक्षरता के मामले में यह सातवें नंबर पर है। लेकिन, बेरोजगारी की दर के मामले में यह देश में दूसरे नंबर पर है। राज्य में होने वाली आत्महत्याओं में से 27 फीसदी का संबंध बेरोजगारी से है और इसके शिकार लोग मुख्य रूप से 21 से 30 साल की उम्र के रहे हैं।

काउंसलर बताते हैं कि युवा परीक्षा और करियर में फेल होने के दबाव से टूट रहे हैं और बुरे वक्त में इन्हें समाज, संस्थाओं या परिवार का सहारा नहीं मिल रहा है। देश में मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सकों की संख्या जरूरत के मुकाबले 87 फीसदी कम है। देश में मानसिक स्वास्थ्य पर सरकार बहुत कम खर्च करती है..बांग्लादेश से भी कम।

देश के विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच 2016 में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि ‘खुश’ परिवारों के छात्र कम अवसादग्रस्त होते हैं।

बच्चों और किशोरों के बीच काम करने वाले एनजीओ एनफोल्ड इंडिया की सह-संस्थापक शैब्या सलदाना ने ‘इंडियास्पेंड’ से कहा, “आम धारणा यही है कि परीक्षा में अनुत्तीर्ण होना या पढ़ाई नहीं कर पाना विद्यार्थियों की खुदकुशी का मुख्य कारण है। इसकी जड़ में बेहद हताशा और अहसाय होने की भावना है।”

एनसीआरबी का डेटा यह भी बताता है कि आर्थिक हालात आत्महत्या के प्रमुख कारकों में से एक हैं। 2015 में आत्महत्या करने वालों में से 70 फीसदी की सालाना आय एक लाख रुपये से कम थी। यह सीधे-सीधे विद्यार्थियों से जुड़ा आंकड़ा नहीं है लेकिन इससे यह पता चल रहा है कि आर्थिक हालत और खुदकुशी के बीच कितना गहरा रिश्ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या के हल की दिशा में बड़ा कदम स्कूलों-कालेजों में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाकर उठाया जा सकता है।

शैब्या ने कहा कि बच्चे के भावनात्मक संकट के समय मां-बाप की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। जब जोड़े अपने विवाह के पंजीकरण के लिए आते हैं तो उनके लिए विशेष ‘पैरेंटिंग क्लास’ लगनी चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि देश के विश्वविद्यालयों में बच्चों की मदद के लिए काउंसलिंग सेंटर की भारी कमी है जिसे दूर किए जाने की जरूरत है। साथ ही देश में मनोचिकित्सकों की भारी किल्लत को दूर करने की दिशा में भी कदम उठाए जाने की जरूरत है।

# आंकड़ा आधारित, गैरलाभकारी, लोकहित पत्रकारिता मंच इंडियास्पेंड के साथ एक व्यवस्था के तहत। यह इंडियास्पेंड का निजी विचार है
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