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विश्व टीबी दिवस: प्रभावी बचाव कार्यक्रम ही श्रेष्ठ वैक्सीन

जनता जनार्दन डेस्क , Mar 24, 2017, 13:16 pm IST
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विश्व टीबी दिवस: प्रभावी बचाव कार्यक्रम ही श्रेष्ठ वैक्सीन नई दिल्ली: 2017 विश्व टीबी दिवस से पूर्व यह मूल्यांकन करना लाजमी है कि दशकों से राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम के सक्रिय होने के बावजूद क्यों भारत में अन्य देशों की तुलना में सबसे अधिक टीबी (तपेदिक) है? वर्तमान में भारत के लगभग हर जिले में अति-आधुनिक जीन-एक्स्पर्ट ‘मोलिक्योलर’ जांच विधि उपलब्ध है जो टीबी की पक्की जांच और दवा प्रतिरोधक टीबी की ठोस जानकारी 2 घंटे के भीतर देती है। 5 लाख से अधिक डॉट्स सेवा केंद्र हैं और डॉट्स स्वास्थ्यकर्मी हैं जो रोगी की मदद करते हैं जिससे इलाज पक्का हो और सफलतापूर्वक पूरा हो सके। सभी जांच और इलाज सरकारी केंद्रों में निःशुल्क उपलब्ध है।

मगर दुनिया में सबसे अधिक टीबी के नए संक्रमण भारत में हैं। विश्व में सबसे अधिक दवा प्रतिरोधक टीबी भारत में है। दुनिया के अधिकांश देशों में टीबी दर में गिरावट आयी पर भारत में न केवल पिछले साल टीबी के रोगी चिंताजनक रूप से बढ़ गए बल्कि टीबी मृत्यु दर भी बढ़ गया! वर्तमान मोदी सरकार ने हाल ही में आह्वान किया है कि 2025 तक टीबी उन्मूलन का सपना साकार हो जाएगा। भारत सरकार ने 2015 में 194 देशों की सरकारों के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा में 2030 तक सतत विकास लक्ष्य को पूरा करने का वादा किया है। 2014 में विश्व स्वास्थ्य असेम्ब्ली में भी विश्व स्वास्थ्य संगठन एंड-टीबी निति को पारित कर भारत ने टीबी उन्मूलन के प्रति अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता पुनः व्यक्त की है। यह तो सब चाहते हैं कि जन स्वास्थ्य सशक्त हो और टीबी का पक्का उन्मूलन जल्दी हो। असल पहेली बूझने के लिए यह है कि टीबी का उन्मूलन कैसे हो?

संक्रमण फैलने से रोकें:- न केवल अस्पताल या स्वास्थ्य केन्द्र में संक्रमण नियंत्रण प्रणाली मजबूती से लागू हो बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर और घर में भी इसको लागू करना आवश्यक है। असंतोषजनक संक्रमण नियंत्रण के कारण टीबी जैसे संक्रामक रोग फैलते हैं। जरा सोचिए कि नवजात शिशु या बहुत छोटे बच्चे को टीबी कैसे हो जाती है? जाहिर है किसी निकट वयस्क से ही संक्रमण फैला होगा। दक्षिण अफ्रीका में शोध से हाल ही में यह ज्ञात हुआ कि 69 प्रतिशत अति-दवा प्रतिरोधक टीबी लोगों को असंतोषजनक संक्रमण नियंत्रण के कारण किसी अन्य रोगी से संक्रमित होकर हुई। इस शोध के पहले हम सब यही मानते थे कि अधिकांश अति-दवा प्रतिरोधक टीबी, दवाओं के दुरुपयोग और अनुचित इस्तेमाल से उत्पन्न होती है – जो सही बात है – पर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि यदि संक्रमण नियंत्रण संतोषजनक हो तो 69 प्रतिशत अति-दवा प्रतिरोधक टीबी को फैलने से रोकना सम्भव है।

बाकि के 31 प्रतिशत अति-दवा प्रतिरोधक टीबी को भी रोकना सम्भव है यदि दवाओं का दुरुपयोग न हो और अनुचित इस्तेमाल न हो। इंटर्नैशनल यून्यन अगेन्स्ट टीबी एंड लंग डिजीज के पॉल जेन्सेन ने बताया कि अब दवा प्रतिरोधक टीबी की मात्र 9 माह का इलाज विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शोध नतीजे देखते हुए पारित किया है।

पॉल जेन्सेन ने अपील की कि सरकारें इस कम-अवधि के दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज को राष्ट्रीय कार्यक्रमों में बिना विलम्ब शामिल करें।

दवा प्रतिरोधक टीबी का इलाज दो साल से अधिक अवधि का था और नतीजे भी असंतोषजनक थे। यह नवीनतम इलाज मात्र 9 माह अवधि का है और नतीजे अधिक संतोषजनक हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक टीबी कार्यक्रम के निदेशक डॉ मारिओ रविग्लिओने ने सिटीजन न्यूज सर्विस (सीएनएस) द्वारा आयोजित वेबिनार में कहा कि यदि टीबी उन्मूलन का स्वप्न साकार करना है तो यह अत्यंत जरुरी है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और अनेक गैर-स्वास्थ्य मंत्रालय सफल समन्वयन के साथ एकजुट हो कर इस अभियान में सक्रियता से भाग लें।

इसी विचार को केंद्रबिंदु में रखते हुए नवम्बर 2017 में, मास्को रूस में, वैश्विक मंत्रियों का सम्मलेन आयोजित हो रहा है। जांच पक्की हो:- अब यह शोध द्वारा स्थापित है कि टीबी की जांच चिकित्सकीय प्रयोगशाला में होती है। सिर्फ लक्षण देख कर टीबी का इलाज आरंभ कर देना चिकित्सकीय रूप से अनुचित है। भारत के हर जिले में अति-आधुनिक जीन एक्सपर्ट मॉलिक्यूलर जांच सरकारी अस्पताल में निःशुल्क उपलब्ध है। भारत के हर प्रदेश में बड़ी चिकित्सकीय प्रयोगशाला में अति-आधुनिक जांचें जैसे कि सॉलिड कल्चर, लिक्विड कल्चर, लाइन प्रोब एस्से (एलपीए) आदि भी उपलब्ध हैं। अब बिना पक्की जांच के टीबी का इलाज शुरू करना सही नहीं है। सभी निजी और सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों को यह सुनिश्चित करनी चाहिए कि टीबी की पक्की (और निःशुल्क) जांच के पश्चात ही टीबी का पक्का और निःशुल्क इलाज प्रारंभ किया जाए।

टीबी दवाओं के दुरुपयोग के कारण दवा प्रतिरोधकता उत्पन्न हो जाती है और दवाएं कारगर नहीं रहती। क्योंकि दशकों से दवाओं का अनुचित उपयोग हो रहा है इसलिए हम लोगों में से अनेक लोग दवा प्रतिरोधकता से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में बेहद जरूरी है कि जब किसी व्यक्ति की टीबी की पक्की जांच हो तो यह भी जांच हो कि किन दवाओं से उस व्यक्ति को दवा प्रतिरोधकता है और कौन सी दवाएं उसपर असर करेंगी। यह जाने बिना कि कौन सी दवाएं कारगर होंगी, इलाज आरम्भ करना ‘अंधेरे में तीर चलाने के समान’ है। इलाज पक्का तभी जब प्रभावकारी दवाओं से हो:- विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक टीबी कार्यक्रम के निदेशक डॉक्टर मारीओ रविगलीयोने ने सिटीजन न्यूज सर्विस (सीएनएस) को बताया कि बिना यह जांच किए कि रोगी पर कौन सी दवाएं कारगर रहेंगी (और कौन सी दवा प्रतिरोधकता के कारण काम नहीं करेगी), टीबी का इलाज आरम्भ करना चिकित्सकीय रूप से अनुचित कार्य है। यदि बिना दवा प्रतिरोधकता की जांच किए इलाज शुरू हुआ तो सम्भव है कि दवा कारगर हो या ना हो।

यदि दवा कारगर नहीं हुई तो रोगी न केवल महीनों अनावश्यक कष्ट और पीड़ा में रहेगा, बल्कि उससे अन्य लोगों को संक्रमण भी फैलने का ख़तरा रहेगा। यह भी सम्भव है कि वो अन्य दवाओं के प्रति भी प्रतिरोधक हो जाए और उसका इलाज अधिक जटिल हो जाए। गौर करें कि दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज के नतीजे असंतोषजनक हैं क्योंकि अधिकांश केन्द्रों में औसतन 50 प्रतिशत लोग ही सफलतापूर्वक ठीक हो पाते हैं। दवा प्रतिरोधक टीबी का इलाज न केवल अत्यधिक लम्बा (२ साल या अधिक अवधि) और महंगा है (पर सरकारी केन्द्रों में निःशुल्क उपलब्ध है)।शोभा शुक्ला जो सिटीजन न्यूज सर्विस (सीएनएस) की निदेशक हैं, ने बताया कि भारत के हर जिले में जीन एक्सपर्ट मशीन होने के बाद भी, भारत सरकार के पुनरीक्षित राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत टीबी की प्रारम्भिक पक्की जांच माइक्रोस्कोपी से होती है।

इससे दवा प्रतिरोधकता की जानकारी नहीं मिलती और औसतन 30-40 प्रतिशत टीबी पकड़ में भी नहीं आती। मौजूदा कार्यक्रम में दवा प्रतिरोधकता की जांच तब होती है जब महीनों इलाज के बाद भी रोगी ठीक नहीं होता। हर जिले में जीन एक्स्पर्ट मशीन होने के बावजूद यदि हम उसका इस्तेमाल प्रारम्भिक टीबी जांच और प्रतिरोधकता की जानकारी लेने में न करें तो यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। भारत में ही 2015 में हुए जीन एक्स्पर्ट सम्बंधी सबसे बड़े शोध से यह ज्ञात हुआ कि यदि जीन एक्स्पर्ट का इस्तेमाल प्रारम्भ में ही टीबी की पक्की जांच करने में हो तो 39 प्रतिशत अधिक टीबी पकड़ में आती है और 5 गुना अधिक दवा प्रतिरोधकता का पता लगता है।

इस शोध को हुए लगभग 2 साल होने को आए और हर जिले में जीन एक्स्पर्ट मशीन लगे 1 साल हुआ पर अभी तक हम लोग वैज्ञानिक उपलब्धि को जन स्वास्थ्य लाभ में नहीं परिवर्तित कर पाए हैं। उम्मीद है कि 2025 तक टीबी उन्मूलन के वादे के प्रति भारत सरकार की वचनबद्धता सही साबित हो। टीबी जिस दर से कम हो रही है (1.5 प्रतिशत) उससे 2025 तक टीबी उन्मूलन के सपने को साकार करना संभव नहीं है। यदि 2025 तक टीबी उन्मूलन का स्वप्न साकार करना है तो सालाना टीबी दर में गिरावट कम से कम 20 प्रतिशत होनी चाहिए।

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