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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2017: आधी दुनिया का केवल एक दिन क्यों?

त्रिभुवन , Mar 08, 2017, 18:58 pm IST
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2017: आधी दुनिया का केवल एक दिन क्यों? यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। आैरतों का एक ख़ास दिन। लेकिन कितनी हैरानी कि हमारे शब्द संसार में औरत एक अपमानजनक ध्वनि रखता है।

हम अक्सर कमज़ोरी के लिए इस शब्द का प्रयोग करते हैं। क्या औरतों की तरह रोता है! हाथों में चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं! वीरता को पौरुषपूर्ण कहा जाता है। हम सब न केवल बल से पाशविक हैं, बल्कि हमारी सोच भी हीन, घृणित और पाशविक होती चली गई है। यह पाशविकता इतनी निम्नस्तरीय है कि हमारी जितनी भी साैम्य और सुंदर गालियां हैं, जो वे सभी मां और बहन जैसे पावन रिश्तों को ही अपना निशाना बनाती हैं।

हिन्दू अपने आपको श्रेष्ठ बताता है और मुसलमान अपने आपको। दोनों एक दूसरे से श्रेष्ठ बताते हैं। लेकिन संस्कार के स्तर पर ये दोनों ही नहीं, सभी धर्म और संस्कृतियों से जुड़े लोग तनाव को दूर करने के लिए माताओं और बहनों को समान रूप से अलंकृत करते हैं।

आैरतों को मातृशक्ति कहने वाला एक संप्रदाय तो इतना महान है कि आप उनका जरा सा तार्किक प्रतिवाद करो तो वे मां और बहन को ही सबसे पहले सुशोभित करते हैं।

हमारी सोच में औरत क्या है? ...औरत एक अंडा है, औरत एक गर्भाशय है, औरत एक योनि है, औरत एक अंग है, औरत बहुत सारे सम्मोहक अंगों का एक रसालय है। औरत न इनसान है और न एक प्राणी। वह प्रजनन और दोहन का एक माध्यम है।

औरत की स्थिति देखें तो वह हैरान करती है। औरत के ख़िलाफ़ पूंजीवादी, इस्लामवाली, हिन्दूवादी, साम्यवादी, समाजवादी आदि आदि सभी तरह के समूह समानरूप से शक्तिशाली और सहयोगी हैं।

कारपोरेट कैपिटलिज़्म औरत की दैहिकता को बाज़ार में बेचना चाहता है और बाज़ार को बेचने वाली चीज़ों का एक माध्यम बनाना चाहता है। वह उसके वस्त्रों को समेटता है। परंपरागत धर्म और संस्कृति आधारित मूढ़ और जड़ समाजों को यह बुरा लगता है तो इसके ख़िलाफ़ समाजवादी, साम्यवादी और महिलावादी तक बाज़ारवाद के ख़िलाफ़ कंधे से कंधा मिलकर औरत को बाज़ार की वस्तु बनाने की राहों को मज़बूत करते देखे जाते हैं।

गतिशील और प्रगतिशील शक्तियां अक्सर औरत को आगे बढ़ाने की बातें करती हैं। आज का हमारा आधुनिक समाज दावा करता है कि वह औरत को बहुत आगे रखता है। लेकिन यह एक विभ्रम है। वह औरत को नहीं, ख़ूबसूरत और यौनाकर्षण वाली तरुणियों को आगे रखता है और जब वे मां बनने लगती हैं या अपने चेहरों और अपनी-अपनी देहों का सम्मोहन खोने लगती हैं तो उनकी हमारे आधुनिक ऑफिसों में कहीं कोई जगह नहीं रहती। फिर भले वह कोई हॉस्पीटल हो, कोई मीडिया हाउस हो या राजनीतिक दल।

कितनी बड़ी विडंबना है कि औरत को ताकतवर बनाने के नाम पर पुरानी प्रथाओं को दुरुस्त करने बजाय नई ऐसी राहें उलीकी जा रही हैं, जो औरत के लिए पुरानी व्यवस्था से भी ज़्यादा ख़तरनाक हैं। जैसे लिव इन रिलेशनशिप। आप वैवाहिक संस्था को आधुनिक नहीं बनाएंगे, लेकिन इस नई व्यवस्था के जरिए उसे एक नए सम्मोहक नरक में धकेल देंगे।

औरत जो बच्चे को जन्म देती है, वह एक यंत्रणा और चुनौती भरे दौर से गुजरती है। इससे पुरुष को कभी नहीं गुजरना पड़ता।

वह बच्चे का पालन पोषण ही नहीं करती, वह उसे इनसान भी बनाती है। औरत बच्चे को अपने अंडे और गर्भाशय से शुरू करती है और उसे एक साहसी पुरुष में बदलती है। उसका यह रचना संसार एक क्रांति की तरह होता है। लेकिन कोख में पलकर भी हम मां का महात्म्य तो गाते हैं, लेकिन कभी ऐसा नहीं करते कि उसके नाम का एक खाता खुलवाएं और हर महीने कुछ रुपए उसमें डाल दें ताकि वह एक स्वतंत्र जीवन जी सके और पिता नामक एक दुष्ट के गोपन अत्याचार नहीं सहे।

हम मकान का किराया तो देख सकते हैं, लेकिन जिसकी कोख में पलते हैं, उसकी शाब्दिक गाथाएं तो गाते हैं, लेकिन उन डिंबग्रंथियों का कोई मूल्य नहीं आंकते, जिससे वह हमें बुनती है।

आैरत का महत्व उसका पत्नी या प्रेयसी होना नहीं है। औरत का औरत होना उसकी सृष्टि क्षमता है। पुत्र हों या पुत्रियां, अगर वे नपुंसक नहीं हैं तो उन्हें मां के गर्भाशय का किराया तो चुकाना चाहिए।

आप कहेंगे, ये क्या कमीनगी है। मां का भी कोई मूल्य होता है? मां तो अमूल्य है। हां, यह बहाना बनाना है और अमूल्य बताकर एक जिम्मेदारी से बचना है। यह सेरोगेसी का युग है और आप जब किराए की कोख लेकर बच्चों के पिता बनने लगते हैं तो आपको नहीं भूलना चाहिए कि आपको रागात्मकता और संवेदनात्मता के साथ आपके जीवन निर्माण का मूल्य चुकाना चाहिए।

पुरुष अपने अहंकार से ही  नहीं, बौद्धिक चातुर्य से भी आपको मज़बूत बनाता रहता है और औरत की सौम्यता ही उसकी कमज़ोरी। तभी तो उसने 364 दिन अपने लिए बड़ी चतुराई से रख लिए और एक दिन औरत के लिए।

यह कितना बड़ा आश्चर्य है कि साल में 364 दिन रति और सेक्सुअलिटी का पर्याय रहने वाली औरत बस एक दिन के लिए सम्मानित होती है और वह इसे भी बेहद सम्मान भाव से लेती है।

मैं हत्प्रभ हूं कि वह इसका विरोध करते हुए यह क्यों नहीं कहती कि मुझे वर्ष में एक सजावटी दिन नहीें, बराबरी, गरिमा और आत्मसम्मान का हर दिन और हर दिन का हर क्षण चाहिए!

# लेखक त्रिभुवन वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह लेख उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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