मुगलसराय का 'मुगल' बनने के लिए 2017 विधानसभा चुनाव में जो दावं पर हैं

मुगलसराय का 'मुगल' बनने के लिए 2017 विधानसभा चुनाव में जो दावं पर हैं चंदौलीः मुगलसराय, एशिया के सबसे बड़े रेलवे यार्ड वाला शहर. चंदौली जिले में पड़ने वाली कुल 4 विधान सभा सीटों में से एक. दिल्ली से कोलकाता की मेन रेलवे लाइन पर पड़ने वाला वह महत्त्वपूर्ण जंक्शन जहां, कई बार तो एक ही समय में चार-चार राजधानी एक्सप्रेस रुकती हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का पैतृक निवास, कांग्रेसी दिग्गज पंडित कमलापति त्रिपाठी की कर्मभूमि, देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह का गृह जनपद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय सीट से सटे होने के चलते इस जिले की सभी सीटों पर हार और जीत सभी सियासी दलों के लिए काफी मायने रखती है.

उसी चंदौली की चार विधानसभा में से एक 380 मुगलसराय विधानसभा पर   आज हम बात करते हैं. कल हमने सैयदराजा विधानसभा की चर्चा की थी, जिसे आप पाठकों ने खूब सराहा था.

यहां चुनाव में मुख्य मुद्दा क्या है, पर चर्चा करने से पहले देखते हैं कि मुकाबला किन दलों के बीच है. सपा, बसपा और भाजपा यहां खास हैं.

इन तीनों दलों ने जिन्हें चुनावी मैदान में उतारा है, वे हैं-

1) तिलकधारी बिंद, बसपा

380 विधानसभा मुगलसराय से तिलकधारी बिंद को बसपा ने अपना प्रत्याशी घोषित किया है. जिनकी शिक्षा 10 वीं तक है. इन्होंने भाकपा (माले) से अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की और और दल में तमाम पदों पर रहे.

इसी पार्टी से दो बार विधानसभा और एक बार लोक सभा का चुनाव लड़ा. एक बार जिला पंचायत के सदस्य रहे. और वर्तमान में इनकी पत्नी जिला पंचायत की सदस्य हैं. तिलकधारी बिंद,  बिंद समाज के प्रदेश अध्यक्ष हैं, जिन्हें बसपा ने वर्तमान में मुगलसराय से अपना प्रत्याशी घोषित किया है. आने वाले चुनाव में दलित-मुस्लिम गठजोड़ से इनको कितना फायदा मिल पाता है, यह एक यक्ष प्रश्न है, जिससे ये अभी भी जूज्ह रहे हैं.

इनके ऊपर कुल पांच राजनीतिक मुक़दमे दर्ज हैं. जिसमे एनएच जाम और डीआरएम का घेराव जैसे मामलों में आरोपी हैं. इन्हें बसपा के पारंपरिक वोट बैंक पर भरोसा है.

2) बाबूलाल यादव, सपा

380 मुगलसराय विधानसभा से सपा ने बाबूलाल यादव को अपना प्रत्याशी बनाया है. यह अपने व्यवहार से कहीं अधिक अपने राजनीतिक परिवार की वजह से जाने जाते हैं. 2012  में बाबूलाल यादव मुगलसराय से विधान सभा का  चुनाव लड़ चुके हैं, हालांकि तब बसपा से प्रत्याशी बब्बन सिंह चौहान ने लगभग 8000 मतो  से इन्हें हरा दिया था. अबकी बार कांग्रेस-सपा गठबंधन से यह कुछ लाभ मिल पाने की उम्मीद पाले हुए हैं.

बाबूलाल यादव बीए और एलएलबी पास हैं और काफी दिनों तक इन्होंने सिविल न्यायालय चंदौली में वकालत की है. बाबूलाल यादव का व्यक्तिगत कोई बड़ा राजनीतिक इतिहास नहीं रहा है, हालांकि इनका पूरा परिवार दो दशकों से सपा की राजनीति में है. इनके पिता गंजी प्रसाद मुगलसराय से दो बार विधायक रहे हैं. इन्होंने मुलायम सिंह यादव की पहली सरकार में बिना शर्त समर्थन देकर उन्हें मुख्यमंत्री बनने मदद की थी, तबसे ही यह परिवार मुलायम सिंह का करीबी माना जाता है. बाबूलाल एक बार नियामताबाद ब्लाक प्रमुख रहे हैं और लगातार दुसरी बार सपा ने इन्हें मुगलसराय से अपना प्रत्याशी बनाया है.

बाबूलाल यादव पर आधा दर्जन राजनीतिक मुकदमें हैं. जिसमें एनएच जाम और ट्रेन रोकने का मामला प्रमुख है. पर कोई खास आपराधिक इतिहास नहीं रहा है.

3- साधना सिंह, भाजपा

भाजपा यों तो कई मामलों में आगे रहती रही है, पर 380 मुग़लसराय विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी की घोषणा काफी विलम्ब से हुई, जिसका असर चुनाव प्रचार आदि पर तो नहीं दिख रहा, पर मतदाताओं से संपर्क साधने में पड़ सकता है. भाजपा ने यहां से साधना सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया है.

साधना सिंह की ससुराल मऊ जिले में है और चंदौली जिले में इनका मायका है. साधना सिंह की शिक्षा इंटरमीडिएट है और वर्तमान में वह व्यापार मंडल की जिलाध्यक्ष हैं. आपराधिक इतिहास की बात करें तो साधना सिंह के खिलाफ कोई खास केस नहीं है, सिवाय इसके कि कोयला मंडी में आंदोलन के दौरान यह कुछ दिनों के लिए जेल गयीं थीं.

चुनावी मुद्देः

चुनावी मुद्दों की बात की जाय तो सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य इस इलाके में प्रमुख राजनीतिक मुद्दे होंगे. इन मुद्दों के अलावा चंदासी कोयला मंडी में कामगारों, मजदूरों की समस्या प्रमुख है. अकेले औद्योगिक नगर और एशिया की सबसे बड़ी चंदासी कोयला मंडी, ५०० करोड़ से ज्यादा का वार्षिक रेवेन्यू देती है, लेकिन राजनीतिक दिवालियापन की वजह से इस क्षेत्र का विकास नहीं हो पा रहा है. अपराधियों के हस्तक्षेप की वजह से कोयले के कारोबार में माफियाओं का कब्जा हो गया है.

रेलवे हब होने के कारण मुगलसराय में नौकरी पेशा लोगों की संख्या भी काफी है. जिले में सबसे ज्यादा शहरी क्षेत्र इसी विधान सभा इसी क्षेत्र में है. शहर से सटे ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में शहरीकरण हाबी है. भूमाफिया की नजर गरीब किसानों की जमीन पर है और वाराणसी से सटे मुगलसराय में भुमाफियाओं की चांदी कट रही है.

बिजली, पानी और सड़क की हालत काफी खराब है. खासकर औद्योगिक क्षेत्र में बढ़ रहे अपराध की वजह से अब उद्यमी यहाँ से पलायित हो रहे हैं. सरकारी चिकित्सा प्रणाली भ्रष्टाचार की वजह से खस्ताहाल है तो प्राइवेट चिकित्सीय संस्थान तेजी से फल फूल रहे हैं और रोगियों को लूट रहे है.

एक तरह से समूचा इलाका भ्रष्टाचार और दबंगई के चलते बेहाल है, और जो नेता आज क्षेत्र में दिख रहे, इनमें से चुनाव जीत कर कोई भी अगले पांच सालों तक शायद ही दिखे.

वर्तमान चुनावी समीकरण:
मुग़लसराय विधानसभा में एक तरफ राजनीतिक पृष्ठभूमि के सपा प्रत्याशी जो कांग्रेस गठबंधन के साथ मुस्लिम वोटों पर नजर गड़ाये हुए हैं, तो दूसरी तरफ सोशल इंजीनियरिंग की माहिर बसपा ने दलित- मुस्लिम गठजोड़ से मुस्लिम मतदाताओं को अपनी तरफ खींचना चाहती है.

अब भाजपा ने व्यापार मंडल नेत्री साधना सिंह को प्रोजेक्ट करके इन दोनों दलों की मुश्किलें जरूर बढ़ा दी है. भौगोलिक दृष्टि से जिले का एक मात्र शहरी भाग मुग़लसराय फारवर्ड और वैश्य मतदाताओं का गढ़ माना जाता है. ऐसे में जातिगत चुनावी समीकरण ने इस विधान सभा में लड़ाई को त्रिकोणीय कर दिया है.

आंकड़ों में मतदाता
कुल मतदाताः 396198
पुरुष मतदाताः 206665
महिला मतदाताः 169467
तीसरा लिंग संख्याः 66

मुगलसराय विधानसभा की जातिगत स्थिति

मुसलमान- 55 हजार
यादव- 30 हजार
दलित- 60 हजार
वैश्य- 35 हजार
चौहान - 16 हजार
बिन्द - 18 हजार
पटेल(कुर्मी)- 20 हजार
कोइरी कुशवाहा- 20 हजार
ब्राह्मण-18 हजार
राजपूत-20 हजार
करीब 20 हजार अन्य मतदाता

पिछला इतिहासः

मुगलसराय विधान सभा के 2012 के परिणाम की बात करें, तो बसपा प्रत्याशी बब्बन सिंह चौहान ने 2012 के चुनाव में जीत हासिल की थी.  बसपा के बब्बन सिंह चौहान ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी सपा के बाबू लाल यादव को 15440 मतों से मात दी थी.

चकिया से सपा प्रत्याशी पूनम सोनकर ने चुनाव जीत था, वहीं सैयदराजा और सकलडीहा से निर्दल प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी. चुनाव जीतने के बाद सैयदराजा विधायक मनोज सिह ने सपा, तो सकलडीहा से विधायक सुशील सिंह भाजपा में शामिल हो गये.
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