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अंतरिक्ष में दासतां के खतरे

त्रिभुवन , Feb 20, 2017, 14:34 pm IST
Keywords: US vs India   Space technology   NASA   ISRO   Indian standing   Science article Hindi     
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अंतरिक्ष में दासतां के खतरे नई दिल्लीः आप देश और दुनिया को कहां ले जा रहे हैं और वैज्ञानिक कहां पहुंचाना चाहते हैं? आप कुछ होश में हैं कि इस महान् देश को अपने जीवाश्म जैसे विचारों के साथ प्रस्तर युग में ही धकेलने की कुत्सा करते रहेंगे?

वैज्ञानिक अब जीन एडिटिंग युग में पहुंच गए हैं। वे शादी-ब्याह जैसी झिकझिक से आपको दूर करने जा रहे हैं। अब जीन एडिटिंग का युग आ रहा है। आपकी त्वचा से आपकी संततियों को पैदा करने का जमाना दस्तक दे रहा है।

आप चाहें तो उसके क्लोन तैयार करवाएं। आप एक ऐसे युग के प्रवेश द्वार पर हैं, जहां शिशुओं को नौ महीने तक अपनी मां के पेट में रहने की ज़रूरत नहीं होगी।

अब संतान पैदा करने के लिए सेक्सुअल इंटरकोर्स नामक आदिमाधुनिक प्रक्रिया की आवश्यकता अप्रासंगिक हो जाएगी।

अब ज़माना एक ऐसे युग की देहरी पर खड़ा है, जहां मुस्लिम समाज में प्रचलित सरकमसाइज़ प्रथा की तरह सभी लोग अपने लड़कों को पौरुषपूर्णता और लड़कियों को स्त्रीत्व के ख़तरों से तरुणाई से पूर्व ही मुक्त करने की नई प्रथाओं की ज़रूरत महससू करेंगे। आैर हर माता-पिता चाहेंगे कि उनका बेटा या बेटी अनावश्यक झंझटों में पड़े बिना नैसर्गिक आनंदातिरक का जीवन जिए।  

अमरीका हमसे तो अपने सैकड़ों उपग्रह एक साथ छुड़वा रहा है और स्वयं मानव जाति को और अमरीका को मानव समाज में सबसे आगे रखने वाले शोधों में जुटा है।

अमरीका की विज्ञान अकादमी ने इसी 14 फरवरी को जीन एडिटिंग तकनीक में महारत हासिल करने का एलान कर दिया है।

हम सैंतालीस साल पुरानी आईवीएफ़ तकनीक पर अब कूद-फांद मचाने लगे हैं और अमरीका आईसीएसआई तकनीक को कंठहार बना रहा है। आईवीएफ़ यानी इनविट्रो फर्टिलाइजेशन। आईसीएसआई यानी इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन। आप डॉक्टर के पास गए और अपनी स्पर्म सेल को अंडे में प्रवेश करवाया और बन गए आप डैड या मॉम। नो हनीमून, फिर भी ब्लेसिंग और बून!

लब्बेलुबाब ये कि अब सेक्सुअल इंटरकोर्स और रिप्रोडक्शन दोनों का आपस में कोई लेनादेना नहीं रहेगा।

नए युग का सेक्युलरिज्म धर्म और राजनीति का अलग-अलग होना ही नहीं, सेक्स और संतानोत्पत्ति का भी अलग-अलग होना ज़रूरी हो जाएगा।

आप कहां बेटी बचाओ बेटी बचाओ की पुकार मचाए हुए हैं!

विज्ञान ने तो यहां दस्तक दे दी है कि आपको जो चाहिए वही मिलेगा। बेटी चाहो तो बेटी। बेटा चाहो तो बेटा। और वह भी ज़रूरत नहीं कि आपको किसी सुंदरी से ही। या किसी शौर्यशाली सिक्सऐप पौरुषपूर्ण पुरुष से।

अमरीका का विज्ञान अब प्रतिभा के विस्फोट वाली संतानें पैदा करेगा और हम ऐसे उपग्रह बनाएंगे जो अमरीका के बोझ को अपनी पीठ पर लादकर अंतरिक्ष में सफलता से स्थापित करेंगे और अमरीका हमारी पीठ वैसे ही थपथापाएगा, जैसे किसी सामंतकालीन समाज में कोई सामंत किसी श्रमिक के भोले बच्चे से अपने पत्थर ढुलवाकर शाबाशियां बांटता है! वह बच्चा गुड़ की एक भेली में वह काम करके पूरे गांव में उस शाबाशी को बिखेरता फिरता है, जो उसे सामंत साहब ने दी होती है! गली-गली गाता फिरता है, देखो मैंने अपनी पीठ पर लादकर उनके 104 उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित कर दिए।

हम कब पश्चिमी देशों की छलनाओं और प्रवंचनाओं से पार पाएंगे? महाराज, ज़रा आगे बढ़ो। विज्ञान के पथ पर चलो। आधुनिक सोच को साधो और नव युग के नव संस्कारों का वरण करो। नहीं तो अंतरिक्ष पर पहुंचकर भी हम अपनी पीठ पर दासता ही ढोते रहेंगे!

* वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन अपनी बेबाक राय और सटीक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. यह टिप्पणी उनकी फेसबुक वॉल से ली गई है.
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