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कविताः तू किस अधिकार से चरखे से फोटो जोड़ आया था

कविताः तू किस अधिकार से चरखे से फोटो जोड़ आया था नई दिल्लीः राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी कहा था, 'खादी वस्त्र नहीं विचार है.' और जिन लोगों को विचारों पर भरोसा ही न हो वह क्या करें.

चाटुकारिता और दिखावे के इस दौर में जब खादी ग्रामोद्योग के वार्षिक कैलेंडर से बापू की तस्वीर की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगा दी गई तो पूरे देश में सोशल मीडिया पर इसके पक्ष और विपक्ष में प्रतिक्रिया चल पड़ी.

सरकार समर्थकों ने कहा कि पहले भी बापू की फोटो हटी थी, तो हरियाणा के विवादास्पद बयान देकर सुर्खियां बटोरते रहने वाले एक मंत्री ने मोदी को महात्मा से बड़ा ब्रांड बता दिया.

इस बीच एक अमेरिकी कंपनी के गांधी जी की तस्वीर वाली चप्पल बेचने की बात भी सामने आई है. बापू क्या थे, क्या हैं पर आईंसटीन की यही युक्ति काफी है, कि आने वाली पीढ़ियां बड़ी मुश्किल से यह विश्वास कर पाएंगी कि इस धरती पर कोई हाड़मांस से बना ऐसा भी व्यक्ति था.

फिलहाल सोशल मीडिया से ऐसी ही एक प्रतिक्रिया कविता के रूप में 'व्हाट्स ऐप' पर यों आईः

तू किस अधिकार से चरखे से
फोटो जोड़ आया था?
वो बैरिस्टर बड़े घर का
सभी कुछ छोड़ आया था।

कभी कुर्ता तेरा मैला,
और अब है, सूट लाखों का,
वो धोती बांध कर; रूह-ए-वतन
झकझोड़ आया था।

गरीबों के लहू से
हाथ रंगे हैं तेरे, अब तक,
अहिंसक रहके वो
फौज-ए-फिरंगी मोड़ आया था।

तेरी सियासत की रोटी
सिकती है दंगे भड़कने पर,
वो दंगे रोकने को
रोटी-पानी छोड़ आया था।

तेरी बातों से सदियों के
बने रिश्ते बिखरते हैं,
वो गंगा और जमुना के
किनारे जोड़ आया था।

अकड़ की इन्तेहां देखो
के नपवाता है छाती तक,
वो दुर्बल-सा, गुरूर-ए-तख्त-ए-शाही
तोड़ आया था।

- टी-एच- खान
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