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काला धन बनाम बड़े नोटों की वापसीः आर्थिक प्रशासन या राजनीतिक निर्णय (पार्ट-2)

काला धन बनाम बड़े नोटों की वापसीः आर्थिक प्रशासन या राजनीतिक निर्णय (पार्ट-2) काली मुद्रा के बाद काला धन का मुद्दा सामने आता है. प्रधानमंत्री के समक्ष यह सबसे गंभीर चुनौती के रूप में खड़ा है. काली मुद्रा का सफाया करना तो फिर भी आसान है, परन्तु काले धन की सफाई करना बेहद कठिन और दुष्कर कार्य है.

आज प्रधानमंत्री ने साफ़ साफ़ संकेत दिया है कि अब अगला निशाना काला धन हीं है. परन्तु मेरी समझ यह कहती है कि मोदी जी ‘ कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना ‘ वाले कहावत को एक बार फिर चरितार्थ करेंगे. बात शुरू करने के पहले पुनः कुछ बातें स्पष्ट हो जानी चाहिये.

१.    काला धन क्या होता है?
२.    काले धन की समस्या भारत में कब से है?
३.    अर्थव्यवस्था को यह कैसे प्रभावित करता है?
४.    क्या काला धन केवल बेईमानों द्वारा हीं बनाया जाता है अथवा तथाकथित ईमानदार लोग भी ऐसा करते हैं?
५.    काल धन और भ्रष्टाचार आपस में कैसे जुड़े हैं?
         
     यहाँ पर मैं बेहद कानूनी न होकर धारणा के आधार पर कहना चाहूंगा.वह सम्पति जो मान्य एवं प्रचलित कानून से हटकर अर्जित की जाय, काला धन की श्रेणी में आएगा. परन्तु कोई जरूरी नहीं है कि वह धन भ्रष्टाचार या गलत आचरण के द्वारा अर्जित हो. कभी कभी कानूनों की अल्प जानकारी या उचित जानकारी के अभाव में भी काला धन बनते देखा गया है. फिर भी जब अपनी मान्य क्षमता की अपेक्षा बहुत ज्यादा धन एकत्रित हो जाता है तो सवाल खड़ा होना लाजमी है. और ऐसा होना भी चाहिए.

दरअसल भारतीय संस्कृति का मूल चरित्र थोडा उद्दात स्वभाव का है. यदि अंकुश न लगाया जाय तो अतिरेक होने की सम्भावना बनी रहती है. इसके पीछे कोई जानबूझकर उठाया गया कदम कम और बहाव के साथ बहने की आदत ज्यादा होती है.

पिछले 70 वर्षों में या यों कहें अंग्रेजों के आने के बाद से हीं, याऔर भी दूसरे शब्दों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के आने के पश्चात् यह एक समस्या के रूप में सामने आता है. राजशाही व्यवस्था में केवल कुछ लोगों को यह एक विशेषाधिकार के रूप में प्राप्त था, लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सबका विशेषाधिकार बन जाता है.

शायद इसीलिए लोकतंत्र का मूल मंत्र होता होगा , “ सभी समान हैं ”तथा सभी को “ क़ानून का समान संरक्षण “ प्राप्त होगा. लोकतान्त्रिक सत्ता का एक और ख़ास चरित्र होता है– विरोध करने वाले को या तो मिला लो या फुसला दो. 

पिछले 70 वर्ष तक यही होता रहा है. हमें अभी भी यह विश्वास नहीं हो पा रहा है कि सदियों से चली आ रही परंपरा एक झटके में कैसे समाप्त हो सकती है. यहाँ पर मेरा मंतव्य कतई मोदी जी का गुणगान करना नहीं है. बस केवल स्थापित परंपरा को कानून द्वारा कैसे ध्वस्त किया जा सकता है उसकी बानगी बता रहा हूँ.

          कानून तो पहले भी था, कानून आज भी है. फिर भी वही कानून किसी के हाथ में खिलौना बन जाता  है तो किसी के हाथ में सोना. प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ नहीं किया है जो सर्वथा अकल्पनीय हो. उन्होंने बस थोडा हटकर किया है, और यही हम पचा नहीं पा रहे हैं. काले धन को लेकर वो कौन सी योजना लेकर आते हैं, देखना बड़ा हीं दिलचस्प होगा.

अभी जिस प्रकार नकदी को लेकर अफरा तफरी मची हुई है वो कोई कम है क्या. ऐसा लग रहा है की सब कुछ ठहर सा गया है. बाजार बंद पड़े हैं. दुकानेसूनी हैं, और चेहरे पर ख़ामोशी.हर कोई इस बात की कोशिश में लगा है कि वो बेईमान साबित न हो जाय. इसलिए एक बनावटी हसीं भी वो ओढ़ा हुआ है. सभी कोई मानो इस कोशिश में लगाहुआ है कि इस यज्ञ में वह भी एक ईमानदार आहुति दे रहा है.

निश्चित तौर पर समाज का व्यापक तबका इन सब चीजों के लिए तैयार है, इसलिए नहीं कि वह क़ानून से डरता है, बल्कि इसलिए कि हमारा  बुनयादी चरित्र साफ़ - सुथरा रहना है. समय के प्रवाह और तत्समय राजनीतिक संस्कृति के साथ बह जाना मानवीय भूल के अलावा और कुछ नहीं है. तो क्या हम एक नई राजनीतिक संस्कृति को जन्म दे रहे हैं, जिसके अंतर्गत स्वाभाविक रूप में क़ानून का शासन अपना कार्य करेगा. यदि ऐसा है तो स्वागतयोग्य कदम है, वर्नाइसके भयानक दुष्परिणाम भी हो सकते हैं.

          अंग्रजों ने जिस राजनीतिक संस्कृति को प्रश्रय दिया वो सर्वथा भ्रष्टाचार एवं सांस्कृतिक पतन पर आधारित था. गाँधी ने अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज‘ में एक जगह लिखा है, “ what kind of system do you want after Independence ? The people say, “we will have our own Constitution, own flag, own song and own people.” Then Gandhi says that ”you want English system without the English people.  What substantial transformation canyou aspire in the same old system.”

यह बात आज बेहद प्रासंगिक हो गयी है. सिस्टम आज सड़कर बदबू मार रहा है. केवल सामान्य ऑपरेशन से काम नहीं चलने वाला है.  इसलिए जो भी इस सिस्टम के खिलाफ जाकर निर्णय लेता है, या तो वह नायक बनता है अथवा खलनायक. फिलहाल स्थिति मोदी जी के पक्ष में जा रही है. तो क्या काले धन के खिलाफ़ निर्णायक युद्ध का समय आ गया है? मेरे अनुसार ऐसा कहना अभी थोड़ी जल्दबाजी होगी.

मोदी जी अभी एक या दो निर्णय जनता के मन को पुनः टटोलने को लेकर ले सकते हैं. इससे ज्यादा शायद नहीं. हो सकता है कि इसी बीच वे पाकिस्तान के खिलाफ कोई निर्णायक निर्णय ले लें. नेता मोदी अभी जनता के नब्ज को पकड़ने की कोशिश करेंगे. पांच राज्यों में चुनाव आसन्न है. इसलिए भी वे फूँक-फूँक कर कदम रखेंगे. साथ ही साथ नोटबंदी की सफलता और असफलता को भी समझ लेंगे. तब तक इन्हें अगले सर्जिकल स्ट्राइक के लिए पर्याप्त समय भी मिल जाएगा.

यदि निष्पक्ष आकलन किया जाय तो इस समय भारत में राजनीतिक एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, ख़ास तौर से उत्तर भारत के राज्यों में. प्रशासनिक चरित्र कारूपांतरण पूरी तरह से राजनीतिक होचुका है. जाहिर सी बात है व्यवस्था तो चरमराएगी हीं. जातिगत आग्रह एवं धर्मगत विभेद समाज को अन्दर से पूरी तरह खोखला कर चुकेहैं. एक हल्का सा धक्का भी इसे जड़ से गिरा देगा.

यहाँ पर सवाल अब इस बात पर लेकर नहीं की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री ने सही या गलत निर्णय लिया है, अपितु चर्चा इस बात को लेकर होनी चाहिए कि वर्तमान व्यवस्थागत गंदगियों में कैसे एक सामान्य नागरिक अपना जीवन यापन कर सके.

व्यवस्था से जब भरोसा उठता है तब हमारे स्थापित मूल्य एक एक करके टूटने लगते है और विद्रोह की स्थिति बन जाती है. अभी भी पुराने मूल्यों के कुछ पैरोकार कोई कसर नहीं उठा रखे है जिससे कि यथास्थिति बनी रहे. दरअसल सामंतवाद सत्ता नहीं  वरन एक मानसिकता होती है. और यही सोच समाज में तमाम विसंगतियों को जन्म देती है.

अमीरी और गरीबी इसी अवधारणा की एक कड़ी है. मार्क्स से लेकर हाल में राल्स तक तमाम विद्वानों ने इन गुत्थियों को अपने अपने ढंग से समझने की कोशिश की, परन्तुसमाज का बना बनाया ढांचा अभी भी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है. बीच में समाजवादियों ने विशेषकर लोहिया के नेतृत्व में एक जोरदार हमला बोला, परन्तु तथाकथित समाजवादी और भ्रष्टाचारी एकनामीऔर एकरंगी हो गए. पूंजीवादी शक्तियां तो इसी का इंतजार कर रही थीं.

उदारवाद के नाम पर लूट-खसोट की ऐसी प्रणाली उपजी कि आशा नाम की कोई चीज बची हीं नहीं रह गयी है. परन्तु इतिहास गवाह है कि जब जब ऐसी स्थिति आती है, स्वयं उसी के अन्दर से एक विपरीत परन्तु बेहद शक्तिशाली बल भी उत्त्पन्न होता है, जो बने बनाये सारे ढांचे को ध्वस्त कर देता है. तो क्या मोदी उसी विपरीत बल का दूसरा नाम है? उत्तर हाँ और ना दोनों है. क्षमता तो मोदी जी में है, परन्तु समाज का ताना बाना अभी भी बहुत उलझा हुआ है. ऐसा करना उनके लिए आसान नहीं होगा. बल्कि यों कहें कि बेहद कठिन और दुष्कर होगा.

दरअसल हम अपना स्वभाव आसानी से बदलना नहीं चाहते हैं. यह हमारा स्वभाव हो गया है कि ज्यादा से ज्यादा लेनदेन नकदी में करें. ऐसा करना बिलकुल गलत नहीं है. परन्तु इस स्वभाव का फायदा दूसरे लोग बड़ी आसानी से उठा लेते हैं, और सीधी चोट अर्थव्यवस्था को पहुँचती है. इसलिए किसी के लिए भी दूसरे का स्वभाव बदलना बेहद दुष्कर कार्य है, और खासकर तब जब क़ानून की मर्यादा बिलकुल साथ खड़ी हो.

वर्तमान विकसित व्यवस्थाओं में यथा अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जापान आदि में  नकदी लेनदेन कुल लेनदेन का लगभग 5 से 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है. जबकि भारत में 50 से60 प्रतिशत के आसपास है. भारत में भ्रष्टाचार का यह एक बहुत बड़ा कारण है. सांस्थानिक भ्रष्ट्राचार से इतर प्रक्रियात्मक भ्रष्टाचार कुछ छिपा हुआ होता है और आसानी से पकड़ में नहीं आता है.

पिछले 25 वर्षों में जमीन के बेनामी सौदे, विदेशी बैंकों में काली कमाई का पैसा जमा होना, हवाला लेनदेन तथा शेयर मार्किट में पैसा लगाना इस तबके का सबसे पसंदीदा क्षेत्र रहें हैं. अमेरिका में 2007 में आयी मंदी के पश्चात भारत में काले धन की एक समानान्तर अर्थव्यवस्था स्थापित हो चुकी है. काली मुद्रा तो इस धंधे का एक छोटा हिस्सा है.

आरबीआई के अनुसार भी भारतीय अर्थव्यवस्था में काली मुद्रा का प्रवाह अर्थव्यवस्था को उतना प्रभावित नहीं कर रहा है जितना कि अन्य कारक. दरअसल नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और पूंजीपतियों और कॉर्पोरेट घरानों के बीच एक ऐसा गठजोड़ स्थापित हो चुका है कि एक प्रकार से सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था की लगाम सरकार के बजाय इनके हाथों में आ चुका है. और यही समस्या के मूल में है.

## लेखक डॉ संजय कुमार बौद्धिक समाजसेवी और लखीमपुर-खीरी में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर हैं.
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