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अक्षय के फैन्स को निराश नहीं करेगी 'रुस्तम'

जनता जनार्दन डेस्क , Aug 13, 2016, 16:55 pm IST
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अक्षय के फैन्स को निराश नहीं करेगी 'रुस्तम'
किसी सप्सेंस-थ्रिलर फिल्म के बारे में जब आपको पहले से पता हो कि वो किसी सच्ची घटना या केस पर आधारित है तो उस फिल्म के प्रति उत्सुकता-दिलचस्पी कई बार बढ़ती है तो कई बार कम भी हो जाती है। खासतौर पर ये जान कर कि अंत में कातिल के साथ क्या हुआ था।

‘रुस्तम’ के कई सारे निर्माताओं में से एक नीरज पांडे ने फिल्म की रिलीज से तीन पहले एक इंटरव्यू में यह साफ किया कि यह फिल्म 1959 के प्रसिद्ध नानावटी केस से आंशिक रूप से ही प्रभावित है। हालांकि ये बात वह फिल्म की लांचिंग के समय भी साफ कर सकते थे। तो ‘रुस्तम’ के प्रति उत्सुकता की वजह क्या हो सकती है?
 
नेवी का एक कमांडर कई महीनों बाद अपने घर लौटता है और देखता है कि उसकी पत्नी का उसके एक दोस्त के साथ अफेयर चल रहा है। वो दोनों को एक-दूजे की बांहों में देखता है और अगले दिन अपने दोस्त की गोली मार कर हत्या कर देता है। वह खुद को पुलिस को हवाले कर देता है और उस पर केस चलाया जाता है। बस...
 
निर्देशक टीनू सुरेश देसाई की ‘रुस्तम’ की कहानी इस बस... से आगे की बात करती है। ये कहानी है रुस्तम पावरी (अक्षय कुमार) की। नेवी का एक प्रभावशाली कमांडर जिस पर भारतीय सेना को नाज है। छह महीने जहाज पर रह कर वह जब एक दिन वह अपने घर लौटता है तो उसे अपनी पत्नी सिंथिया (इलियाना डिक्रूज) की अलमारी से कुछ प्रेम पत्र मिलते हैं, जो रुस्तम के दोस्त विक्रम मखीजा (अर्जन बाजवा) ने सिंथिया को लिखे थे। उसे समझते देर नहीं लगती कि उसके पीछे से सिंथिया ने क्या गुल खिलाए हैं।
 
गुस्साया रुस्तम अपनी सर्विस रिवाल्वर से विक्रम का खून कर देता है, जिसका एकमात्र गवाह है विक्रम का एक बुर्जुग नौकर। किसी को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि खून करने के बाद रुस्तम खुद को पुलिस के हवाले कर देता है और अपना जुर्म भी कूबल कर लेता है। इस पूरे मामले की छानबीन मुंबई पुलिस के सीनीयर इंस्पेक्टर विन्सेंट लोबो (पवन मल्होत्रा) को सौंप दी जाती है, जो बेहद तेज तर्रार इंसान है।
 
मामला अदालत में जाता है, जहां रुस्तम अपना केस खुद लड़ता है। इधर, रुस्तम को फांसी की सजा दिलवाने के लिए विक्रम की बहन प्रीति मखीजा (ईशा गुप्ता) मुंबई शहर के सबसे बड़े वकील लक्ष्मण खंगानी (सचिन खेड़ेकर) को ये केस लड़ने के लिए कहती है। लेकिन कोर्ट से बाहर कुछ और ही चल रहा है।
 
रुस्तम जो कि एक पारसी है, को इंसाफ दिलाने के लिए एक टेबोलाइड का संपादक इराच बिल्लिमोरिया (कुमुद मिश्रा) पारसी समुदाय के एक धनी बिजनेस मैन के पास जाता है और कहता है कि वह इस पूरे मामले में अपना समर्थन दे। देखते ही देखते इराच के अखबार में रोजाना छपने वाली खबरों से लोगों के दिलों में रुस्तम के प्रति एक हमदर्दी पैदा होने लगती है, जिससे इराच के अखबार की प्रसार संख्या में भी इजाफा होने लगता है।
 
खून रुस्तम ने किया है तो वो खुद को बेकसूर क्यों साबित करना चाहता है? अदालत में उसका ये कहना कि ये खून उसने अपने बचाव के लिए किया है, क्या ज्यूरी और जज के गले उतरेगा? आखिर सच क्या है?
 
सच केवल रुस्तम जानता है कि आखिर कत्ल वाले दिन विक्रम के कमरे में असल में हुआ क्या था? ये केवल रुस्तम ही जानता है कि इस मामले की एक कड़ी उसके सीनीयर, एडमिरल कदम (परमीत सेठी) से भी जुड़ी है, क्योंकि रुस्तम को विक्रम से उन्हीं ने तो मिलवाया था। और इंस्पेक्टर लोबो, जो मामले की जांच के लिए दिल्ली में रक्षा सचिव से मिल कर आया है, उसे वहां से क्या मिला है, जिससे पूरे मामले में एक नया मोड़ आ गया है। ये तमाम बातें अगर यहां बता दी तो इस सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म का मजा किरकिरा हो जाएगा। इसलिए बाकी बातें बड़े परदे पर।
 
करीब ढाई घंटे की इस फिल्म का लगभग 70 फीसदी हिस्सा कोर्टरूम ड्रामा के रूप में है, जहां बहस है, ज्यूरी है, एक नरम दिल जज है और तालियां बजने की गरज से लिखे गए कई सीन्स हैं। लेकिन इन सब से परे है अक्षय कुमार का अभिनय जो इस फिल्म का प्लस प्वाइंट है। उनका अभिनय काफी नियंत्रित है। खून करने के बाद यह शख्स बेह शांत है। मानो उसके दिमाग में कुछ चल रहा है। एक बार को लगता है कि मानो खून करना उसका मकसद था ही नहीं। वो तो कुछ और करना चाहता है। इन तमाम बातों से घिरे रुस्तम के किरदार को अक्षय कुमार ने काफी अच्छे से निभाया है। आप कह सकते हैं कि ‘स्पेशल 26’, ‘बेबी’ और ‘एयरलिफ्ट’ सीरीखी फिल्मों के बाद यह अक्षय के अभिनय की एक नई शुरुआत है।
 
निर्देशक बिना किसी लाग लपेट के फिल्म की गति पर अपना नियंत्रण बनाए रखा है, इसलिए ये फिल्म कहीं भी बोर नहीं करती, सोचने का मौका नहीं देता। 60 के दशक का माहौल दर्शाने के लिए साज-सज्जा, कॉस्ट्यूम्स आदि पर अच्छा काम किया गया है। हालांकि कमरों की दीवारों पर चटख रंग आंखों को चुभता है, लेकिन टीनू ने उस दौर में इस्तेमाल किए जाने वाले बॉल पेन तक पर फोकस किया है। वो ऊपर से दबा कर टक टक टक करने वाले पेन, जो अब न के बराबर देखने को मिलते हैं। ये देखना भी रोचक लगता है कि कैसे एक सनसनीखेज खबर की वजह से चार आने (25 पैसे) में बिकने वाला अखबार कैसे 50 पैसे और फिर 5 रु. में बिकने लगता है। आज भी कई ऐसे टैबलायड होंगे जो 5 रु. में नहीं बिकते होंगे।
 
कई अच्छी से अलावा फिल्म में कई बातें खटकती भी हैं। जैसे कि रुस्तम को किसी भी प्रकार की तैयारी के लिए वक्त कब मिला। उसने आफिसर जेल में जाने से मना कर दिया, लेकिन वह हमेशा अपनी वर्दी में रहा। प्रीति का किरदार एक मौकापरस्त महिला का है, लेकिन न जाने क्यों वह हमेशा कुछ दिखाने को ‘उतारू’ सी रहती है। अदालत में उसका पहनावा ऐसा है, जैसे कि वह किसी पार्टी से आ रही हो। प्रीति के पास इतना समय है कि वह अपने भाई की मौत की खबर सन कर बाकायदा कपड़े बदल कर मौका-ए-वारदात पर आती है, चटख रंग की लिपिस्टिक के साथ। यहां निर्देशक ने सिनेमाई स्वतंत्रता का अनावश्यक फायदा उठाया है जो अखरता है।
 
बावजूद इसके ‘रुस्तम’ एक मजेदार फिल्म है। अगर आप भी अक्षय कुमार की चिर-परिचित छवि से परे एक रोचक फिल्म देखना चाहते हैं तो यह फिल्म आपको पसंद आएगी।
 
कलाकार: अक्षय कुमार, इलियाना डिक्रूज, ईशा गुप्ता, अर्जन बाजवा, पवन मल्होत्रा, कुमुद मिश्रा, परमीत सेठी, सचिन खेड़ेकर, ऊषा नडकर्णी,
 
निर्देशक: टीनू सुरेश देसाई
निर्माता: नीरज पांडे, अरुणा भाटिया, आकाश चावला, नितिन केनी
संगीत: अंकित तिवारी, जीत गांगुली, राघव सच्चर
लेखक : विपुल के. रावल
गीत: मनोज मुंतशिर
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