Monday, 09 December 2019  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

एम सी डी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता और दाखिला बढ़ाने के प्रयास

Anshu Kumari , Jul 17, 2016, 12:32 pm IST
Keywords: एमसीडी स्कूल   शिक्षा की गुणवत्ता   दाखिले   SDMC School   Primary education   Quality of Education  
फ़ॉन्ट साइज :
एम सी डी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता और दाखिला बढ़ाने के प्रयास
एक ओर जहां देश की राजधानी दिल्ली में MCD के स्कूलों में अनुबंधित शिक्षकों की पुनर्नियुक्ति के लिए  शिक्षक संगठनों के बीच आपस में होड़ मची है और धरना प्रदर्शनों का दौर जारी है वहीं दूसरी ओर हम आपको एक ऐसे नायक से मिलवा रहे हैं जिनके प्रयासों की तरह अधिकांश शिक्षक  कोशिश करें तो अनुबंधित शिक्षकों की पुनर्नियुक्ति नहीं बल्कि स्थायी नियुक्ति का रास्ता खुल सकता है।
 
ये नायक हैं मनोज कुमार, दिल्ली नगर निगम विद्यालय, मटियाला के अध्यापक जिनके  एकल प्रयास से पिछले वर्ष गर्मी की छुट्टियों के दौरान लगभग 40 छात्र छात्राओं का दाखिला हुआ है।

मनोज जी ने  जब दाखिले का अभियान चलाया तो मटियाला गांव के पास कबाड़ी बस्ती और आस पास के क्षेत्र में अनेक ऐसे बच्चों को पाया जिनके अभिभावक और ये बच्चे खुद कबाड़ चुनने के काम में लगे थे। पढ़ने लिखने की सोच उनकी कल्पना से काफी दूर थी।

इन बच्चों के अभिभावकों को समझा कर स्कूलों में दाखिले के लिए तैयार करना एक बड़ी चुनौती से कम नहीं क्योंकि ये बच्चे परिवार के कमाऊ सदस्य होते हैं। सुबह से शाम तक कबाड़ चुनकर जितनी राशि ये बच्चे जुटा पाते हैं वह परिवार के खर्चों को चलाने में काफी सहायक होती है। कुछ ऐसी बच्चियां जो कबाड़ तो नहीं चुनती लेकिन जब इनके माता पिता काम पर जाते हैं तो घर में रहकर अपने से छोटे बच्चों की देखभाल करना इनकी जिम्मेदारी में शामिल होता है। 

एक अध्यापिका होने के नाते मैं यह अच्छी तरह जानती हूं कि मेरी कक्षा में पढ़नेवाली कई बच्चियों को अपने से छोटे बच्चों को किस तरह संभालना पड़ता है और कई बार स्कूल छोड़ने के लिए विवश भी होना पड़ता है। 

  इससे मिलती जुलती कहानी अपने अनुभव के दायरे में आप भी पा सकते हैं यदि आप शिक्षक या शिक्षिका हैं और अपने छात्र छात्राओं के परिवार और उनकी माली हालत के बारे में नजदीक से जानने की कोशिश करें।

मनोज जी को इन बच्चों के  दाखिले के लिए कई स्तरों पर जूझना पड़ा, पहली चुनौती यदि बच्चों को पढ़ने के लिए तैयार करना था तो दूसरी इससे बड़ी चुनौती स्कूल प्रशासन को इन बच्चों के नामांकन के लिए सहमत करना था क्योंकि इनके पास अपनी पहचान , बच्चों की उम्र के लिए सर्टिफिकेट और निवास स्थान की पुष्टि  के लिए कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं था।

लेकिन इन सब चुनौतियों को पार करते हुए जब दाखिले शुरु हुए और मनोजजी ने अपने प्रयासों की जानकारी फेसबुक पर रखनी शुरु की तो इन्हें हतोत्साहित करने वाले और मजाक उड़ाने वालों की भी कोई कमी नहीं थी। अपने कुछ करीबी मित्रों ने भी इनकी जम कर खिल्ली उड़ाई।
 
लेकिन मनोज अपने निश्चय से नहीं डिगे और लगातार अपने अभियान में जुटे रहे।  छुट्टियां समाप्त होने तक लगभग चालीस बच्चों का दाखिला हो चुका है। इन बच्चों की कापी पेन्सिल किताब , और वर्दी का इंतजाम भी इन्होंने अपने एक मित्र के साथ मिल कर किया । 
इन बच्चों के दाखिले को लेकर अभी भी कुछ उलझने हैं मसलन लाडली योजना के तहत इनका नामांकन कैसे हो ....जब कोई दस्तावेज नहीं है... बैंकों में खाता कैसे खुले .....आदि आदि। 
लेकिन हर उलझन का जवाब सुलझेगा और कोई ना कोई रास्ता निकलेगा जरूर यदि हम इमानदारी से कोशिश जारी रखें।

आज मनोज जी की कहानी यहां आप सबके सामने रखने के दो उद्देश्य हैं पहला कि हम अपने वास्तविक नायकों की पहचान करें और उनके प्रयासों की सराहना खुल कर करें और दूसरा कि हम शिक्षक एक दूसरे की आलोचना छोड़ कर अपने मुख्य काम अध्यापन पर ध्यान दें।

अनुबन्धित शिक्षकों की पुनर्नियुक्ति एक ऐसा मसला है जो तब तक जारी रह सकता है जब तक हमारे स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या इसी तरह साल दर साल घटती रहेगी। नयी नियुक्तियां तब तक रुकी रह सकती हैं जब तक हमारे स्कूलों में शिक्षा का स्तर फिर से अपने पुराने गौरव को नहीं प्राप्त कर लेता है। 
आज हमारे प्राथमिक स्कूलों में दाखिले के लिए अधिकतम ऐसे आर्थिक वर्ग के छात्र छात्रा आ रहे हैं जिनके माता पिता प्राइवेट स्कूल की फीस नहीं चुका सकते।
 जाहिर सी बात है कि हमारी साख आज की तारीख में कमजोर पड़ती जा रही है। ऐसा नहीं कि हम शिक्षक योग्य नहीं हैं लेकिन हमारे विद्यालयों में पठन पाठन का स्तर क्या है यह किसी से छिपा नहीं है। क्यों है इसकी भी छानबीन हमें ही करनी चाहिए और इसका निदान भी हमें ही ढूंढना होगा। 
दिल्ली के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में गिने चुने स्कूल ऐसे होंगे जहां हम शिक्षक अपने बच्चों को शान के साथ पढ़ाने के लिए भेजने की सोचे, इस विश्वास के साथ कि मेरा बच्चा किसी भी प्राइवेट स्कूल से बेहतर शिक्षा पाएगा।

क्या आपकी नजर में है कोई ऐसा स्कूल.......

जबकि इन स्कूलों में काम करने वाले नब्बे  प्रतिशत से अधिक शिक्षक इन्हीं सरकारी विद्यालयों में पढ़कर आज सरकारी नौकरी कर रहे हैं।
मेरा सीधा आह्वान अपने सभी शिक्षक संगठन से है कि हम शिक्षक हित में जितनी गंभीरता से मुद्दों को उठा रहे हैं उसकी दोगुनी गंभीरता से शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए साथी सहकर्मियों को प्रेरित करें क्योंकि तभी हमारे स्कूलों में फिर से छात्रों की भीड़ लौटेगी और तभी अधिक से अधिक शिक्षकों को नौकरियां मिलेंगी। 

  तब अनुबंधित पद के लिए बार बार हर साल नहीं बल्कि स्थायी पद के लिए हम एक बार आन्दोलन पर उतरेंगे और जीत सुनिश्चित होगी। अभी जैसी आपसी होड़ की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी क्योंकि शिक्षक संगठन की आवाज में दम होगा और लोगों में हमारे प्रति सहानुभूति भी अधिक होगी। 
ऐसे में स्कूलों में दाखिला दिलाने वाले  नायकों की पहचान, उन्हें प्रोत्साहन और शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए सघन प्रयास वक्त की मांग है। ऐसे कई नायकों की जरूरत है जो अध्ययन अध्यापन के लिए सजग और गंभीर हैं।
 
 
 
वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
सप्ताह की सबसे चर्चित खबर / लेख
  • खबरें
  • लेख
 
stack