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डिग्री की रेलमपेल, 'शिक्षा' फेल

श्रेष्ठ गुप्ता , Mar 12, 2016, 15:59 pm IST
Keywords: Jobs race   Indian education system   School education   Indian school   शिक्षा व्यवस्था   भारतीय स्कूल   पढ़ाई माफिया  
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डिग्री की रेलमपेल, 'शिक्षा' फेल उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के बाहर एक दुबले-पतले व्याकुल से दिखने वाले लड़के प्रताप सिंह ने बीबीसी से बातचीत के दौरान नकल के बारे में एक बात कही थी कि, "यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है! नकल करना हमारा पैदाइशी हक़ है।" भारत के इस हिस्से में विश्वविद्यालय के परीक्षा तंत्र में भ्रष्टाचार आम बात है। पैसे वाले परीक्षा में पास होने के लिए घूस दे सकते हैं। युवाओं का एक पूरा वर्ग है जो बेचैन छात्रों और लालची प्रशासन के बीच दलाल का काम करते हैं। प्रताप कहते है छात्रों का एक और वर्ग है जिसे उनके राजनीतिक संपर्कों की वजह से स्थानीय स्तर पर बहुत अच्छी तरह से लोग जानते हैं और परीक्षक उन्हें हाथ लगाने की हिम्मत नहीं करते। मैंने सुना है कि स्थानीय गुंडे कई बार परीक्षा केंद्र में अपनी डेस्क पर छुरा निकालकर रख देते हैं। परीक्षक के लिए यह साफ़ संकेत है, 'यहां से दूर ही सहो.... वरना'.. तो, जब राजनीतिक प्रभाव और पैसे वाले नकल कर सकते हैं तो गरीब छात्र क्यों नहीं?

देश में पढ़ाई और परीक्षा की मौजूदा व्यवस्था को देखें तो पाएंगे की बच्चे ज्ञान और शिक्षा के लिए कम, परीक्षा में अच्छे नंबर के लिए ज्यादा पढ़ते है। दरअसल, इसमें गलती उन बच्चों की भी नहीं है। हमारे आसपास के लोग या कहे समाज बच्चों के मन में यह बात शुरुआत में ही डाल देते है कि परीक्षा में अच्छे नंबर लाना है ताकी वो उच्च शिक्षा और नौकरी में आगे बढ़ सकेगा। इस तरह शिक्षा व्यवस्था का कुल मकसद परीक्षा में अच्छे अंकों से पास कराने तक सीमित रह जाता है, और इस मकसद को पाने के चक्कर में बच्चें के जीवन में पढ़ाई का उद्देश्य दुनिया-जहान के बारे में एक ठोस समझ पैदा करना न बन कर इस बात पर टिक जाता है कि बचपन से किशोरावस्था तक बच्चे हर परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होते रहें, ताकि बड़े होने पर वे एक ठीक-ठाक नौकरी पा सकें, आईआईटी-आईआईएम जैसे नामी औऱ बड़े संस्थानों में पढ़ाई कर सकें, या विदेशों आदि विकसित देशों का रुख कर सकें । अच्छे नंबरों की नींव पर मिलने वाली कामयाबी और जीवन में तरक्की का एक ऐसा मिथक देश में तैयार हो गया है कि हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था उसके पीछे कदम से कदम मिला रही है।

देखा जाए तो इस शिक्षा व्यवस्था के पीछे उन संस्थानों का योगदान है, जो सिर्फ कागज के टूकड़ों में ही दर्ज हैं। साथ ही उन शिक्षकों का भी जो शिक्षा के क्षेत्र  को एक पेशा या कहें बनाते जा रहें है। शिक्षक अयोग्य हों और पाठ्यक्रम ठीक से पूरा न हो, तो फिर परीक्षा में सख्ती कितनी न्यायोचित होगी, यह विचारणीय प्रश्न है। दूसरा पहलू लड़कियों की सामाजिक स्थिति से जुड़ा है। अब गांवों में भी शादी के लिए आजकल कम-से-कम मैट्रिक पास दुल्हनों की मांग है पर लड़कियों को स्कूल की रसोई और घर के कामों में उलझा रखा है। तो लड़कियां किसी तरह पास हो जाएं, इसके लिए अभिभावक जान जोखिम में डाल कर उन तक पर्चियां पहुंचाते हैं, और जब ऐसा करने को सामाजिक मान्यता मिली हुई हो तो फिर सरकार कितनी लाचार रहती है, यह पिछले साल बिहार में हुए परिक्षा के नकल के दौरान, बिहार के शिक्षा मंत्री पीके शाही के बयान से भी जाहिर हुआ कि, “14 लाख छात्र परीक्षा दे रहे हैं। बच्चों के अभिभावक, परिवार या रिश्तेदार ही नकल करवा रहे हैं। इसे रोकना सरकार के बूते में नहीं है।” तो उपाय क्या है? परीक्षा को विषयनिष्ठ बना कर किताबों को साथ रखने की इजाजत देने का सुझाव दिया गया है। बहरहाल, यह समस्या को सिर्फ ऊपरी तौर पर देखना है।

शिक्षा तंत्र की जो तमाम बीमारियां हैं, डिग्रियों-प्रमाणपत्रों का फर्जीवाड़ा उसकी एक छोटी-सी मिसाल है। पिछले साल दिल्ली के पूर्व कानूनमंत्री जितेंद्र तोमर की फर्जी डिग्री मामले में गिरफ्तारी हुई थी। उस समय भी यह सवाल जोर-शोर से उठा था कि फर्जी डिग्री लेने या नकल से परीक्षा पास करने में आखिर फर्क क्या है, क्योंकि दोनों ही तरीकों से एक अयोग्य व्यक्ति शिक्षा तंत्र को ठेंगा दिखाते हुए उसका मखौल उड़ाता है। हालात सिर्फ अपने ही देश का नहीं बल्कि पड़ोसी मुल्क का भी है पाकिस्तान के कराची में स्थित कंपनी एग्जेक्ट सॉफ्टवेटर को करोड़ों डॉलर के फर्जी डिग्री घोटाले में लिप्त पाया गया था। दावा किया गया था कि यह कंपनी कई प्रतिष्ठित देशी-विदेशी विश्वविद्यालयों की डिग्रियां ऑनलाइन बेचती थी।

देश में सैकड़ों कॉलेज-विश्वविद्यालय बिना मान्यता के चल रहे हैं और उनकी सत्यता की जांच का जिम्मा उन्हीं लोगों पर छोड़ा गया है जो उनमें पढ़ना चाहते हैं या उनकी डिग्रियां लेना चाहते हैं। 2015 में इसी कारण यूजीसी की तरफ से देश में मान्यताप्राप्त कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की सूची उसकी वेबसाइट पर प्रकाशित की गई है। एक बड़ी समस्या यह भी है कि देश में कई नामी तकनीकी संस्थान किसी विश्वविद्यालय की संबद्धता के बगैर चलते रहे हैं। एमटेक, एमफार्म, बीटेक, एमसीए जैसे कोर्सों में दाखिला लेने वाले छात्रों को कई बार यह जानकारी काफी देर से मिल पाती है कि जिस कोर्स में और कॉलेज में उन्होंने दाखिला लिया है, वह किसी विश्वविद्यालय से जुड़ा हुआ नहीं है। ऐसा एक बड़ा मामला साल 2014 में उत्तर प्रदेश में सामने आ चुका है।

यूपीटीयू यानी उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी ने यह पाया था कि प्रदेश के एक सौ दस इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट संस्थान बिना किसी संबद्धता के चल रहे थे, हालांकि उन्होंने सत्र 2013-14 में करीब पच्चीस हजार छात्रों को विभिन्न कोर्सों में दाखिला दिया था और इसके बदले भारी फीस ली थी। यह भी देखा गया है कि प्रशासन और परीक्षा कराने वाली व्यवस्था फर्जी डिग्री, नकल के दोषियों और परचा लीक कराने वालों को कड़ी सजाएं देने में नाकाम रही है। नाम की सजाओं से ऐसे लोगों का हौसला बढ़ता है। कहीं न कहीं, इसके लिए खुद हमारा समाज भी दोषी है जो जीवन में आर्थिक सफलता को ही सबसे ज्यादा तवज्जो देता है, उसके लिए व्यक्ति के गुणों का कोई मोल नहीं है।

# श्रेष्ठ गुप्ता टीवी पत्रकार हैं। फेसबुक समेत तमाम सोशल नेटवर्किग साइटों सहित ब्लॉगिंग की दुनिया में 'चौपाल: श्रेष्ठ की कलम से' नाम से सक्रिय हैं।
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