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नहीं रहे जाने माने कवि व पत्रकार पंकज सिंह

नहीं रहे जाने माने कवि व पत्रकार पंकज सिंह मुजफ्फरपुर: समकालीन हिंदी कविता के सातवें दशक के महत्वपूर्ण कवि पंकज सिंह का हृदय गति रुकने से शनिवार को निधन हो गया. मुजफ्फरपुर के पंकज सिंह लंबे समय से दिल्ली में ही रह रहे थे. वे 67 वर्ष के थे. उन्होंने शनिवार की दोपहर पत्नी सविता सिंह से सिर दर्द की शिकायत की थी.

इसके बाद उन्हें नोएडा के एक अस्पताल में भरती कराया गया, जहां उनका निधन हो गया. रामबाग के रहनेवाले पंकज की प्रारंभिक पढ़ाई मुजफ्फरपुर में हुई. यहां ये लंबे समय तक नवगीत के रचनाकार कवि राजेंद्र प्रसाद सिंह के साथ साहित्य  सर्जना करते रहे.

पंकज सिंह  हिंदी कविता के क्षेत्र में बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाले महत्वपूर्ण कवियों में जाने जाते थे. नक्सलबाड़ी दौर में इन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से उस यथार्थ को प्रकट किया था. कवि पंकज के तीन कविता संग्रह आहट आसपास, जैसे पवन पानी व नदी पूर्व में प्रकाशित हो चुकी है. हालांकि राजकमल प्रकाशन ने फिर से तीनों काव्य संग्रह प्रकाशित किया है. कवि पंकज सिंह ने अनेक बार विदेश यात्राएं की थी.

काफी समय उन्होंने जर्मनी में भी बिताये. अनेक पत्रिकाओं का उन्होंने संपादन भी किया था. काफी दिनों बाद एक महीने पहले पंकज सिंह मुजफ्फरपुर आये थे. यहां उन्हें राम जीवन शर्मा जीवन सम्मान से सम्मानित किया गया था. प्रवास के दौरान उन्होंने अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान समारोह में भी बतौर मुख्य अतिथि अपना वक्तव्य दिया था.

बात 2001 की है. उन दिनों में एक राष्ट्रीय अखबार में जूनियर सब एडिटर पद पर काम करता था. हिंदी साहित्य का छात्र रहा तो किताबों और उन्हें लिखने वालों में खास दिलचस्पी थी. मित्र मंडली और सीनियर भी ऐसे ही लोग थे जो किताबों की दुनिया से सरोकार रखते थे. ऐसे ही हमारे एक मित्र ने एक दिन बताया की समयांतर का सालाना समारोह का मौका है, और उसमें अधिकतर बड़े नाम नजर आएंगे. मैंने भी वहां जाने के लिए कहा तो उन्होंने तुरंत हां कर दी.

9 दिसंबर की शाम मैं वहां अपने सभी मित्रों के साथ पहुंच गया जो पंकज बिष्ट की पत्रिका से जुड़े थे. अक्सर साहित्यकारों की मंडली से कन्नी काटने वाला मैं आज अपने कई पसंदीदा साहित्याकारों से मिलने की खुशी में था. दिसंबर की शाम धुंधलकी हो चली थी, और अंधेरा भी थोड़ा गहरा गया था. लेखकों के आने का सिलसिला भी शुरू हो गया.

मुलाकात राजेंद्र यादव से हुई. उन्हें देखकर अच्छा लगा, फिर असगर वजाहत, मैत्रेयी पुष्पा और पंकज बिष्ट सबसे मिला. सब ही बोलने में मजेदार थे. सब को पढ़ रखा था, जिससे मिलने का मजा दोगुना था. सबसे ज्यादा ध्यान जिस लेखक ने खींचा वह नाम पंकज सिंह का था. उस समय तक मैंने उनकी एक कविता तक नहीं पढ़ी थी. उनका नाम यदा-कदा दोस्तों से सुना था. लेकिन पढ़ा कुछ नहीं था.

मैं समयांतर के इस अंक पर सबसे हस्ताक्षर ले रहा था ताकि यह शाम यादगार बन सके. तो जब मैं पंकज सिंह के पास गया तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में, हंसते हुए और बुलंद आवाज में मेरा नाम पूछा, और किताब पर अपने साइन करके, मेरे पीठ पर प्यार से थपकी दी और मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा कि कभी फुरसत हो तो मिलना. मुझे बहुत अच्छा लगा. जहां सभी लोगों ने बड़ प्यार से मेरा नाम पूछकर सिर्फ साइन कर दिए थे वहीं पंकज सिंह का मेरे पीठ पर हाथ रखना और मिलने के लिए कहना, जादुई असर कर गया.

फिर एक दिन मैंने कहा देखें उन्हें मेरा नाम याद है कि नहीं. मैंने उन्हें फोन किया और नाम बताया तो उन्होंने तुरंत मुझे पहचान लिया. मैंने मिलने के लिए कहा, तो उन्होंने कहा कि कभी भी पहले बताकर आ जाना. कुछ दिन बाद उनसे टाइम लेकर मैं पहुंचा. जैसे ही मैं मयूर विहार के ईस्ट स्टैंड में स्थित उनके घर पर पहुंचा तो उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से मेरा अभिवादन किया. बाहर हल्की बारिश हो रही थी. वहां मैं बैठा तो बारिश और जोरों की होने लगीं. वे कविता और मार्क्सवाद को लेकर बातें करने लगे. उन्होंने मुझसे चाय के लिए कहा तो मैंने हां कर दी. चाय आई तो मेरे पसीने छूट गए. काली चाय थी, जो मुझे कतई पसंद नहीं थी, फिर पंकज सिंह ने कहा कि इसमें नींबू डाल लो मजा दोगुना हो जाएगा. मैंने डाल लिया तो जबरदस्त कल्चरल शॉक लगा. मैं मलाई वाली चाय पीने वाला इंसान वह चाय नहीं समझ सका. जैसे-तैसे वह गिलास गटक गया.

शायद वे इस बात को समझ गए तो उन्होंने कहा कि अच्छी नहीं लग रही तो रहने दो. मैंने कुछ नहीं बोला और चाय खत्म कर दी. उनके चेहरे पर मुस्कान थी, और हां उन्होंने चाय नहीं पी थी क्योंकि उनके दांत से खून आ रहा था.

उसके बाद मेरे करियर से लेकर उनके सफर के बारे में ढेरों बातें हुईं. उन्होंने मुझे थोड़ा परेशान देखकर कई हौसले बढ़ाने वाली बातें कहीं, और तीन चार कविताएं भी सुनाईं. लेकिन भविष्य से जुड़े कई संशयों के साथ मैं वहां बैठा था, और शायद इसी वजह से उनकी कविता “भविष्यफल” का शीर्षक मेरे जेहन में जिंदा रह गया. जिसकी पंक्तियां कुछ इस तरह हैः कोई एक अक्षर बताओ/कोई रंग/कोई दिशा/किसी एक फूल का नाम लो कोई एक धुन याद करो/कोई चिड़िया/कोई माह--जैसे वैशाख/खाने की किसी प्रिय चीज़ का नाम लो कोई खबर दोहराओ/कोई विज्ञापन/कोई हत्या--जैसे नक्सलियों की/किसी एक जेल का नाम लो कल तुम कहाँ होंगे/मालूम हो जाएगा… “शरद के बादल” लिखने वाले पंकज सिंह ने अपने जाने का समय भी शरद ही चुना और हिंदी कविता की एक बुलंद आवाज आज शरद के धुंधलके में कहीं खो गई...

(पंकज सिंह का जन्म 22 दिसंबर, 1948 में बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ था. वे बीबीसी में काम कर चुके थे, और उन्हें 2007 के शमशेर सम्मान से नवाजा जा चुका था. आहटें आसपास और जैसे पवन पानी उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं. 26 दिसंबर को वे दुनिया को अलविदा कह गए)
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