अरुण प्रकाशः जिनके लिए नए, पुराने कथाकार एक से थे

अरुण प्रकाशः जिनके लिए नए, पुराने कथाकार एक से थे तो तीन साल हो गए उन्हें गए. जीवन की आपाधापी में हरदम मिलना हो या नहीं, पर यादों पर किसका बस. आज ही की तारीख यानी 18 जून, 2012  को वरिष्ठ कथाकार अरुण प्रकाश का नई दिल्ली में निधन हो गया था. वह हमारे और हमारे जैसे युवाओं के लिए क्या थे, इसे वही जानता होगा, जो उनसे कभी मिला हो. जनता जनार्दन.कॉम और उससे जुड़े लोगों से उनके संबंधों की बात क्या करूं, पर 2012 जब भैया के निधन की सूचना मिली थी, तो फेसबुक पर यह लिखा था.

" अरुण प्रकाश जी से पहली मुलाकात 1996 में हुई थी। वह लोगों से मेरा परिचय बतौर युवा कवि कराते थे और इस बात पर मेरी उनसे हमेशा ही अनबन होती थी। मैं कहता था कि मैं कहां से आपको कवि दिखता हूं। न मैंने कविताएं लिखी हैं। लेकिन वह कहते थे कि अरे क्‍या हुआ लिख लोगे। और जितनी लाइनें लिखी हैं वह कम तो नहीं हैं। मुझे याद है जब वह साहित्‍य अकादमी की पत्रिका के संपादक बने और मैं पहली बार उनसे मिलने अकादमी गया तो उन्‍होंने वहां भी अपने स्‍टाफ से मेरा परिचय बतौर युवा कवि ही कराया था।

" अरुण जी से मेरा परिचय जय प्रकाश पांडेय ने कराया था। उसके बाद हम लोग कभी कभार उनके दिलशाद गार्डन वाले घर में भी जाने लगे थे। उसके बाद मैं यदा कदा उनसे फोन पर बातें कर लिया करता था। अगले ही साल 1997 में मैंने पूर्व प्रधानमंत्री स्‍वर्गीय चंद्रशेखर की पत्रिका यं‍ग इंडियन में ज्‍वाइन कर लिया। यंग इंडियन का हिंदी संस्‍करण शुरुआती दौर में अंग्रेजी का अनुवाद ही हुआ करता था। सो मुझे अनुवाद कराने के लिए कई बार उनकी मदद की जरूरत पड़ी और उन्‍होंने कभी इंकार नहीं किया।

" कुछ ही समय बाद यंग इंडियन आजादी के पचास साल के अवसर पर हमने यंग इंडियन में कुछ विशेषांक निकालने की सोची। मैंने अरुण भाई साहब से आग्रह किया कि वह आजादी के पचास साल और हिंदी साहित्‍य पर कुछ लिखें। शुरुआती संकोच के बाद उन्‍होंने मेरा आग्रह स्‍वीकार कर लिया और अपना वह लंबा लेख मुझे सही समय पर भेज दिया। बाद के सालों में जब मैंने दैनिक हरिभूमि में काम करना शुरु किया तो कुछ विशेष आयोजन पर उनसे लिखवाया।

" कुछ साल और गुजरे और वह साहित्‍य अकादमी की पत्रिका में संपादक हो गए। वहां भी मैं उनसे मिलने सिर्फ तीन ही बार गया। उसके बाद बस फोन पर बातचीत होती थी। मिलने का सिलसिला कायम नहीं रह सका। मुझे याद है जब मैंने हरिभूमि के एक रिपोर्टर को उनका फोन नंबर देकर उनका इंटरव्‍यूह लेने के लिए कहा था तो उन्‍होंने उससे कहा था कि अनिल को कहना कि मैं मिलना चाहता हूं।

"मुझे याद है अरुण जी से वह आखिरी मुलाकात जब वह मुझे पत्रकारिता और लेखन की बारिकियां समझाते समझाते अचानक अखबार का लेआउट कैसा हो, इस चर्चा पर उतर आए थे। इस दौरान उन्‍होंने मुझे यूरोप के कई अखबारों का हवाला देते हुए बताया था कि अखबार और उसके पाठकों के लिए बेहतर लेआउट कैसा होना चाहिए। मुझे इस बात का बहुत आश्‍चर्य हुआ था कि उन्‍हें इस बारे में कितनी जानकारी है। उनकी कही कई बातें मुझे आज भी जैसी की तैसी याद हैं।

ठीक से तो याद नहीं कब लेकिन एक दिन उनका अचानक फोन आया था और कहा था कि अनिल मैं तो अब तुम्‍हारे निकट ही आ गया हूं किसी दिन आते जाते मिलने आना। ग्रीन पार्क का हवाला दिया था उन्‍होंने। उनके बीमार होने की जानकारी तो बहुत पहले से थी और इस दौरान मुलाकात भी हुई थी। लेकिन उनके आईसीयू में दाखिल होने की खबर गौरी नाथ से मिली।

" मुझे खेद है कि अंतिम समय में मैं इस महान कथाकार से मिल नहीं सका और इसके लिए मैं अपने को कभी माफ भी नहीं कर सकूंगा। सच तो यह भी है कि एक लंबे अरसे के बाद किसी के निधन ने मेरी आंखों को लंबे समय तक भिगोया है....आप हमारी यादों में सदैव जिंदा रहेंगे भैया...."

अरुण प्रकाश भाई साहब के व्यक्तित्व पर लिखी यह श्रद्धांजलि विश्वनाथ त्रिपाठी ने दैनिक हिंदुस्तान के लिए लिखी थी. आज के दिन उसे अक्षरशः देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा. विश्वनाथ त्रिपाठी के ही शब्दों में....

अरुण प्रकाश जिजीविषा के प्रतीक थे। उनके न रहने से एक बेहद संभावनाशील लेखक छिन गया है। अरुण प्रकाश की खास बात यह थी कि वह वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न थे। उनमें गहरी राजनीतिक और सामाजिक चेतना थी। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हिन्दी साहित्य में ऐसी गहरी सामाजिक चेतना वाले लेखक बहुत कम हुए हैं। वह लंबे समय से असाध्य बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन इस दौरान भी उनके साथ मैंने कई लंबी यात्राएं की थीं। बीमारी के दौरान अकसर ऐसा होता था कि वह एक दिन घर में बिताते थे और तीन दिन अस्पताल में। ऐसे में भी वह जीवन की ऊष्मा से लबरेज थे। दरअसल, उन्हें जीवन से प्रेम था। बेशक बीमारी के दिनों में संघर्ष काफी गहरा गए थे, लेकिन परिवार ने उन्हें संभाले रखा था। यह संतोष की बात है।

पंजाबी के लेखक हैं डॉ. मोहन सिंह, जिन्होंने सबसे पहले मुझे अरुण प्रकाश के बारे में बताया था। उन्होंने मुझसे कहा था कि मैं ‘भैया एक्सप्रेस’ कहानी पढ़ं। मैंने कहानी पढ़ी और यह कहना चाहूंगा कि पंजाब में आतंकवाद के दिनों में वहां बिहारी मजदूरों की हालत पर इसके बराबर की कोई और कहानी याद नहीं पड़ती। यह असाधारण कहानी है। इसके बाद उनकी एक और कहानी ‘जलप्रांतर’ का नाम मैं लेना चाहूंगा। बिहार में बाढ़ के संकट पर यह अद्भुत कहानी है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा तो अपना कहर बरपाती ही है, ऐसी त्रसदियों के समय इनसान के कितने रूप सामने दिखते हैं - अच्छे या बुरे, कहानी में बहुत गहराई से दिखाया गया है। ऐसे समय भी इनसान अपने अंधविश्वास नहीं छोड़ता और अपनी जिद में बर्बाद हो जाता है, या उसे प्राण भी गंवाने पड़ते हैं, यानी रूढ़ियों से मुक्त न होने की उसकी हठ उसे कहीं का नहीं छोड़ती। कहानी में प्राकृतिक आपदा के समय सर्वस्व दिशाहीनता को दर्शाया गया है और यह बहुत गहरे तक असर करती है।

अरुण प्रकाश की कहानियों में निम्नवर्ग प्रमुखता से सामने आता है। यह एक वर्ग है जिसे कहानी से दूर किया जा रहा है। अरुण प्रकाश के पिता समाजवादी नेता रह चुके थे, लेकिन उन्होंने जीवन में बहुत संघर्ष किया था। शायद यही कारण थे कि निम्नवर्ग के प्रति उनमें गहरी संवेदना थी और वह उसके दुख-दर्दो को अपनी कहानियों में अक्सर बयान करते रहते थे। उनकी एक पुस्तक आई थी ‘गद्य की पहचान’। यह आलोचनात्मक कार्य है, लेकिन बिल्कुल एक रोचक कहानी की तरह इसे पढ़ा जा सकता है।

उनके व्यक्तित्व के कई और रूप भी थे। एक संपादक के तौर पर भी जब वह ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ से जुड़े थे, तब उन्होंने कथा चयन के चुनाव में अपनी असाधारण पहचान के कई प्रमाण दिए थे। उन्हीं के संपादन में तेलुगू लेखक केशव रेड्डी की कहानी ‘भूदेवता’ का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआ था। अपने संपादन में उन्होंने समकालीन भारतीय साहित्य में कई प्रादेशिक कहानियों के अनुवाद प्रकाशित किए। इसके अलावा, उन्होंने ‘युग’ आदि टीवी सीरियलों की पटकथाएं भी लिखीं। इस तरह के लेखन में भी वह बहुत सिद्धहस्त थे।

मुझे अक्सर वह नए कहानीकारों की कहानियों के बारे में बताते थे। एक दिन वह मेरे पास आए और मनोज रूपड़ा की कहानी ‘साज़-नासाज़’ की तारीफ करने लगे। फिर एक बार रमाकांत श्रीवास्तव की कहानी ‘चैंपियन’ की खूबियों पर चर्चा करने लगे थे। मैंने वे कहानियां पढ़ीं और उनसे प्रभावित हुआ। दरअसल, यह सबसे बड़ी पहचान होती है एक सच्चे रचनाकार की कि वह किसी भी नए या पुराने लेखक की कहानी की खुले मन से तारीफ करे - यदि रचना उस लायक है तो - और यह खूबी अरुण प्रकाश के व्यक्तित्व का अंग थी। कहना न होगा कि यह बहुत दुर्लभ गुण है जो किसी-किसी ही व्यक्ति में होता है। आज जब किसी भी रचना की निंदा और स्तुति भी आदान-प्रदान का विषय बन गई है तो ऐसे हालात में साहित्य अरुण प्रकाश जैसे लोगों से ही जिंदा है।
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