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दशहरी हो या चौसा, दाम होंगे दोगुने

जनता जनार्दन डेस्क , May 09, 2015, 12:52 pm IST
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दशहरी हो या चौसा, दाम होंगे दोगुने लखनऊ: आम का मौसम आ गया है। दशहरी, सफेदा हो, चौसा या लंगड़ा, इस बार सभी आम अपने मूल दामों से लगभग में डेढ़ से दोगुने ऊंचे दामों पर मिलेंगे। अभी मौसम और खराब हुआ या आमों की बागानों को पानी की किल्लत हुई तो और भी महंगे होने की उम्मीद है। ऐसे में आम तो आम लोगों के लिए खास हो ही जाएगा साथ ही कारोबारियों के मुनाफे की उम्मीदों पर भी पानी फेर देगा।

ऑल इंडिया मैंगो ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष इंसराम अली के मुताबिक, इस वर्ष बेमौसम बारिश और तेज आंधी ने आम की खेती को पूरी तरह उजाड़कर रख दिया है। स्थिति यह हो गई है कि उन्हें आम के बागानों से लागत निकलने की भी उम्मीद नहीं लग रही है।

इंसराम का कहना है कि आंधी-पानी और ओलावृष्टि का असर उत्तर प्रदेश के आम वाले 15 इलाकों पर पड़ा है। सिर्फ राजधानी लखनऊ में ही 35 से 40 प्रतिशत तक आम की फसल बर्बाद हुई है। ऐसे में आम इस बार अपने मूल दामों से 20 से 30 रुपये और महंगे होकर बिकेंगे।

अली बताते हैं कि अभी तक आम की खेती में 35 से 40 प्रतिशत तक का ही नुकसान होने की उम्मीद है। लेकिन नहरों से शीघ्र ही आम बागानों को पानी नहीं दिया गया तो आम पैदावार की हालत और खस्ता हो जाएगी। ऐसे में आम की खेती में और नुकसान उठाना पड़ सकता है।

उन्होंने बताया कि तेज निकलते धूप और लू के थपेड़ों से आम को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं है, लेकिन यदि इन पेड़ों को जरूरत के मुताबिक पानी नहीं मिला तो यही धूप और लू इनके लिए रोग का कारण बन जाएंगे। वैसे तो जाला रोग आम की खेती को बीते कई वर्षों से अपने प्रकोप का शिकार बनाता रहा है। ऐसे में अब पानी नहीं मिला तो फफूंदी लगने का डर बना हुआ है।

वे बताते हैं अब पानी की जरूरत इस वजह से और है कि पानी जब पेड़ों की जड़ों में पहुंचता है तो अंतिम समय में फलों की साइज का विकास होता है। दशहरी का गढ़ कहे जाने वाले राजधानी के मलिहाबाद के साथ ही रहीमाबाद, काकोरी, माल, उन्नाव के हसनगंज सहित अन्य जगहों आम बागानों के पैदावार करने वाले रो रहे हैं।

उनका मानना है कि आम की सही पैदावार होने से हम इसे विदेशों में भी पहुंचा दिया करते थे, लेकिन इस वर्ष तेज आंधी, ओलावृष्टि ने आम पैदावार को आधा कर दिया है।

आम बागान मालिकों के मुताबिक, आम की पैदावार 200 से 250 लाख मीट्रिक टन होने की उम्मीद है, जबकि पूर्व में यहीं पैदावार 500 लाख मीट्रिक टन की रहती थी। इससे आधा पैदावार होने से दुबई, सऊदी, और सिंगापुर में आम नहीं भेजे जा सकेंगे।
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