Wednesday, 28 October 2020  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

केदारनाथ सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करते राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

केदारनाथ सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करते राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी नई दिल्ली: प्रख्यात हिंदी कवि केदारनाथ सिंह को 49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। केदारनाथ सिंह (80) की गिनती हिंदी की आधुनिक पीढ़ी के रचनाकारों में होती है। ज्ञानपीठ पुरस्कार भारत का शीर्ष साहित्य सम्मान है।

संसद भवन के बालयोगी ऑडिटोरियम में सोमवार को आयोजित समारोह में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने केदारनाथ सिंह को इस पुरस्कार से नवाजा। इस मौके पर राष्ट्रपति ने कहा, 'केदारनाथ सिंह की कविताएं परिभाषा, रंग और स्वीकृति का कोलाज प्रस्तुत करती हैं।'

उन्हें अद्वितीय कवि बताते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि उनका दृष्टिकोण आधुनिक सौंदर्यशास्त्र के प्रति संवेदनशीलता के साथ पारंपरिक ग्रामीण समुदायों को परिलक्षित करता है। 7 जुलाई, 1934 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्मे केदारनाथ सिंह को साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।


राष्ट्रपति ने कहा कि केदारनाथ सिंह ने अपनी कविताओं के माध्यम से हमें अनुप्रास एवं काव्यात्मक गीत की दुर्लभ संगति दी है और उन्होंने वास्तविकता एवं गल्प को समानता के साथ समाहित किया है. उनकी कविताओं से अर्थ, रंग और स्वीकार्यता झलकती है।

मुखर्जी ने कहा कि अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी कवि न केवल आधुनिक कला सौंदर्य के प्रति संवेदनशील हैं बल्कि पारंपरिक ग्रामीण समुदायों के प्रति भी उनकी संवेदना झलकती है।

सिंह एक सम्मानित शिक्षक भी हैं जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया है। इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि उनकी इच्छा है कि नयी पीढ़ी भारतीय क्लासिक में गहराई तक उतरे।

सिंह को संसद के पुस्तकालय भवन स्थित बालयोगी प्रेक्षागृह में 49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि इससे न केवल नैतिक मानदंडों को ठीक करने में मदद मिलेगी बल्कि राष्ट्र निर्माण में हमारे प्रयासों में शानदार योगदान रहेगा।

ज्ञानपीठ पुरस्कार की स्थापना समाजसेवी दंपति साहू शांति प्रसाद जैन और दिवंगत रमा जैन ने की थी। भारतीय साहित्य में भारतीय लेखकों के योगदान के महत्व को देखते हुए यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

ज्ञानपीठ सम्मान : साधारण में असाधारण की खोज

केदारनाथ सिंह एक परिचय

जन्म : 7 जुलाई 1934, चकिया, बलिया जिला (उप्र)
प्रमुख कृतियां : अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, अकाल में सारस (साहित्य अकादमी अवॉर्ड, 1989)।
आलोचना, निबंध और कहानियां : मेरे समय के शब्द, कल्पना और छायावाद, हिंदी कविता का विंब विधान, कब्रिस्तान में पंचायत।

हिंदी के ख्यात कवि केदारनाथ सिंह को राष्ट्रपति ने सोमवार को संसद भवन में ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा। केदारनाथ साधारण में असाधारण की खोज करने वाले कवि हैं। वे सड़क पार करने वाले को उम्मीद का प्रतीक मानते हैं।

शायद उस पार कोई राह खुल जाए। वे किसी का हाथ अपने हाथों में लेकर सोचते हैं कि दुनिया को इस हाथ की तरह गर्म और मुलायम होना चाहिए। उनकी असाधारणता को जानना है तो पढ़िए ये छह रचनाएं...
 
बनारस
इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है
 
जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियां
आदमी दशाश्वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन
 
तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज रोज एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अंधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ

इस शहर में धूल, धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है
 
यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बांधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज जहां थी
वहीं पर रखी है, कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बंधी है नाव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की
खड़ाऊं सैकड़ों बरस से
 
कभी सई-सांझ, बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में इसे अचानक देखो, अद्‌भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में, आधा फूल में है
 
आधा शव में, आधा नींद में है
आधा शंख में, अगर ध्यान से देखो
तो यह आधा है, और आधा नहीं भी है।
 
(लंबी कविता का अंश)
 
यह पृथ्वी रहेगी
मुझे विश्वास है,
यह पृथ्वी रहेगी
यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड‌्डि्यों में
यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में
रहती हैं दीमक
जैसे दाने में रह लेता है घुन
यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अंदर
यदि और कहीं नहीं तो मेरी जबान
 
और मेरी नश्वरता में
यह रहेगी
और एक सुबह मैं उठूंगा
मैं उठूंगा पृथ्वी-समेत
जल और कच्छप-समेत मैं उठूंगा
मैं उठूंगा और चल दूंगा उससे मिलने
जिससे वादा है
कि मिलूंगा।
 
नदी
अगर धीरे चलो
वह तुम्हें छू लेगी
दौड़ो तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली
जाएगी कहीं भी
यहां तक- कि
कबाड़ी की दुकान तक भी
छोड़ दो
तो वही अंधेरे में
करोड़ों तारों की आंख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
एक छोटे से घोंघे में
 
सच्चाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो
तुम्हें वर्ष के सबसे
कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी
नदी जो
इस समय नहीं है
इस घर में
पर होगी जरूर कहीं न कहीं
किसी चटाई
या फूलदान के नीचे
चुपचाप बहती हुई
 
कभी सुनना
जब सारा शहर
सो जाए
तो किवाड़ों पर
कान लगा
धीरे-धीरे सुनना
कहीं आसपास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी!
 
फागुन का गीत
गीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी करता!
ये बांधे नहीं बंधते, बांहें- रह जातीं खुली की खुली,
ये तोले नहीं तुलते, इस पर
ये आंखें तुली की तुली,
ये कोयल के बोल उड़ा करते, थामे हिया रहता!
अनगाए भी ये इतने मीठे
इन्हें गाएं तो क्या गाएं,
ये आते, ठहरते, चले जाते
इन्हें पाएं तो क्या पाएं
ये टेसू में आग लगा जाते, इन्हें छूने में डर लगता!
ये तन से परे ही परे रहते, ये मन में नहीं अंटते, मन इनसे अलग जब हो जाता,
ये काटे नहीं कटते, ये आंखों के पाहुन बड़े छलिया, इन्हें देखे न मन भरता!

शहर में रात
बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है
वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है धुंआ-धुंआ-सा
वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे
हैं उलझ गए जीने के सारे धागे
यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएं
कुत्ते भुनगे आदमी गिलहरी गाएं
यह शहर कि जिसकी जिद है सीधी-सादी
ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आजादी
तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में
यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में
साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूं
इस आने-जाने का वेतन पाता हूं
जब आंख लगे तो सुनना धीरे-धीरे
किस तरह रात-भर बजती हैं जंजीरें।
 
दुपरिया
झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की
उड़ने लगी बुझे खेतों से
झुर झुर सरसों की रंगीनी,
धूसर धूप हुई मन पर ज्यों-
सुधियों की चादर अनबिनी,
दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की। सांस रोक कर खड़े हो गए
लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,
चिलबिल की नंगी बाहों में
भरने लगा एक खोयापन,
बड़ी हो गई कटु कानों ‘चुर-मुर’ ध्वनि बांसों के बन की। थक कर ठहर गई दुपरिया,
रुक कर सहम गई चौबाई,
आंखों के इस विराने में-
और चमकने लगी रुखाई,
प्रान, आए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की।
अन्य चर्चित लेखक लेख
वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
 
stack