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आखिर कैसे रुकेगी महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा?

आखिर कैसे रुकेगी महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा? नई दिल्ली: यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।-अथर्ववेद

जिस कुल में नारियों कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण, दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं।

उत्तरप्रदेश के बदायूं जिले में जिस तरह से दो नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार करने और फिर उन्हें फांसी पर लटका कर मारने की घटना न केवल दर्दनाक है, बल्कि किसी भी सभ्य समाज के लिए बेहद शर्मनाक है। शर्मिंदगी होती है यह सोचकर कि किस आधुनिकता, प्रगतिशीलता, सुखमय भारत की बात करते हैं हम जबकि यहां खुलेआम अनाचार और शोषण की घटनाएं हो रही हैं।

सवाल पैदा होता है कि लड़कियों के प्रति समाज का रवैया इतना वहशियाना क्यों है। दिल्ली गैंग रेप कांड के बाद समाज के हर वर्ग में गुस्सा था। दिल्ली गैंग के बाद शुरू हुए आंदोलन से वह बातें निकल कर नहीं आईं जो महिलाओं को राजनीतिक ताक़त देती और उनके सशक्तीकरण की बात को आगे बढ़ातीं। 

गैंग रेप की शिकार हुई लड़की के साथ हमदर्दी वाला जो आंदोलन शुरू हुआ था वह व्यवस्था बदल देने की क्षमता रखता था, लेकिन बीच में पता नहीं कब वह आंदोलन हाइजेक हो गया और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने की कोशिश में लगी हुई पार्टियों ने आंदोलन को दिशाहीन और हिंसक बना दिया।

इस दिशाहीनता का नतीजा यह हुआ कि महिलाओं के सशक्तीकरण के मुख्य मुद्दों से राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह से भटका दिया गया।  बच्चियों और महिलाओं के प्रति समाज के रवैय्ये को  बदल डालने का जो अवसर मिला था उसको गँवा दिया गया।    

अब ज़रूरी है कि कानून में ऐसे इंतजामात किए जाएँ कि अपराधी को मिलने वाली सज़ा को देख कर भविष्य में किसी भी पुरुष की हिम्मत न पड़े कि बलात्कार के बारे में सोच भी सके।

उस समाज के खिलाफ सभ्य समाज को लामबंद होने की ज़रूरत है जो लड़की को इस्तेमाल की वस्तु साबित करता है  और उसके साथ होने वाले बलात्कार को भी अपनी शान में गुस्ताखी मान कर सारा काम करता है।

हमें एक ऐसा समाज  चाहिए जिसमें लड़की के साथ बलात्कार करने वालों और उनकी मानसिकता की हिफाज़त करने वालों के खिलाफ लामबंद होने की इच्छा हो और ताक़त हो।

महिलाओं को उपभोग की चीज़ साबित करने की कोशिश करने वाली इस मानसिकता के खिलाफ जंग  छेडऩे की ज़रूरत है, जिसमें लड़की को संपत्ति मानते हैं। इसी मानसिकता के चलते इस देश में लड़कियों को दूसरे दरजे का इंसान माना जाता है और उनकी इज्ज़त को मर्दानी इज्ज़त से जोड़कर देखा जाता है।

लड़की की इज्ज़त की रक्षा करना समाज का कर्तव्य माना जाता है। यह गलत है । पुरुष कौन होता है लड़की की रक्षा करने वाल। ऐसी शिक्षा और माहौल बनाया जाना चाहिए जिसमें लड़की खुद को अपनी रक्षक माने। लड़की के रक्षक के रूप में पुरुष को पेश करने की मानसिकता को जब तक खत्म नहीं किया जाएगा तब तक कुछ भी बदलेगा नहीं।

जो पुरुष समाज अपने आप को महिला की इज्ज़त का रखवाला मानता है, वही पुरुष समाज अपने आपको यह अधिकार भी दे देता है कि वह महिला के यौन जीवन का संरक्षक और उसका उपभोक्ता है। इस मानसिकता को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया जाना चाहिए।

पुरुषवादी सोच से एक समाज के रूप में लडऩे की ज़रूरत है और यह लड़ाई केवल वे लोग कर सकते हैं जो लड़की और लड़के को बराबर का इंसान मानें और उसी सोच को जीवन के हर क्षेत्र में उतारें।

कमज़ोर को मारकर बहादुरी दिखाने वाले जब तक अपने कायराना काम को शौर्य बताते रहेंगे, तब तक इस देश में बलात्कार करने वालों के हौसलों को तोड़ पाना संभव नहीं होगा। अब तक का भारतीय समाज का इतिहास ऐसा है जहां औरत को कमज़ोर बनाने के सैकड़ों संस्कार मौजूद हैं।

शिक्षा और समाज की बुनियाद में यह जोर देने की ज़रूरत है कि पुरुष और स्त्री बराबर है और कोई किसी का रक्षक नहीं है। सब अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं। बिना बुनियादी बदलाव के बलात्कार को हटाने की कोशिश वैसी ही है जैसे किसी घाव पर मलहम लगाना। हमें ऐसे एंटीबायोटिक की तलाश करनी है जो शरीर में ऐसी शक्ति पैदा करे कि घाव होने की नौबत ही न आए।

हे नारी! तू स्वयं को पहचान। तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करने वाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर.। हे नारी! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर। हे नारी! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करने वाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।-यजुर्वेद
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