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ऐसा अवसर फिर नहीं मिलेगा

ऐसा अवसर फिर नहीं मिलेगा प्रिय केजरीवालजी! दिसंबर की सर्दी की शुरुआत हो रही थी और दिल्ली का सियासी पारा अपने उबाल पर था। आठ दिसंबर को विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे। साफ हो गया था कि दिल्ली की जनता ने कांग्रेस के पंद्रह साल के विकास के दावों को नकार दिया, भारतीय जनता पार्टी में अपना पूरा भरोसा नहीं जाहिर किया था। दिल्ली की जनता ने यह साफ कर दिया था कि आप की पार्टी में उनको भरोसा है, हालांकि सरकार चलाने का जनादेश आपको भी नहीं मिला था। कांग्रेस ने बिन मांगे आपको समर्थन दे दिया और उनकी सियासी चाल को भांपते हुए आपने चुनौती स्वीकार कर दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह के बाद आपने किसी परंपरा की परवाह न करते हुए वहां से जनता को संबोधित किया और तमाम वादे भी किए।

आपको और आपकी सरकार को लेकर दिल्लीवासियों का एक सपना था, अपेक्षा सातवें आसमान पर थी। पंद्रह साल से सूबे में और दस साल से केंद्र में कांग्रेस का राज देख चुका दिल्ली का आम आदमी, जिसकी नुमाइंदगी का आप दावा करते हैं और जिसने आपको दिल्ली की मुख्यमंत्री की गद्दी तक पहुंचाया, त्रस्त था। भ्रष्टाचार और महंगाई से विद्रोह की हद तक ऊब चुकी जनता के आक्रोश को आपने आवेग दिया। जनता ने उसी आवेग से आपको वोट दिया। जनता की बेहतर जिंदगी के लिए आजाद भारत के नेताओं ने अब तक सब्जबाग दिखाए थे लेकिन आपने सपना दिखाया और जनता ने आपके दिखाए उन सपनों पर यकीन कर लिया।

चुनाव से पहले आपने दिल्ली के आम आदमी को पानी और बिजली के बिलों में राहत देने का वादा किया था। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही आपने इन दोनों वादों को पूरा किया। हर सफल राजनेता से जनता की अपेक्षा होती है कि वह अपना वादा पूरा करे। दिल्ली में हर घर को आपने तकरीबन सात सौ लीटर पानी मुफ्त देने का अपना पहला वादा पूरा किया। जब मैंने दिल्ली में पानी वितरण की स्थिति का आकलन किया तो मेरे मन में पहला सवाल तो यही उठा कि क्या आपने मुफ्त पानी का वादा सिर्फ उन्हीं लोगों से किया था जिनके घर में मीटर लगे थे। माननीय मुख्यमंत्री जी, जिस तत्परता से आपने मुफ्त पानी का अपना वादा पूरा किया उतनी ही तत्परता उन इलाकों में पानी पहुंचाने की भी होनी चाहिए जहां पीने का क्या नहाने लायक पानी भी उपलब्ध नहीं है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि दिल्ली के उन इलाकों में पानी कब पहुंचेगा जहां पानी उपलब्ध नहीं है। कब तक दिल्ली पानी के मामले में आत्मनिर्भर हो पाएगी और बार-बार इसके लिए हरियाणा आदि का मुंह नहीं देखना पड़ेगा।

विशेषज्ञों के मुताबिक दिल्ली में वितरण के दौरान बहुत पानी बरबाद होता है। पानी की पाइपलाइन कई इलाकों में इतनी टूट-फूट चुकी हैं कि कई बार उनसे सीवर का पानी आने लगता है। पानी की पाइपलाइन बदलना बहुत ही मुश्किल कार्य है लेकिन आपकी प्राथमिकता में यह होना चाहिए। आपने दिल्ली में टैंकर माफिया को खत्म करने का वादा भी किया था। लोकलुभावन वादों को पूरा करने के चक्कर में इस बात का पता नहीं चल पा रहा है कि कब तक दिल्ली टैंकर माफिया से मुक्त हो पाएगी। आपने आते ही दिल्ली जल बोर्ड में बड़े पैमाने पर तबादले किए। उसके नतीजे दिखने शेष हैं।

हालांकि सिर्फ महीने भर पहले शासन की बागडोर संभालने वाली सरकार से इतनी अपेक्षाएं उचित नहीं हैं, लेकिन केजरीवालजी, अगर आप बुनियादी समस्याओं को दूर करने में अपना ध्यान लगाएंगे तो इतिहास पुरुष हो जाएंगे। आपसे इस तरह की अपेक्षाएं इस वजह से हैं कि आपने हमें एक अलग तरह की राजनीति की राह दिखाई।

आपने दूसरा वादा किया था बिजली के बिलों को आधा करने का। चूंकि चुनावी वादा था और पूरा नहीं करने पर विरोधी आपको घेरते, लिहाजा आपने सबसिडी का तरीका चुना। यह संतोष की बात है कि आपने यह व्यवस्था सिर्फ तीन महीने के लिए लागू की है। बिजली पर सबसिडी देने या जनता को मुफ्त बिजली देने का स्टंट काफी पुराना है। अंतत: इसका फायदा जनता को होता नहीं है और सबसिडी का बोझ घूम-फिर कर टैक्स के रूप में आम आदमी पर ही पड़ता है। सबसिडी का दूसरा नुकसान यह है कि जिस पैसे से सड़क, स्कूल या अस्पताल जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जा सकता था वह उन्हीं कंपनियों के खातों में जा रहा है जिनके आप खिलाफ हैं।

सर्दियों के मौसम में तो बिजली नहीं आने से जनता नाराज नहीं होती, लेकिन गरमी में अगर सप्लाई में कटौती होती है तो जनता सड़कों पर उतर आएगी। दिल्ली में बिजली चोरी और वितरण के दौरान क्षति की बात कह कर बिजली कंपनियां लगातार सरकार से वित्तीय सहायता लेती रहती हैं या लेने की जुगत में रहती हैं। इन बातों के मद्देनजर आपकी सरकार की तरफ से कोई योजना दिखाई नहीं दे रही है।

बिजली के दोषपूर्ण मीटरों को लेकर आप जिस तरह से चुनाव अभियान के वक्त आक्रामक थे वैसी आक्रामकता बतौर मुख्यमंत्री नहीं दिखाई दे रही है। आपको जिस तरह की कार्रवाई करनी चाहिए थी वह भी नहीं हो पा रही है। हो सकता है कि आप इन मुद्दों पर काम कर रहे हों लेकिन जब तक इजहार-ए-मोहब्बत नहीं होता है तो इश्क परवान नहीं चढ़ पाता है। आप जनता की सहभागिता और स्वराज की बात करते हैं। जनता को इन फैसलों और योजनाओं में, अगर बन रही हैं तो, भागीदार बनाइए।

अरविंदजी, एक बात और आपसे कहना चाहता हूं। आपमें और आपकी सरकार के मंत्रियों में पद संभालने के बाद एक खास किस्म की आक्रामकता आ गई है; जो विनम्रता और सहनशीलता आपकी ताकत और पहचान हुआ करती थी उसका सिरा आप लोगों के हाथों से छूटता नजर आ रहा है। अब आपमें अपनी आलोचना बर्दाश्त करने की क्षमता का भी क्षय होने लगा है। आपने अपने हालिया धरने के दौरान जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के लिए किया उससे अच्छा संदेश नहीं गया। आप तो भारत माता की जयकार के साथ अपने भाषणों की शुरुआत करते हैं। देश की सभ्यता और संस्कृति का अहसास भी आपको है।

हमारे देश में बड़ों से इस तरह की भाषा में बात करना अच्छे नजरिए से नहीं देखा जाता है। आपका यह बयान या तो किसी हताशा का प्रतीक था या फिर सत्ता के नशे का। दिल इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि अरविंद केजरीवाल पर सत्ता का नशा इतना हावी हो जाएगा कि वे सार्वजनिक मर्यादा का पालन करना भूल जाएंगे।

हो सकता है कि धरने के दौरान अपेक्षित भीड़ नहीं जुटने की हताशा में आप मर्यादा भूल गए हों। इस बीच आपके कानूनमंत्री ने देश के एक बड़े वकील और भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता के मुंह पर थूकने वाला बयान दे दिया। यह बेहद आपत्तिजनक था। दोनों ही शख्स की देश भर में प्रतिष्ठा है। लिहाजा चौतरफा दबाव की वजह से आम आदमी पार्टी को माफी मांगनी पड़ी, लेकिन तब तक पार्टी और उसकी जितनी भद पिटनी थी पिट चुकी थी।

पार्टी के माफी मांगने के बाद भी आपके कानूनमंत्री ने सबक नहीं लिया है और उन्होंने सार्वजनिक रूप से एक पत्रकार से ही जानना चाहा कि उसे सवाल पूछने के लिए मोदी से कितने पैसे मिले हैं। यह किस तरह की मानसिकता है, जो आप लोगों को आलोचना बर्दाश्त नहीं करने दे रही है। जानकारों का मानना है कि ऐसे बयान हताशा में ही दिए जाते हैं। आपके मंत्री सोमनाथ भारती की हताशा तो समझ में आती है, पर केजरीवालजी, विनम्रता और सहनशीलता तो आपकी ताकत थी, आपको क्या हुआ है!

केजरीवालजी, आपने सपने तो बड़े लंबे-लंबे दिखाए हैं। पर आप दिल्ली की जनता की समस्याओं को देखने-समझने के बजाय अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के चक्रव्यूह में फंसते नजर आ रहे हैं। दिल्ली में अपने को मजबूत करने के बजाय आप देश भर में अपनी पार्टी को छितराने में लगे हैं। कई राजनीतिक पंडितों का मानना है कि आप ऐसा करके कांग्रेस के बुने जाल में फंस रहे हैं।

कांग्रेस आपके कंधे पर बंदूक रख कर मोदी का शिकार करना चाहती है। आप खुशी-खुशी वह कंधा मुहैया करवा रहे हैं। कांग्रेस की रणनीति है कि वह मोदी के विजय-रथ के पहिए में आम आदमी पार्टी का फच्चर फंसा दे। आप फच्चर बनने के लिए तैयार हैं। लोकसभा का चुनाव दिल्ली विधानसभा चुनाव से अलहदा होता है। यह बात आप और आपके अनुभवी साथी अवश्य जानते हैं, बावजूद इसके देश भर में अपने उम्मीदवार खड़े करने की लालसा कहीं आपको तथाकथित रूप से सांप्रदायिकता के खिलाफ बने समूह में तो शामिल नहीं कर देगी।

आपकी पार्टी के आला नेताओं के बयान से लग भी यही रहा है कि आम आदमी पार्टी का सियासी दुश्मन भारतीय जनता पार्टी ही है। अगर ऐसा होता है तो आप कांग्रेस को परोक्ष रूप से मदद करेंगे। अभी तो आपके विरोधी शीला सरकार के भ्रष्टाचार पर आपके धीमे चलने पर ही सवाल खड़े करने लगे हैं। लेकिन अगर आप सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस का दामन थामते हैं या फिर उसके हाथ को मजबूत करते हैं तो जनता को भी यही लगेगा।

केजरीवाल साहब, जनता पार्टी से जब जनता का भरोसा टूटा तो बारह साल लगे थे, वीपी सिंह के आंदोलन को खड़ा होने में। वीपी सिंह से भरोसा टूटा तो करीब पच्चीस साल बाद जनता ने आपमें अपना नायक देखा और अगर इस बार भरोसा टूटता है तो हमारी जिंदगी में तो फिर ऐसा अवसर नहीं मिलेगा। इसलिए आप इस ऐतिहासिक मौके को अपनी महत्त्वाकांक्षा और कांग्रेस की सियासत का शिकार न होने दें।
अनंत  विजय
अनंत  विजय लेखक अनंत विजय वरिष्ठ समालोचक, स्तंभकार व पत्रकार हैं, और देश भर की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत छपते रहते हैं। फिलहाल समाचार चैनल आई बी एन 7 से जुड़े हैं।

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