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लालकिले की लाल दीवारों में सिमटा इतिहास

जनता जनार्दन संवाददाता , May 20, 2011, 16:22 pm IST
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लालकिले की लाल दीवारों में सिमटा इतिहास नई दिल्ली: भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के चश्मदीद गवाह और आजादी के मतवालों के प्रेरणास्रोत रहे ऐतिहासिक लाल किले ने न सिर्फ दिल्ली के उतार-चढ़ावों को करीब से देखा है, बल्कि वह कभी उसके दर्द से कराहता, तो सुखद पलों में खुशियों से झूमता भी रहा है।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन् 1857 के दौरान अंग्रेजी हुक्मरानों ने आजादी के मतवालों पर ही कहर नहीं ढाया था, बल्कि मुगल बादशाह शाहजहां के शासन काल में बने इस भव्य किले के कई हिस्सों को भी जमींदोज कर वहां सेना की बैरकें और दफ्तर बना दिए थे और इस किले को रोशन करने वाले मुगल सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर को भी कैद कर रंगून भेज दिया था।

आजादी की लड़ाई के दौरान लाल किले पर तिरंगा फहराने की ख्वाहिश भारत मां की गुलामी की बेड़ियां काटने को बेकरार मतवालों के दिलों में उफनती रहीं। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया और इसकी प्राचीर पर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा फहराया।

दिल्ली के इतिहास में ही नहीं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी लालकिला खास अहमियत रखता है। इसने दिल्ली को, जिसे उन दिनों 'शाहजहांनाबाद' के नाम से जाना जाता था, शाहजहां के आगमन पर खुशी से सजते देखा तो विदेशी आक्रांताओं के जुल्मों से बेनूर होते भी देखा। यह किला मुगलकाल के ऐशो-आराम, रौनकों, महफिलों, रंगीनियों और पूजा की खुशहाली का चश्मदीद गवाह रहा तो उसने विदेशी हमलावरों के जुल्म और लूटपाट से बदहवास और बेनूर दिल्ली वालों के दिलों में छुपे दर्द को भी देखा।

इस किले की बुनियाद सन् 1639 में रखी गई थी। इसके निर्माण में नौ वर्ष का समय लगा था। इसके निर्माण में ज्यादातर लाल पत्थरों का इस्तेमाल किए जाने के कारण ही इसे 'लाल किला' नाम दिया गया।

ब्रजकिशन चांदीवाला की 'दिल्ली की खोज' पुस्तक में इसके निर्माण के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसके अनुसार, किला ऐसा बनवाना शुरू किया गया, जो आगरे के किले से दोगुना और लाहौर के किले से भी बड़ा हो। उसकी बुनियाद का पत्थर इज्जर खां की देखरेख में रखा गया। कारीगरों में सबसे बड़े उस्ताद अहमद वहामी चुने गए।

इज्जत खां की देखरेख में यह काम पांच महीने दो दिन रहा। इस अर्से में उसने बुनियाद भरवाई और माल-मसाला जमा किया। इज्जत खां को सिंध जाने का हुक्म मिला और काम अलीवर्दी खां के सुपुर्द कर दिया गया। उसने दो वर्ष, एक माह, चौदह दिन में किले के गिर्द फसील को 12-12 गज ऊंची उठाई। इसके बाद अलीवर्दी खां बंगाल का सूबेदार बन गया और किले का काम उसकी जगह मुकर्रमत खां के सुपुर्द हुआ, जिसने किले की तामीर पूरी कराई। उस वक्त बादशाह शाहजहां काबुल में था। मुकर्रमत खां ने बादशाह सलामत की सेवा में निवेदन भेजा कि किला तैयार है।

पुस्तक के अनुसार 1648 में एक दिन बादशाह सलामत अरबी घोड़े पर सवार होकर बड़े गाजे-बाजे के साथ किला मोहल्ला (लाल किले) में दरिया के दरवाजे (हिजरी दरवाजा) से दाखिल हुआ। जब तक शाहजहां दरवाजे तक नहीं पहुंच गया, तब तक उसका पुत्र दाराशिकोह उसके सिर पर चांदी और सोने के सिक्के फेंकते रहा।

महलों की सजावट हो चुकी थी और सहनों में फर्श पर कालीन बिछे हुए थे। दीवान-ए-आम की छतों में, दीवारों पर और ऐवानों पर खाता और चीन की मखमल और रेशम की चादरें टंकी हुई थीं। बीच में एक निहायत आलीशान शामियाना लगाया गया था, जिसका नाम दलबादल था। यह शामियाना अहमदाबाद के शाही कारखाने में तैयार कराया गया था। यह 70 गज लंबा और 45 इंच चौड़ा था और इसकी कीमत एक लाख रुपये थी। शामियाना चादीं के उस्तपों पर खड़ा किया गया था। और उसमें चांदी का कटहरा लगा हुआ था।

दीवान-ए-आम में सोने का कटहरा लगा हुआ था। तख्त की छत में मोती लगे हुए थे और वह सोने के खंम्भों पर खड़ी थी, जिसमें हीरे जड़े हुए थे।

पुस्तक के अनुसार, बादशाह ने इस मौके पर बहुत से आतिए अता फरमाए। बेगम साहिबा को एक लाख रुपये नजर किए गए, दाराशिकोह को खास खिल्लत और जवाहरात जड़े हथियार और एक बीस हजारी मनसब, एक हाथी और दो लाख रुपये अता किए गए। इसी प्रकार दूसरे शहजादों, वजीरे आजम और मनसबदारों को आतिए अता किए गए। मुकर्रमत खां जिसकी निगरानी में किला तामीर हुआ था उसे पंचहजारी का मनसब अता किया गया। दरबार बड़ी धूम-धाम से समाप्त हुआ।

यह किला अष्टभुजाकार है और इसके पश्चिमी तथा पूर्वी दोनों किनारे लम्बे हैं। उत्तर की ओर यह किला सलीमगढ़ से एक पुल से जुड़ा है। यह 900 मीटर लंबा और 550 मीटर चौड़ा है और इसकी प्राचीरें 2.41 किमी की परिधि में हैं जो ऊंचाई में शहर की ओर 33.5 मीटर और नदी के साथ 18 मीटर ऊंची हैं। प्राचीर के बाहर की ओर एक खंदक है जो प्रारंभ में नदी से जुड़ी हुई थी।

महल किले के पूर्वी हिस्से में हैं जबकि दो भव्य तीन मंजिलें प्रवेश द्वार पश्चिमी और दक्षिणी दिशाओं के मध्य में है। इनकी बगल अर्ध-अष्टभुजाकार बुर्ज है जिनमें अनेक कमरे हैं।

किले में पांच दरवाजे थे। लाहौरी और दिल्ली दरवाजा शहर की तरफ और एक दरवाजा दरिया की तरफ सलीमगढ़ में जाने के लिए था। चौथा था खिड़की या दरियाई दरवाजा और पांचवां दरवाजा असद बुर्ज के नीचे था। इस तरफ से किश्ती में सवार होकर आगरे जाते थे। किले की चारदीवार में बीच-बीच में बुर्ज बने हुए हैं।

लाहौरी दरवाजा सदर दरवाजा था। यह किले की पश्चिमी दीवार के मध्य चांदनी चौक के ऐन सामने पड़ता था। शाहजहां के वक्त खाई पर से गुजरने के लिए काठ का पुल था। दरवाजे के सामने एक खूबसूरत बाग लगा हुआ था और इसके आगे चौक था। इस  चौक के सामने एक हौज था, जो चांदनी चौक की नहर से मिला हुआ था।

डा. महेश्वरदयाल की पुस्तक 'दिल्ली- मेरी दिल्ली' के अनुसार किले के लाहौरी दरवाजे के सामने एक दीवार है। इसे औरंगजेब ने इसलिए बनवाया था कि किले का लाहौरी दरवाजा दुश्मनों की आंख से बचा रहे और किले में आने वालों की तकलीफ न हो।

बात यह थी कि जब बादशाह के दरबारी चांदनी चौक से किले में आते थे, तो दीवान-ए-आम का तख्त उनके सामने पड़ता था और उन्हें बादशाह और उनके तख्त का अदब करने के लिए पैदल चलना पड़ता था, इसलिए औरंगजेब ने यह घोघस बनवा दिया।

इस निर्माण से बाग खत्म हो गया। जब शाहजहां को इस निर्माण के बारे में पता चला, तो वह उन दिनों आगरे में कैद में था। उसने अपने पुत्र को पत्र लिखकर कहा कि यह दीवार बनवाकर मानो उसने दुल्हन के चेहरे पर घूंघट डाल दिया है।

इसी तरह दक्षिणी दरवाजा है, जिसे दिल्ली दरवाजा कहते हैं। यह जामा मस्जिद की तरफ है। बादशाह इसी दरवाजे से हर जुम्मे की नमाज पढ़ने जामा मस्जिद जाया करते थे। औरंगजेब ने इन्हीं दोनों की यह अतिरिक्त किलाबंदी कराई थी। अन्य किनारों की ओर तीन प्रवेशद्वार हैं, जिन्हें अब बंद कर दिया गया है।

सन् 1756 में मराठों और अहमदशाह दुर्रानी की लड़ाई ने भी यहां की इमारतों को काफी नुकसान पहुंचाया। गोलाबारी के कारण दीवाने खास रंगमहल मोती महल और शाह बुर्ज को काफी नुकसान पहुंचा।

सन् 1857 के विद्रोह के बाद किले के अंदर की इमारतों का बहुत-सा हिस्सा हटा दिया गया। रंगमहल मुमताज महल और खुर्दजहां के पश्चिम में स्थित जनता महलात और बागात तथा चांदीमहल खत्म कर दिए गए। इसी तरह दीवान-ए-आम के उत्तर में स्थित तोशेखाने बावर्चीखाने तथा हयात बाग और महबात बाग का बहुत-सा हिस्सा काटकर वहां फौजों के लिए बैरकें और परेड का मैदान बना दिया गया। हयात बाग के उत्तर तथा किले की दीवार के बीच में शहजादों के महल थे, गिरा दिए गए।

'दिल्ली की खोज' के अनुसार, दिल्ली शहर के तमाम वाशिंदों को गोरों को मार डालने के इल्जाम में शहर से बाहर निकाल दिया गया। कुछ दिन तक तो बहस चलती रही कि क्यों न सारे शहर को या कम से कम जामा मस्जिद और लालकिले को मिसमार कर जमींदोज कर दिया जाए। मगर दिल्ली बच गई। सन् 1859 में हिन्दुस्तानी फौज की छावनी दरियागंज में बना दी गई और किले में गोरी पल्टन और तोपखाने के लिए बैरक बना दी गई। इमारतें ढहाकर पांच-पांच सौ गज का मैदान साफ कर दिया गया।

इसी किले के प्राचीर पर 90 वर्ष तक यूनियन जैक लहराता रहा और 15 अगस्त सन् 1947 में पंडित नेहरू ने तिरंगा फहराकर देश की आजादी का ऐलान किया।
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