प्राथमिक नैतिकता और न्याय का नैतिक आधार:सर्वोच्च न्यायालय

प्राथमिक नैतिकता और न्याय का नैतिक आधार:सर्वोच्च न्यायालय नई दिल्ली: रोजमर्रा के स्थगनों पर नाराजगी जाहिर करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि मामलों का त्वरित निष्पादन "न्याय की प्राथमिक नैतिकता और न्यायपालिका का नैतिक आधार है।"

न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ ने अपने हाल के एक आदेश में कहा है, "न्याय की बुनियाद, अन्य बातों के अलावा अदालतों में लंबित मामलों की सूची के त्वरित निस्तारण पर टिकी होती है।"

दोनों न्यायाधीशों ने कहा, "यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि त्वरित न्याय, न्याय की प्राथमिक नैतिकता और न्यायपालिका का नैतिक आधार है।"

पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, "इसकी गंभीरता इसी बात में निहित है कि यह खुद को लटकाने की छूट किसी को न दे, या ऐसी किसी गतिविधि की छूट न दें जो इसमें ठहराव ला दे, या इसे पंगु बना दे।"

पीठ ने कहा, "स्थगनों और मामले में उचित रुचि न दिखाकर न्यायिक निर्णय के गुणों को पंगु बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।" न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, "किसी को भी समय की कीमत के प्रति लापरवाह नहीं होना चाहिए।"

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, "असीम धर्य की उम्मीद करना विनाशकारी है। प्रवृत्ति में बदलाव आज के समय की मांग और अनिवार्यता है।"

अदालत ने यह टिप्पणी राजस्थान उच्च न्यायालय में 10 साल तक लटके रहे दीवानी मुकदमे पर की। इस मामले में कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल उलझा हुआ था।

मामला 1990 में दायर हुआ था। 12 सितंबर 1997 को हुनुमानगढ़ में नोहार के सिविल जज (कनिष्ठ संवर्ग) ने मामले को खारिज करते हुए नूर मोहम्मद के हक में फैसला सुनाया।

नोहार के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने 10 जुलाई, 2001 को निचली अदालत के फैसले के खिलाफ जेथानंद की अपील खारिज कर दी।

इस फैसले को उच्च न्यायालय में 27 जुलाई 2001 को चुनौती दी गई और अपील इसलिए खारिज कर दी गई, क्योंकि जेथानंद की ओर से कोई भी अदालत में हाजिर नहीं हुआ।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर गौर किया कि खारिज अपील को बहाल करने के लिए 2004 में एक अर्जी पेश की गई थी, जिसे 9 जनवरी 2006 को मंजूरी दी गई।

अदालत में लगे इतने समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने खेद जताया और कहा कि यह भी आश्चर्यजनक है कि वकील भी आम तौर पर स्थगन की इच्छा जताते हैं और अदालतें ऐसी प्रार्थनाओं को आसानी से स्वीकार कर लेती हैं।

न्यायाधीशों ने कहा कि अंतहीन विलंब के दुर्भाग्यपूर्ण चरित्र से हर हाल में बचा जाना चाहिए।
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