पेंशन से मिलती सामाजिक-माली सुरक्षा

जनता जनार्दन संवाददाता , May 15, 2011, 13:09 pm IST
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पेंशन से मिलती सामाजिक-माली सुरक्षा

नई दिल्ली: कोई व्यक्ति जब रोजगार से मुक्त या कार्य करने में अक्षम हो जाता है तब वैसी स्थिति में पेंशन उसके लिए वित्तीय प्रबंध सुनिश्चित करती है। भारत में जीवन प्रत्याशा बढ़ने के कारण आज पेंशन योजनाएं अधिक लाभप्रद बन गई हैं। भारत के निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र में कई पेंशन योजनाएं प्रचलन में हैं।

प्रत्येक पेंशन योजना में यद्यपि अलग-अलग लाभों का प्रावधान देखने को मिलता है, लेकिन सभी योजनाओं का उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा ही होता है। भारत सरकार ने अपने नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न पेंशन योजनाएं लागू की हैं, जिनमें स्वतंत्र सैनिक सम्मान पेंशन योजना 1980, सेवारत सरकारी कर्मचारी की मृत्यु होने पर पारिवारिक पेंशन, आतंकवादी या असामाजिक तत्वों द्वारा किए गए हमले में मृत व्यक्ति के परिवार के लिए पेंशन योजना, प्राधिकृत बैंकों के माध्यम से सरकारी कर्मियों को पेंशन, ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) आदि प्रमुख हैं।

पेंशन फंड विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) ने मई 2009 में 18 से 55 वर्ष आयु वर्ग के भारतीय नागरिकों के लिए राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) की शुरुआत की थी। इस योजना के अंतर्गत निवेशक द्वारा अपनी सेवावधि के दौरान पेंशन फंड में निवेश की गई राशि में से आधी राशि का एकमुश्त भुगतान और आधी राशि का वार्षिक अथवा पेंशन के रूप में भुगतान किया जाता है।

सरकार ने पेंशन कोष और नियामक विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) विधेयक, 2011 पर संसद की मंजूरी ले ली है। लम्बे समय से अधर में लटका यह विधेयक पेंशन विनियामक को अधिकार देने के साथ ही पेंशन फंडों के शेयर बाजार में निवेश का रास्ता भी खोल देगा। पीएफआरडीए विधेयक के पास हो जाने के बाद केंद्र सरकार के सभी विभागों में फंड मैनेजरों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। ये फंड मैनेजर पीएफआरडीए के अधीन काम करेंगे और इनके पास कर्मचारियों की ग्रेच्युटी, फंड और पेंशन सम्बंधी जानकारी उपलब्ध होंगी।

सामाजिक सुरक्षा पर जोर:
अगर हम भारत की कामकाजी आबादी का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि कुल जनसंख्या के अनुपात में काम करने की उम्र बढ़ती जा रही है। इसीलिए भारत को एक मजबूत पेंशन प्रणाली की जरूरत थी। भारत को युवाओं का देश कहा जा रहा है लेकिन आने वाले 10 से 20 वर्षो के बाद बुजुर्गो की संख्या बढ़ेगी और पेंशन एवं स्वास्थ्य सेवा पर जीडीपी का ज्यादा हिस्सा खर्च होगा।

इस समय हमारे नीति-निर्माताओं के सामने बड़ी चुनौती उच्च विकास दर को बनाए रखने की है, ताकि आर्थिक सुरक्षा न बिगड़े। ऐसे हालात में जीडीपी के ज्यादा से ज्यादा हिस्से को एक बड़ी आबादी में समान और सक्षम तौर पर बांटना होगा। बजट में इस बार स्वावलम्बन योजना से बाहर जाने की उम्र घटा कर 50 वर्ष कर दी गई है जो अब तक 60 वर्ष थी। संभवत: इस योजना में मार्च 2012 तक 20 लाख लोग और जुड़ जाएंगे।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन स्कीम के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले बुजुर्गो के लिए बजट मुहैया कराया जाता है। बजट में इस योजना का लाभ 65 साल की बजाय 60 साल में देने का प्रावधान किया गया है। अस्सी साल से ज्यादा की उम्र के लोगों के लिए केंद्र का योगदान 200 रुपये से बढ़ा कर 500 रुपये कर दिया गया है। राज्य केंद्र के योगदान में पूरक योगदान करने के लिए स्वतंत्र हैं। राज्यों में पेंशन के लिए मानक उम्र अलग-अलग है, लेकिन इस बात में गलती की आशंका बनी रहती है कि योजना में किसे शामिल किया जाए और किसे नहीं।

इस गलती को सुधारा जाना जरूरी है। इसलिए इस सम्बंध में समीक्षा करने की जरूरत है। साथ इस दिशा में ट्रांजेक्शन लागत भी कम करना जरूरी हो गया है। वर्ष 2010 में पेंशन फंड रेग्यूलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी विधेयक की अवधि खत्म हो गई थी। बजट में इसे दोबारा लाने की बात कही गई। एक मजबूत पेंशन नियामक नई पेंशन स्कीम जैसी योजनाओं के प्रति विश्वसनीयता पैदा करेगा और वह आम निवेशकों को अपनी दक्षता का फायदा भी दिलाएगा।
... contd.
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