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मुस्कुराहट बड़े काम की चीज

जनता जनार्दन डेस्क , Nov 25, 2012, 10:57 am IST
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मुस्कुराहट बड़े काम की चीज नई दिल्ली: खुरासान का एक राजकुमार था। नाम था अमर। खूब ठाट-बाट की जिंदगी थी। एक बार जब वह लड़ाई में गया तो उसके रसोईघर के समान को लेकर तीन सौ ऊंट भी उसके साथ गये। दुर्भाग्य से एक दिन वह खलीफा इस्माइल द्वारा बंदी बना लिया गया, पर दुर्भाग्य भूख को तो नहीं टाल सकता। उसने पास खड़े अपने मुख्य रसोइये से, जो एक भला आदमी था, कहा, "भाई, कुछ खाने को तैयार कर दे।"

उस बेचारे के पास केवल एक मांस का टुकड़ा बचा था। उसने उसे ही देगची में उबलने को रख दिया और भोजन को कुछ अधिक स्वादिष्ट बनाने के लिए स्वयं किसी साग-सब्जी की खोज में निकला।

इतने में एक कुत्ता वहां से गुजरा। मांस की सुगंध से आकर्षित हो उसने अपना मुंह देगची में डाल दिया। पर भाप की गर्मी पा वह तेजी से और कुछ ऐसे बेढंगे तरीके से पीछे हटा कि देगची उसके गले में अटक गई। अब तो घबराकर वह देगची के साथ ही वहां से भागा।

अमर ने जब यह देखा तो जोर से हंस पड़ा। उसके अफसर ने, जो उसकी चौकसी पर नियुक्त था, उसे पूछा, "यह हंसी कैसी? इस दुख के समय भी आप हंस रहे हो!"

अमर ने तेजी से भागते हुए कुत्ते की ओर इशारा करते हुए कहा, "मुझे यह सोचकर हंसी आ रही है कि आज प्रात: काल तक मेरी रसोई का सामान ले जाने के लिए तीन सौ ऊंटों की आवश्यकता पड़ी थी और अब उसके लिए एक कुत्ता ही काफी है।"

अमर को प्रसन्न रहने में एक स्वाद मिला था। दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए यद्यपि वह उतना प्रयत्नशील नहीं था, फिर भी उसके विनोदी स्वभाव की प्रशंसा किए बिना हम नहीं रह सकते। यदि वह इतनी गंभीर विपत्ति में भी प्रसन्न रह सकता था तो क्या हम मामूली चिंता में चेहरे पर एक मुस्कुराहट भी नहीं ला सकते?

भला स्वभाव :

फारस देश में एक स्त्री थी, जो शहद बेचने का व्यवसाय करती थी। उसकी बोलचाल का ढंग इतना आकर्षक था कि उसकी दुकान के चारों ओर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। यदि वह शहद की जगह विष भी बेचती तो भी लोग उसे शहद समझकर ही उससे खरीद लेते।

एक ओछी प्रकृतिवाले मनुष्य ने जब देखा कि वह स्त्री इस व्यवसाय से बहुत लाभ उठा रही है तो उसने भी इसी धंधे को अपनाने का निश्चय किया। दुकान तो उसने खोल ली, पर शहद के सजे-सजाये बर्तनों के पीछे उसकी अपनी आकृति कठोर ही बनी रहीं। ग्राहकों का स्वागत सदा अपनी कुटिल भृकुटि से करता था। इसलिए अब उसकी चीज छोड़ आगे बढ़ जाते थे। एक मक्खी भी उसके शहद के पास फटकने का साहस नहीं करती थी। शाम हो जाती, पर उसके खाली-के-खाली ही रहते। एक दिन एक स्त्री उसे देखकर अपने पति से बोली, "कड़आ मुख शहद को भी कडुआ बना देता है।"

क्या वह शहद बेचनेवाली स्त्री केवल ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए मुस्कराती थी? हम तो यही सोचते हैं कि उसका उल्लास उसके भले स्वभाव का एक अंग था। संसार में हमारा कार्य केवल बेचना और खरीदना ही नहीं है, हमें यहां एक-दूसरे का मित्र बनकर रहना है। उस भली स्त्री के ग्राहक यह जानते थे कि वह एक दुकानदारिन के अतिरिक्त और कुछ भी थी - वह संसार की एक प्रसन्नमुख नागरिक थी।

(सस्ता साहित्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'हमारी बोध कथाएं' से साभार)
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