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..और कौशिकी के हाथों मारे गए शुंभ-निशुंभ

..और कौशिकी के हाथों मारे गए शुंभ-निशुंभ नई दिल्ली: प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु के वंश में सुंद और उपसुंद नामक दो दानव हुए थे। उनके शुंभ और निशुंभ नामधारी दो पुत्र पैदा हुए। उनके मन में बचपन से ही मधु और कैटभ दैत्यों की भांति इंद्र पर विजय पाने की प्रबल इच्छा थी। उनमें अहंकार के साथ हिंसा की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। वह अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए पुष्कर क्षेत्र में गए और अन्न-जल त्याग दस हजार वर्ष र्पयत ब्रह्मा की घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर ब्रह्मा प्रत्यक्ष हुए।

शुंभ-निशंभु ने इंद्र आदि देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर अधिकार करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की। ब्रह्मा ने एक शर्त के साथ उनका मनोरथ पूरा करने को स्वीकार किया, वह यह थी कि वे एक अयोनिज देहधारी कन्या के हाथों मृत्यु को प्राप्त होंगे। ब्रह्मा के वरदान के बल पर इन दानव वीरों ने देवताओं और दिक्पालों को स्वर्ग से भगा दिया। साथ ही तीनों लोकों के अधिपति बन बैठे। देवताओं के प्राप्य हविष आदि स्वयं स्वीकारने लगे।

देवराज इंद्र पदच्युत होकर अपनी पत्नी शची देवी तथा समस्त देवताओं का साथ लेकर स्वर्ग से निकल पड़े। गुप्त प्रदेश में जाकर देवी के ध्यान में लीन हो गए। राक्षस राजा शुंभ-निशुंभ मदोन्मत्त हो तीनों भुवनों पर चौबीस महायुगों तक शासन करते रहे। उसी काल में हिमवंत की पुत्री पार्वती परमेश्वर के प्रति घोर तपस्या में निमग्न थी।

पार्वती की अद्भुत देह प्रभा पर प्रसन्न हो परमेश्वर प्रत्यक्ष हुए और बोले कि पार्वती तुम्हारी देह कांति नीलम वर्ण की है। इसलिए तुम्हारे साथ विवाह करने की मेरी इच्छा नहीं हो रही है। इस पर पार्वती ने ब्रह्मदेव की देह कांति प्राप्त की। शंकर ने पार्वती के श्यामवर्ण की कांति का हरण किया। इस पर वह भद्रकाली के रूप में विख्यात हो समस्त लोकों को आनंद प्रदान करने लगी। देवताओं ने उनकी प्रस्तुति की।

एक बार देवता हिमाचल पर भगवान विष्णु की अनेक रीतियों से प्रस्तुति कर रह थे। पार्वती गंगा में स्नान करने निकली। मार्ग मध्य में देवताओं द्वारा विष्णु का स्तवन करते देख वह कुपित हो गई और बोली कि तुम लोग मुझको साधारण कन्या मानते हो। इसका फल तुम लोगों को भुगतना होगा। ये शब्द कहते हुए पार्वती क्रोधित हो गई। उसी क्षण उनकी देह से एक कांतिमति शक्ति का उदय हुआ। उस शक्ति ने पार्वती को प्रणाम करके पूछा कि माते मेरे इस जन्म का कारण क्या है? मेरा कर्तव्य क्या है?"

पार्वती ने मुद्रित होकर कहा कि कुमारी हिमालय के दक्षिण शिखर पर निवास करने वाले शुंभ और निशुंभ का तुम इसी समय संहार करो। कौशिकी नामक इस कन्या ने शुंभ और निशुंभ का वध किया। इसके बाद भुवन मोहिनी का रूप धरकर वह हिमालय पर्वत के दक्षिण शिखर पर स्वर्णिम जंजीरोंवाले हिंडोले पर झूलते समय तन्मय हो संगीत का आलाप करने लगी। देवता उस भक्तिस्वरूपिणी का अनेक प्रकार से स्तवन करके अपने-अपने निवास को लौट आए।

दूसरी कथा इस प्रकार है कि एक दिन शुंभ-निशुंभ के अनुचर चंड और मुंड ने उस अद्भुत लावण्यमयी कन्या को देखा। उसके सौंदर्य पर विस्मित होकर शुंभ से बोला कि दानव राज हमने स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ सुंदरी तिलोत्तमा से अधिक रूपवती कन्या को देखा। ब्रह्मा के लिए भी उसी रमणीयता का वर्णन करना असंभव है। आप तो त्रिलोक पूज्य हैं, कुबेर हैं, असाधारण पराक्रमी हैं। आपके लिए वह कन्या अत्यंत ही उपयुक्त है।

चंड-मुंड की बातें सुनकर शुंभ प्रलोभन में आ गया। उसके महिलाओं का मन टटोलने में सिद्धहस्त सुग्रीव नामक राक्षस को बुलाकर आदेश दिया कि सुग्रीव तुम सर्व कार्य समर्थ हो। इसी क्षण जाकर इस पर्वत राज के दक्षिण शिखर में विहार करने वाली कन्या को उठा ले आओ। सुग्रीव ने उस कन्या के समीप जाकर शुंभ के पराक्रम, धन-संपा तथा ऐश्वर्य का वर्णन किया और दानव राजा के साथ विवाह करने की अभ्यर्थना की।

कौशिकी ने दानव सुग्रीव का परिहास करके कहा कि हे दैत्य, मैं मानती हूं कि शुंभ बल-पराक्रम में अपनी अद्भुत क्षमता रखता है। किसी भी कन्या के लिए उसके साथ परिणय करना भाग्य की बात ही होगी, लेकिन मैंने प्रतिज्ञा की है कि मैं युद्ध में मुझे पराजित करने वाले वीर के साथ ही विवाह करूंगी। तुम अपने दानव राजा को मेरी यह शर्त बता दो।

दैत्य सुग्रीव के मुंह से कौशिकी की शर्त सुनकर दानव शुंभ क्रोध में आगबबूला हो उठा और शूर-वीर धूम्राक्ष को निकट बुलाकर आदेश दिया कि हे धूम्राक्ष तुम इसी समय जाकर अभिमानिनी कौशिकी के केश पकड़कर लाओ। यदि किसी ने तुमको रोका तो उसका वध कर डालो। शुंभ का आदेश पाकर धूम्राक्ष साठ हजार दैत्य वीरों को साथ लेकर कौशिकी के पास पहुंचा और ललकारकर कहा कि हे सुंदरी तुम अपना अहंकार त्यागकर तत्क्षण हमारे साथ दानव सम्राट शुंभ के महल में आ जाओ वरना तुम्हारे केश पकड़कर हम तुमको खींच ले जाएंगे।

धूम्राक्ष के वचन सुनकर कौशिकी ने आग्नेय नेत्रों से उस पर दृष्टि प्रसारित की, फलस्वरूप तत्काल धूम्राक्ष उन अग्नि ज्वालाओं में भस्म हो गया। तदुपरांत देवी कौशिकी ने दानव सेना को बाण-वर्ष करके संहार किया। वह युद्ध क्षेत्र अति भयंकर लग रहा था। उस दृश्य को देख भयभीत हुए बचे हुए दानव सैनिक शुंभ के पास पहुंचे और युद्ध का समाचार दिया। शुंभ ने दांत पीसकर अपने सेनापतियों को आदेश दिया कि तुम लोग अभी जाकर उस कन्या के केश पकड़कर खींच लाओ। यदि वह तुम लोगों के साथ चलने को राजी न होगी तो उसके वाहन सिंह को मार डालो।

इस बार चंड-मुंड भारी सेना लेकर देवी कौशिकी के पास पहुंचे। देवी ने रौद्र रूप धारण किया। इस पर उनके मुंह से काली नामक शक्ति का उदय हुआ। काली देवी ने अपने लललपाती जिह्वा को फैलाकर सिंह गर्जन किया और पल भर में समस्त राक्षस सेना का अंत किया। उन दैत्यों के कटे मुंडों को काली ने देवी को दिखाया। देवी कौशिकी ने प्रसन्न होकर कहा कि कुमारी तुम इस साहस कृत्य के कारण आज से चामुंडी नाम से जगत में विख्यात हो जाओगी।

दैत्य सेना की मृत्यु का समाचार सुनकर इस बार शुंभ और निशुंभ ने स्वयं युद्ध क्षेत्र में जाने का निश्चय किया। अपने साथ हजारों, लाखों हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना को लेकर गदा, खड्ग, तोमर, कुंतल, शक्ति, बाण इत्यादि से युद्ध के लिए सन्नद्ध हुए। उस घड़ी में अनेक अपशकुन हुए। फिर भी शुंभ-निशुंभ ने उनकी उपेक्षा की।

युद्ध क्षेत्र में जाकर कौशिकी पर असंख्य अस्त्र-शस्त्रों से आक्रमण किया। भद्रकाली ने भयंकर रूप धारण कर दानव सेना का संहार करना प्रारंभ किया। सिंह ने भी शत्रु सेना का अंत किया। उसी समय ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर की देहों से अनेक शक्तियां निकलकर राक्षसों का वध करने लगीं। महाकाली को मौन खड़ी देखकर परम शिव ने कहा कि देवी आप मौन क्यों हैं। इस दुष्ट राक्षस का संहार क्यों नहीं करतीं। इस पर भद्रकाली की देह से एक और शक्ति का उदय हुआ। उसने परम शिव से निवेदन किया कि परमेश्वर आप इन देवताओं को समझाइए कि वे युद्ध करना छोड़कर स्वर्गल लोक को देवताओं के हाथ सौंप दें वरना अंतिम युद्ध के लिए तैयार हो जाएं।

परमेश्वर ने दानवों को देवी के वचन सुनाए। परंतु शुभ-निशुंभ ने युद्ध क्षेत्र को छोड़ने से अस्वीकार किया। परिणामस्वरूप देवी के सैनिकों और राक्षस सेना के बीच तुमुल युद्ध हुआ। उस युद्ध में रक्तभोज नामक सेनापति ने देवी की सेना पर भयंकर आक्रमण किया। इस पर देवी ने कुपित होकर इंद्राणी नामक अपनी महाशक्ति व्रजायुद्ध का प्रयोग किया। रक्तभोज रक्त उगलते धराशायी हो गया। उसका रक्त सारे विश्व में फैल गया। उस रक्त के कणों से करोड़ों राक्षस निकल आए। इस विस्मयकारी दृश्य को देख देवता, मुनि और मानव आश्चर्य में आ गए।

इसी समय कौशिकी का आदेश पाकर कालीदेवी ने अपने भयानक मुंह से जीभ बाहर करके सारा रक्त पी लिया। तदनंतर अपने विविध अस्त्रों का प्रयोग करके अन्य राक्षसों का वध किया। इस मारणकांड को देख निशुंभ ने मत्त हाथी की भांति चिंघार कर भद्रकाली के साथ भीषण युद्ध किया। भद्रकाली ने सिंहनाद करके निशुंभ के वक्षस्थल पर त्रिशूल गड़ा दिया। तब उस वक्षोमंडल से एक भयंकर रूपधारी दानव ने जन्म लिया और भद्रकाली को चुनौती दी कि हे नारी मैं अभी तुम्हारे भयंकर रूप का सर्वनाश करूंगा। तुम भागो मत। युद्ध भूमि में डटी रहो।

भद्रकाली ने दानव वीर पर अपने तेज आयुध से प्रहार किया। उस युद्ध में दानव ने लड़ते-लड़ते दम तोड़ दिया। अपने छोटे भाई निशुंभ को युद्ध में निहत देख दानव राजा शुंभ रोष में आ गया और हुंकार करके कहा कि हे पापिनी तुम अन्यों से शक्ति पाकर मदोन्मत्त हो गई हो। तुम मेरे बाहु-बल को नहीं जानती हो। मैं अभी तुमको यमलोग में भेज देता हूं। रुक जाओ।

इस पर उन्होंने कहा कि अरे दुष्ट दानव तुम मेरी महिमा को नहीं जानते। ये सारी शक्तियां मुझसे भिन्न नहीं हैं। मैं समस्त शक्तियों की सम्मिलित शक्तिस्वरूपिणी हूं। तुम्हारे अज्ञान पर मुंझे हंसी आती है। कौशिकी के मुंह से ये शब्द निकलने की देर थी कि सभी शक्तियां एक साथ कौशिकी में समाहित हो गई। तब चामुंडी ने भीषण गर्जन करके दानव राजा को युद्ध के लिए ललकारा।

शुंभ ने क्रोध में अंधे होकर चामुंडी देवी पर प्रहार किया। दोनों में भीषण संग्राम हुआ। उनके इस अपर्वू युद्ध का देवताओं ने ऊपर से विस्मयपूर्वक अवलोक किया। देवी ने शुंभ के युद्ध कौशल पर चकित होकर उसके अस्त्र-शस्त्रों को तोड़ डाला और उसके सारथी को मार गिराया। उसके रथ में जुड़े घोड़ों को धाराशायी कर दिया। उसके रथ को टुकड़े-टुकड़े कर दिए। तब शुंभ ने गरजकर मुष्ठि युद्ध करना आरंभ किया। देवी ने आग उगलते अपने शूल से शुंभ का वध किया।

देवताओं ने प्रसन्न होकर आकाश में चामुडी देवी पर पुष्पों की वर्षा की। विजय दुंदुभी से सारी पृथ्वी प्रतिध्वनित हो उठी। तब देवी ने देवताओं को अभय दान देकर पूछा कि आप लोग अपने मनोरथ बताइए मैं उनकी पूर्ति करूंगी। इस पद देवताओं ने करबद्ध होकर निवेदन किया कि महादेवी जी आप इसी प्रकार सदा हमारी रक्षा कीजिएगा। देवी ने स्वर्गवासियों को आश्वासन दिया कि हे सुरपुरी के निवासियों मैं यथा समय रक्तदंति, शताक्षी, शांकबरी, दुर्गा, भीमा इत्यादि रूपों में प्रकट होकर दुष्टों का संहार करूंगी। यह कहकर चामुंडी देवी अंतर्धान हो गई। देवता अनेक मुंहों से चामुंडी देवी की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने निवास को लौट आए।

(लेखक आंध्र प्रदेश के कडपा निवासी हिंदी साहित्यकार हैं। सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'पौराणिक कथाएं' से साभार)
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